वीर सैनिक हैं गुजराती

(चित्र : कच्छ की सेना 1913)

आजकल एक चुटकुला इन्टरनेट और सोशल मीडिया पर फ़ैल रहा है –
फील्ड मार्शल सैम बहादुर मानक शॉ ने एक बार अहमदाबाद में एक जनसभा को अंग्रेजी में संबोधित करना शुरू किया, तभी भीड़ में कुछ लोग चिल्लाने लगे कि हम सिर्फ गुजराती भाषा में ही सुनेंगे!

फील्ड मार्शल मानक शॉ ने बहुत ही शालीनता से जवाब दिया –
“दोस्तों अपने लम्बे करियर में मैंने बहुत सी लड़ाईयां लड़ीं मैंने सिक्ख रेजिमेंट के आफिसर्स से पंजाबी सीखी, मराठा रेजिमेंट्स से मराठी सीखी, मद्रास सेपर्स के आफिसर्स ने तमिल सिखा दी, बंगाली सेपर्स ने बंगाली सिखा दी, हिंदी बिहार रेजिमेंट से सीख ली यहाँ तक कि गोरखा रेजिमेंट से नेपाली भी सीखी, लेकिन अफ़सोस है कि एक भी गुजरात का आर्मी अफसर नहीं मिला, जिससे मैं गुजराती सीख सकूँ..! ”

उसके बाद खचाखच भरी सभा में कोई न बोला,
सब तरफ सुई पटक सन्नाटा छा गया !

मुझे नहीं लगता कि ये बात फील्ड मार्शल ने कही होगी. यह कहानी दो कारणों से झूठी लगती है – पहला यह कि फील्ड मार्शल मानक शॉ स्वयं गुजराती पारसी थे. उनके पिता वलसाड गुजरात में रहते थे. मानक शॉ का बचपन और प्राथमिक शिक्षा वलसाड गुजरात में हुई. दूसरा यह कि सेना के फील्ड मार्शल को देश के सैन्य इतिहास का पता तो रहता ही है.

इस चुटकुले को फ़ैलाने का मकसद यह बताना है कि एक भी गुजराती सेना में नहीं हैं, गुजरातियों को सिर्फ बिजनेस करने वाला बताना है. और इस बहाने हमारे प्रधानमंत्री पर निशाना साधना है क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री गुजरात से हैं. सेना में गुजराती, मराठी, पंजाबी आदि के नाम से कोई गिनती नहीं की जाती इसलिए कोई अधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हो सकते.

यह सही है कि भारतीय सेना में गुजरात रेजिमेंट के नाम से कोई रेजिमेंट नहीं है. भारतीय सेना में कोई राजस्थान रेजिमेंट, हरियाणा रेजिमेंट, कर्णाटक रेजिमेंट भी नहीं है. क्या इसका मतलब यह है कि इन प्रदेशों के लोग सेना में नहीं है?

किसी भी नाम की रेजिमेंट में सभी वर्गों के सैनिक होते हैं. मगर सेना का फील्ड मार्शल ऐसी बात कहे इसमें संदेह है. इस चुटकुले में फ़ील्ड मार्शल के द्वारा यह बताये जाने की कोशिश की गयी है कि गुजरातियों का सेना में योगदान नगण्य है.

गुजरात प्रदेश का नाम ही वीर गुर्जरों पर पड़ा है. पहले यहाँ दक्षिण के चालुक्यो का राज्य था जिसे गुर्जरों ने जीत कर 8वी शताब्दी में अपना राज्य स्थापित किया. महान गुर्जर सम्राट मिहिर भोज को कौन नहीं जानता जिनका राज्य गुजरात , राजस्थान , मध्यप्रदेश , पंजाब से ले कर बिहार-बंगाल तक विस्तृत था.

गुजरात प्रदेश में सोलंकी राजा हुए जिन्होंने 17 बार महमूद गजनी को टक्कर दी और बघेल वंश के महाराजा कर्णदेव जिन्होंने अलाउद्दीन खिलजी को टक्कर दी. गुजरात के क्रन्तिकारी महीकांत थे जिन्होंने 1836 में ही अंग्रेजो के खिलाफ सशस्त्र आन्दोलन चला दिया था. डॉ. जीवराज मेहता, गणेश वासुदेव मालवेंकर, अशोक मेहता आदि गुजराती स्वाधीनता सेनानियों ने दिल्ली तक अंग्रेजों की नींद उड़ा रखी थी. लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल को कौन नहीं जानता.

अंग्रजों ने गुजरात की रियासतों की अनेक बहादुर सेनाओं को अपनी सेना में शामिल किया था जैसे भावनगर, नवानगर, बरोडा, राजकोट, पोरबन्दर, कच्छ आदि अंगेजों के ज़माने में काठियावाड़ रेजिमेंट होती थी जिसे राजपूत रेजिमेंट में मर्ज किया गया था और भावनगर सेना को 15 Calvary में मर्ज किया गया था.

अंग्रेजों के ज़माने से आज तक राजकोट शहर सेना का बहुत बड़ा भर्ती केंद्र है, यहाँ तक की बलूच रेजिमेंट की भर्ती और शुरुआत राजकोट में ही हुई. आजादी के बाद बरोडा स्टेट इन्फेंट्री को मराठा लाइट इन्फेंट्री में मर्ज किया गया. सरदार पटेल ने जूनागढ़ पर कब्ज़ा करने के लिए काठियावाड़ डिफेंस फ़ोर्स को भेजा था.

(चित्र : बरोडा स्टेट इन्फेंट्री का बैज )

कच्छ और सौराष्ट्र सेना को मिला कर 7th ग्रेनेडियर्स बनाया गया. सौराष्ट्र इन्फेंट्री को 18th राजपुताना राइफल्स में मर्ज किया गया. जिसे अब 122 राजपुताना इन्फेंट्री कहा जाता है. उषा सेठ की पुस्तक ‘सलाम सैनिक’ में 1965 और 1971 के युद्ध में शहीद हुए गुजरात के सैनिको का वर्णन है.

भारतीय सेना के मेजर जनरल अशोक के मेहता गुजराती थे जिन्होंने Portuguese-Indian War, Indo-Pakistani War of 1965, Indo-Pakistani War of 1971, Siachen conflict, Indian Peace Keeping Force श्रीलन्का में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. गुजरात से ऐसे सैकड़ो सैन्य ऑफिसर आर्मी, नेवी व एयरफोर्स में हुए हैं. बॉम्बे कमांड के अंतर्गत Bombay, Baroda and Central India Regiment आते है. इसलिए सेना का फील्ड मार्शल मानकशॉ यह कहे कि सेना में एक भी गुजराती नहीं है, यह असंभव है.

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