ग्वारपाठा न सही, एलोवेरा ही सही, है तो अपना ही

भगवद् गीता क्या है? अधिकाँश लोगों का जवाब होगा – धार्मिक ग्रंथ. सही है, धार्मिक ग्रंथ तो है ही पर कुछ सालों से इसकी एक और पहचान सामने आई है. 1856 में न्यू जर्सी में एक रोमन कैथोलिक यूनिवर्सिटी की स्थापना हुई थी, जो पूरी तरह स्वतंत्र है मतलब सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है.

इस यूनिवर्सिटी का नाम है सेटोन हॉल यूनिवर्सिटी. साल 2008 से यहाँ भगवद् गीता पढ़ना अनिवार्य कर दिया गया है. यहाँ पढ़ने वाले एक तिहाई छात्र ही नॉन क्रिश्चियन हैं, जिसमें भारतीय भी हैं.

हमारे और यूरोपियन देशों में एक अंतर है. हम भेड़चाल में विश्वास करते हैं और वो शोध की कसौटी पर परखने में. जिस गीता को हमने बुजुर्गों के पढ़ने वाली पुस्तक समझा, उस पर शोध करके पश्चिमी देशों ने उसमें से मैनेजमेंट के प्रैक्टिकल ज्ञान को ढूंढ निकाला.

आज श्रीकृष्ण को महान मैनेजमेंट गुरु का पद दिया जा रहा है. विश्व मान रहा है कि सदियों पहले श्रीकृष्ण ने युद्धक्षेत्र में अर्जुन को जो गीता ज्ञान दिया था. उसमें उन्होंने श्रम बंटवारे, अधिकार, जिम्मेदारी, नेतृत्व के गुणों की और प्रेरणा की जैसी व्याख्या की है वो अदभुत है.

मैनेजमेंट की मॉर्डन या वेस्टर्न अवधारणा में जो है वो सब भगवद् गीता में विस्तार से तो समझाया ही गया है, साथ ही साथ आधुनिक मैनेजमेंट शिक्षा में जो कमी है उसका भी समाधान गीता में मिलता है.

आधुनिक मैनेजमेंट में समस्याओं से निपटने के लिए बाहरी तौर पर श्रम किया जाता है, जबकि गीता समस्या के बुनियाद में जा कर उसको सुलझाना सिखाती है. इसके कारण ही मैनेजमेंट के क्षेत्र ने भगवद् गीता को महत्व देना शुरू किया.

चूंकि इसमें बताए गए अहम सिद्धांत आज के युग में भी कंपनियों की उत्पादकता बढ़ाने में और कर्मचारियों की कार्यक्षमता बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं, इसलिए बहुत सारी कंपनियाँ अपने कर्मचारियों को स्पेशल ट्रेनिंग दिलवा रही हैं. मैनेजमेंट कॉलेज अपने शिक्षकों को आधुनिक कृष्ण बना कर ढेर सारे अर्जुन को गीता ज्ञान दिलवा रहे हैं.

जैसी हमारी परम्परा है जब हमारी कोई चीज विदेश से सत्यापित हो जाती है तब हम भी उसको महत्व देने लगते हैं. योग जब योगा बन कर आया तब हम उसके दीवाने हुए, ग्वारपाठा जब एलोवेरा बना तब घर-घर की शान बना.

इसी तरह गीता जब मैनेजमेंट गुरु बनी तब हमारे यहाँ भी राजस्थान यूनिवर्सिटी के कॉमर्स और मैनेजमेंट कॉलेजों के पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्सेस में गीता और रामायण को शामिल किया गया है.

पिछले साल से मुम्बई नगरपालिका अपने 1200 स्कूलों में लगभग साढ़े चार लाख बच्चों को गीता पढ़ा रहा है, जिससे बच्चों में अधिक तेजी से निर्णय लेने की क्षमता और दक्षता विकसित हो.

अभी तक यदि आपके घर में गीता और रामायण को स्थान नहीं मिला है तो देर मत करिए. बुजुर्ग तो घर में आजकल रहते नहीं हैं इसलिए बच्चों के लिए ही भगवद्गीता ले आइए.

भगवद्गीता पढ़ने से आप साम्प्रदायिक तो नहीं होंगे… मैनेजमेंट गुरु ज़रूर बन सकते हैं… ग्वारपाठा न सही, एलोवेरा ही सही, है तो अपना ही.

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