फ़्लॉप नहीं, हिट हुई है नोटबन्दी

राहुल गाँधी, पी. चिदंबरम समेत पूरी कांग्रेसी फौज तथा विपक्षी नेताओं का जमघट कल शाम से जोश में है. 1000 और 500 के पुराने नोटों की वापसी को हथियार बनाकर उन्होंने नोटबंदी को फ्लॉप और निरर्थक घोषित कर के केंद्र सरकार पर तीखे हमले करना प्रारम्भ कर दिया है. क्या नोटबंदी वास्तव में फ्लॉप शो सिद्ध हुई है? या उसने कालेधन पर अपेक्षित प्रहार किया है?

इस सवाल का जवाब जानने के लिए इन तथ्यों से परिचित होना जरूरी है…

पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में इस वर्ष सरकार को मिले टैक्स में लगभग 2 लाख 60 हज़ार करोड़ रूपयों की वृद्धि दर्ज हुई है. इस वृद्धि में सरकार को मिले प्रत्यक्ष करों (Direct Tax) में लगभग 1 लाख 5 हज़ार करोड़ की वृद्धि तथा अप्रत्यक्ष करों (Indirect Tax) में हुई 1 लाख 55 हज़ार करोड़ की वृद्धि शामिल है.

अब तक के इतिहास में सरकार को मिले करों में इतनी वृद्धि कभी नहीं हुई है. सरकार को मिले करों में हुई यह ऐतिहासिक वृद्धि इसलिए चौंकाती है क्योंकि इस वर्ष नोटबन्दी के कारण GDP की वृद्धि दर में लगभग 7% की गिरावट हुई है. पिछले 2-3 वर्षों से GDP का जो आंकड़ा लगभग 7.6 था वो इस वर्ष 2016-17 में गिर कर 7.1 पर आ गया है. अनुमान लगाइए कि यदि GDP में 7% की गिरावट नहीं हुई होती तो टैक्स वृद्धि का यह आंकड़ा कहां पहुंचता?

सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इस वर्ष सरकार को मिले इनकम टैक्स में 61 हज़ार 632 करोड़ रू की वृद्धि हुई है. जबकि पिछले वर्ष (2015-16) में यह वृद्धि मात्र 21 हज़ार 865 करोड़ थी तथा उससे भी पहले के वित्तीय वर्ष (2014-15) में यह वृद्धि मात्र 22 हज़ार 884 करोड़ थी.

यह आंकड़ा गवाही देता है कि प्रतिवर्ष लगभग 40 हज़ार करोड़ के इनकम टैक्स की चोरी हो रही थी. ये चोर अब पकड़ में आये हैं और चिह्नित हो गए हैं. इसी प्रकार इनकम टैक्स के अलावा अन्य प्रत्यक्ष करों के रूप में सरकार को 2014-15 में मिली जो धनराशि 1095 करोड़ थी और 2015-16 में मिली धनराशि 1079 करोड़ थी.

उससे पहले के वर्षों में यह धनराशि और भी कम थी. इस बार वित्तीय वर्ष 2016-17 में नोटबन्दी के बाद अन्य अन्य प्रत्यक्ष करों से सरकार को मिली इस धनराशि के आंकड़ें में लगभग सवा चौदह गुने की वृद्धि हुई है और अन्य अप्रत्यक्ष करों के रूप में सरकार को 15 हज़ार 624 करोड़ की धनराशि मिली है. वह भी तब जबकि GDP वृद्धि दर में 7% की गिरावट हुई है.

यह आंकड़ा बताता है कि हर साल कम से कम लगभग 14 हज़ार करोड़ के अप्रत्यक्ष करों की चोरी हो रही थी जो नोटबन्दी के कारण पकड़ में आई और अब चिह्नित हो चुकी है. यह तो सरसरी तौर पर प्रथम दृष्टया नज़र आ रही वह सच्चाई है जो यह बता रही है कि अब तक केवल इनकम टैक्स और अन्य प्रत्यक्ष करों की प्रतिवर्ष होती रही लगभग 55 हज़ार करोड़ रूपयों की चोरी पकड़ी और चिह्नित की जा चुकी है, जिससे हर वर्ष देश को अब यह 55 हज़ार करोड़ रूपये मिला करेंगे.

लेकिन इस कर चोरी की बात यहीं खत्म नहीं होती.

नोटबन्दी ने इस पर कैसा शिकंजा कसा है यह इस तथ्य से समझिये कि सरकार ने वर्ष 2015-16 में प्रत्यक्ष करों से होने वाली आय का अनुमान 7 लाख 52 हज़ार करोड़ लगाया था. किन्तु उसे प्राप्ति हुई थी केवल 7 लाख 48 हज़ार करोड़ रूपये की. अर्थात उसे अपने अनुमान से 4 हज़ार करोड़ रु कम मिले थे.

सरकार का अनुमान गलत नहीं था क्योंकि इसके अगले वर्ष ही (नोटबन्दी वाले वर्ष में) उसे प्रत्यक्ष करों से 8 लाख 47 हज़ार करोड़ रू मिले हैं. पिछले वर्ष से लगभग 1 लाख करोड़ रू अधिक. सरकार को मिले टैक्स में हुई यह वृद्धि इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि 8 नवंबर 2016 को हुई नोटबन्दी की घोषणा के बाद लगभग 2 महीने (नोटबन्दी की अवधि) तक तो उद्योग जगत और बाजार की गतिविधियों में जबरदस्त गिरावट दर्ज हुई थी.

उसके बाद के दो-तीन महीने उसे उस गिरावट से उबरने में लगे थे. अतः यह स्पष्ट है कि सरकार को मिले उपरोक्त कर वास्तविक रूप से लगभग 8-9 महीने की ही कमाई है. जो यह बता रही है कि देश में अब तक होती प्रतिवर्ष होती रही लगभग एक से डेढ़ लाख करोड़ की टैक्स चोरी नोटबन्दी के बाद पकड़ में आयी है. यह कोई छोटी मोटी सफलता नहीं है.

लेकिन नोटबन्दी के प्रभाव की कहानी इतने पर ही खत्म नहीं हुई है. नोटबन्दी के दौरान जिन 18 लाख लोगों को चिह्नित किया गया था उनमें से केवल 9.72 लाख लोगों ने अपनी आय का स्पष्टीकरण और टैक्स जमा किया है. शेष 8 लाख में से 5.5 लाख लोग ऐसे हैं जिन्होंने नोटबन्दी के दौरान अप्रत्याशित रूप से भारी रकमें अपने खातों में जमा की थीं और अब जवाब नहीं दे पा रहे हैं. इनके अतिरिक्त लगभग एक लाख ऐसे लोग पकड़ में आये हैं जिन्होंने भारी रकम जमा वाले अपने बैंक खातों को छुपाया था. इन सबके विरुद्ध कठोर कार्रवाई की तैयारी चल रही है. इनसे लगभग डेढ़ से दो लाख करोड़ की वसूली होने का अनुमान है.

अंत में नोटबन्दी के विशेष प्रभाव का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष : लगभग 16 हज़ार करोड़ रूपए के जो नोट वापस नहीं हुए वो किसके पास थे? स्पष्ट है कि यह राशि जिन लोगों के पास थे वो किसी भी हालत में इसे कहीं भी जमा या उजागर नहीं कर सकते. ऐसे लोग आतंकवादी और जघन्य अपराधी ही हैं. इन तत्वों को लगी 16 हज़ार करोड़ रुपयों की चोट ने उनकी जान निकाल दी है. वापस नहीं हुई इस रकम का असर बहुत बड़ा हुआ है.

अतः नोटबन्दी को फ्लॉप शो कहने वालों को उपरोक्त आंकड़ें सन्देश दे रहे हैं कि नोटबन्दी का शो फ्लॉप नहीं सुपरहिट हुआ है.

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