कश्मीर समस्या के पीछे चीन तो नहीं?

सामान्यतः यह समझा जाता है कि कश्मीर समस्या के पीछे पाकिस्तान है जो आतंकवादियों और अलगाववादी नेताओं को शह देता है, उन्हें हथियार, विस्फोटक, ट्रेनिंग और वित्तीय मदद प्रदान करता है. आतंकवादियों को शरण देता है. लेकिन एक अलग कोण से सोचने पर लगता है कि कश्मीर समस्या के पीछे कहीं गुप्त रूप चीन तो नहीं? कन्धा पाकिस्तान का और पीछे से बन्दूक चलाने वाला चीन हो सकता है.

आखिर ऐसा क्या है कश्मीर में जिसके पीछे पाकिस्तान इतने सालों से पगलाया है? शायद नदियों का स्त्रोत? ना तो कश्मीर कोई अमीर प्रदेश है, न ही उद्द्योग, न ही खनिज, न ही वाणिज्य. न उच्च खेती, न मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, न सर्विस सेक्टर.

जो भी गरीब कश्मीरियों की आय है वह टूरिज्म से, केसर से या शाल बेचने से होती है. भारत सरकार के करोड़ों रूपये मासिक अनुदान से राज्य चलता है. अब ऐसे खस्ताहाल प्रदेश को कोई आर्थिक रूप से कंगाल देश क्यों लेना चाहेगा जो उस पर बहुत बड़ा आर्थिक बोझ बने. निश्चित ही पाकिस्तान का कश्मीर को लेने में कोई वित्तीय हित नहीं हो सकता.

चीन प्रतिदिन 30 लाख बैरल कच्चा तेल खाड़ी देशों से खरीदता है, और समुद्र के मार्ग द्वारा परिवहन कर चीन ले जाता है. खाड़ी देशों के बंदरगाह से चीन के बंदरगाह 13000 किलोमीटर दूर है. यह रास्ता चीन के बंदरगाह से दक्षिण चीन सागर होते हुए – फिलिपीन्स और वियतनाम के बीच से – सिंगापुर होकर – मलेशिया और इंडोनेशिया के बीच से – हिंदमहासागर से अरब की खाड़ी होकर फारस की खाड़ी पहुचता है, जहाँ ईरान, कुवैत, मस्कट, इराक से कच्चा तेल मिलता है. और एक जहाज को इतनी दूरी तय करने में अधिकतम 45 दिन का समय लग जाता है. अब यदि चीन एक रास्ता ( रेल या सड़क मार्ग ) बना ले, जो चीन से पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक जाए तो इस मार्ग की लम्बाई होगी मात्र 3000 किलोमीटर. और इस मार्ग से कच्चा तेल परिवहन का समय मात्र 3 दिन होगा !!! (देखे नक्शा) -१

 

खाड़ी और अफ़्रीकी देशों को चीन का व्यापारिक माल भी इसी लम्बे सामुद्रिक मार्ग से जाता है, जिसमें अत्यधिक परिवहन समय और परिवहन खर्च लगता है.

यह समुद्री मार्ग चीन के दुश्मन देशों ताइवान, वियतनाम और फिलिपीन्स से गुजरता है, इनमें कई स्थानों पर समुद्री सीमा विवाद चल रहा है. तो चीन के लिए पाकिस्तान होकर खाड़ी तक थल व रेल मार्ग बनाना उसे व्यापारिक हित में रहेगा. यह मार्ग पाक अधिकृत कश्मीर से गुजरेगा.

चीन ने पहले काराकोरम हाइवे बनाया, 1300 किलोमीटर का यह हाइवे चीन के काशगर से पाक अधिकृत कश्मीर के गिलगित में खुन्जेराब दर्रे को जोड़ता है. खुन्जेराब दर्रे से आगे यह गिलगित तक है. बाद में पाकिस्तान की प्रार्थना पर चीन ने इसे गिलगित से बढाकर एबोटाबाद तक कर दिया गया. इस हाई वे के निर्माण में पूरा पैसा चीन का लगा, पाकिस्तान जैसा कंगाल देश इतने बड़े प्रोजेक्ट की धन राशि लगा भी नहीं सकता.

जून 2011 में ओसामा बिन लादेन एबोटाबाद में मारा गया, और यह राजमार्ग एबोटाबाद तक नवम्बर 2011 में पहुचा! यानी कुछ महीने और अमेरिका की कार्यवाही न होती तो इसी रास्ते से ओसामा बिन लादेन चीन पंहुचा दिया जाता!

चीन ने 1989 से पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह में दिलजस्पी दिखाना शुरू किया, और यह संयोग नहीं है कि इसी समय से कश्मीरी उग्रवादी तेज हुए. चीन ने पाकिस्तान के खस्ता हाल ग्वादर बंदरगाह का विकास कर उसे अन्तरराष्ट्रीय स्तर का बंदरगाह बना दिया. अब चीन एक नए प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है जिसे “ चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा “ (China–Pakistan Economic Corridor ) CPEC कहा जाता है. यह 8600 करोड़ डालर की परियोजना है. इसमें चीन के काश्गर शहर को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से 6 लेन के हाइवे और रेल मार्ग से जोड़ दिया जाएगा.

 

 

 

 

 

 

ग्वादर से मस्कट मात्र 500 किलोमीटर दूर है, इस प्रकार चीन को ईरान, कुवैत, मस्कट, इराक से तेल लेने और खाड़ी देशों में अपना सामान बेचने में अत्यधिक सुविधा हो जायेगी.

मूर्ख पाकिस्तानियों को यह समझ नहीं आता कि इस CPEC प्रोजेक्ट के बन जाने पर हर रोज चीनी माल के हजारों ट्रक और चीनी मालगाड़ियाँ पाकिस्तान के शहरों से गुजरेंगी. पाकिस्तान के उद्योग धंधे ठप्प होंगे और पाकिस्तानी बाज़ारों में सिर्फ चीनी माल नज़र आएगा. इस प्रकार पाकिस्तान चीन का प्रदेश बन के रह जाएगा.

कश्मीर की समस्या के पीछे चीन का यह उदेश्य रहा कि भारत को कश्मीर घाटी में उलझा कर रखो. अगर कश्मीर घाटी में शान्ति हुई तो भारत ‘पाक अधिकृत कश्मीर’ को हासिल करने में अपनी शक्ति लगाएगा जिससे कि काराकोरम हाइवे भारत के पास जा सकता है और ‘चीन पकिस्तान आर्थिक गलियारा’ का काम नहीं हो सकेगा. अतः यह संभव है कि कश्मीरी आतंकवादी संगठनों और हुर्रियत की फंडिंग गुप्त रूप से चीन कर रहा हो.

अगर भारत पाकिस्तान का सीधे युद्ध हुआ तो पाकिस्तान का ध्वस्त होना निश्चित है, मगर चूंकि इससे चीन का महत्वपूर्ण व्यापारिक हित प्रभावित होगा अतः चीन भी इस युद्ध में पाकिस्तान के समर्थन में कूद सकता है. तब भारत को चीन को सामरिक टक्कर देना मुश्किल हो जायेगा. अगर भारत चीन का युद्ध हुआ तब भारत को कौन सपोर्ट करेगा?

अमेरिका? कभी नहीं. अमेरिका की सैकड़ों कम्पनियां चीन में कार्यरत है और हजारों करोड़ डॉलर का व्यापार कर रहीं है. ऐसे में कम्युनिस्ट चीन अमेरिका की कम्पनियों का ‘राष्ट्रीयकरण‘ करने की धमकी देकर उसको तुरंत बैठा देगा.
रूस? कभी नहीं. देश के अनेक समस्याओं से घिरे पुतिन खस्ता अर्थव्यवस्था के चलते चीन से युद्ध नहीं कर सकते. ख़राब आर्थिक हालत के चलते पुतिन को सीरिया से अपनी सेना वापिस बुलानी पड़ी.

ajit dobhal with modi

तो फिर विकल्प क्या ? मोदी – डोभाल कूटनीति ही सर्वश्रेष्ठ विकल्प है. बलोचिस्तान, सिंध और पाक अधिकृत कश्मीर की आज़ादी को समर्थन देना. बलोचिस्तान के स्वतंत्र होते ही ग्वादर बंदरगाह बलोचिस्तान का हिस्सा हो जाएगा. और काराकोरम हाइवे भी पकिस्तान से अलग हो जाएगा. अब चीन की कारीडोर योजना टायें टायें फिस्स. बचे खुचे पकिस्तान में चीन को अपना कोई हित नज़र नहीं आएगा. तब पाकिस्तान से “ठीक” से निपटा जाएगा.

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