कैलकुलस के वास्तविक खोजकर्ता कौन : न्यूटन, लैब्नीज़ या भारतीय गणितज्ञ

गणित की एक महत्वपूर्ण शाखा है – कैलकुलस या कलन. गणित की इस शाखा में चर राशियों के सूक्ष्म परिवर्तन का अध्ययन किया जाता है. कैलकुलस के दो भाग है – अवकलन ( डिफरेंशियल कैलकुलस) तथा समाकलन (इंटीग्रल कैलकुलस). विज्ञान, इंजीनियरिंग, अर्थशात्र आदि के सिद्धांतों की व्युत्पत्ति तथा अनुप्रयोगों में कैलकुलस का उपयोग होता है. आधुनिक विज्ञान, इंजीनियरिंग, अर्थशास्त्र की प्रगति कैलकुलस के बिना असंभव है. छात्रों को यह पढ़ाया जाता है कि कैलकुलस की खोज सत्रहवीं शताब्दी की शुरुआत में अंग्रेज गणितज्ञ सर आइज़क न्यूटन तथा जर्मन गणितज्ञ लैब्नीज़ ने की थी . इन दोनों को कैलकुलस का पिता माना जाता है.

लेकिन भारत में कैलकुलस का उपयोग हिन्दू गणितज्ञों द्वारा छठवीं शताब्दी से ही किये जाने के प्रमाण मिलते है. दसवीं शताब्दी तक भारत के गणितज्ञों में कैलकुलस का प्रयोग व्यापक था. फिर सत्रहवीं शताब्दी के न्यूटन तथा लैब्नीज़ कैलकुलस के जनक कैसे हो गए? इस लेख में हम एक महत्वपूर्ण प्रश्न – ‘कैलकुलस के वास्तविक खोजकर्ता कौन थे? न्यूटन, लैब्नीज़ या भारतीय गणितज्ञ’ का उत्तर खोजने का प्रयास करेंगे.

न्यूटन द्वारा लिखित कैलकुलस की प्रथम पुस्तक

सर आइज़क न्यूटन (1642 –1727) एक प्रसिद्ध अंग्रेज वैज्ञानिक एवं गणितज्ञ था. इन्होने 1680 में कैलकुलस सम्बन्धी अपनी खोज प्रकाशित की. इस पुस्तक का नाम था – ‘methods of flexions’ जिसमे कैलकुलस के सिद्धांतों को प्रथम बार बताने का दावा किया जाता है. लैब्नीज़ (1646- 1716), जिसका पूरा नाम -Gottfried Wilhelm von Leibniz था, एक जर्मन गणितज्ञ था. इसे भी कैलकुलस का स्वतंत्र खोजकर्ता माना गया है. लैब्नीज़ की कैलकुलस सम्बन्धी प्रमेय प्रथम बार एक जर्नल Acta Eruditorum में 1684 में प्रकाशित हुई.

यद्यपि न्यूटन और लैब्नीज़ खुद को स्वतंत्र खोजी बता कर एक दूसरे पर अपनी कैलकुलस चुराने का आरोप लगाते रहे और लैब्नीज़ की मृत्यु तक दोनों इस बात को ले कर झगड़ते रहे, जबकि दोनों जानते थे कि यह भारतीय ज्ञान उन्होंने इटली के गणितज्ञों से प्राप्त किया है.

किन्तु यह ज्ञान इटली के गणितज्ञों को कैसे प्राप्त हुआ?

इटली का एक समुद्री व्यापारी व जहाजी मार्को पोलो सन 1295 में भारत आया. मार्को पोलो ने लगभग एक वर्ष तमिलनाडु और केरल में बिताया. वह भारत से अनेक मूर्तियां और संस्कृत भाषा की अनेक पुस्तकें इटली ले गया था.

इटली के वेनिस शहर में एक म्यूज़ियम है. इसमें मार्को पोलो के द्वारा भारत से लायी गयी अनेक कलाकृतियां और पेंटिंग है. साथ ही मार्को पोलो द्वारा बनवाई गयी पेंटिंग भी है. जो भी यूरोप टूर पर जाते हैं उन्हें वेनिस में यह संग्रहालय अवश्य दिखाया जाता है. इस संग्रहालय के कक्ष क्रमांक 12 से 15 तक रोमन शैली की प्राचीन पेंटिंग्स लगायी गयी है. एक स्थान पर मार्को पोलो की पेंटिंग्स स्थापित हैं. जिसमें दिखाया गया है कि भारत के बंदरगाह और शहर अत्याधिक समृद्ध हैं.

एक पेंटिंग में मार्को पोलो रोम के सम्राट को एक पुस्तक भेंट कर रहा है. इस चित्र के नीचे लगी काष्ठ पट्टिका में लिखा है – “Marcopolo presenta libro indiano sul calcolo di Sacro Romano Imperatore Enrico VII” अर्थात मार्को पोलो रोमन सम्राट हेनरी – सप्तम को भारत से लायी गयी कैलकुलस की पुस्तक भेंट दे रहा है. इससे यह भी पता चलता है कि उन दिनों यूरोप के सम्राटों में भारत के ज्ञान की कितनी अधिक प्रतिष्ठा थी. इसी संग्रहालय में एक अन्य पेंटिंग्स के बगल में लगी पट्टिका पर लिखा है – “Del Sacro Romano Impero Ferdinando I che dà il libro di calcolo indiano a Bonaventura Francesco Cavalieri 1634” अर्थात – रोमन सम्राट ferdinando- प्रथम भारतीय कैलकुलस की पुस्तक Bonaventura Francesco Cavalieri को दे रहें है सन 1634.

इटली के गणितज्ञ और ज्योतिषी बोनात्ति (Guido Bonatti of forli), जिनकी मृत्यु 1300 में हुई, ने अपनी पुस्तक में मार्को पोलो द्वारा भारत से लायी हुई गणित की पुस्तको का वर्णन किया है. वेनिस के एक अन्य गणितज्ञ Niccolò Fontana Tartaglia (1499 –1557) की पुस्तक ‘Nova Scientia’ जो 1556 में प्रकाशित हुई में लिखा है “a mio avviso il libro indiano di flussioni è grande classica in matematica che dimostra altamente intellettuali di Archimede e le opere di Euclide, che ho tradotto in italiano.”

अर्थात – ‘in my view the Indian book of fluxions is great classical in mathematics which shows highly intellectuals than Archimedes and Euclid’s works which I translated in Italian.’ (मेरे विचार से fluxion की भारतीय पुस्तक गणित का एक महान शास्त्रीय ग्रंथ है जिसमे आर्कमडीज और युक्लिड से भी अत्यधिक बुद्धिमत्ता प्रकट होती है, जिसे मैंने अनुवादित किया है). ध्यान दें कि यहाँ कैलकुलस की जगह fluxion शब्द का प्रयोग किया गया है.

कावालिरी Bonaventura Francesco Cavalieri (in Latin, Cavalerius) (1598 –1647) जिसे रोमन सम्राट ferdinando- प्रथम ने भारतीय कैलकुलस की पुस्तक भेंट की, एक उच्च कोटि का गणितज्ञ था. इसने रेखागणित, प्रकाश, गति, लोगरिथम पर कार्य किया. कावालिरी के गणित के कार्य का अध्ययन न्यूटन, पास्कल, मैकलौरन आदि ने किया. यहीं से कैलकुलस का ज्ञान अंग्रेजो को मिला.

इटली का एक अन्य गणितज्ञ था बिगोलो Leonardo Pisano Bigollo (c. 1170 – c. 1250) जिसे फिबोनासी (Fibonacci) के नाम से जाना जाता है. यह रोमन सम्राट फ्रेडेरिक द्वितीय का कृपापात्र था. सम्राट ने इसे गणित का ज्ञान प्राप्त करने हेतु अरब व भारत भेजा था. सन 1240 में गणित पर प्रकाशित इसकी पुस्तक का मुखप्रष्ठ देखिये – मुखपृष्ठ पर फिबोनासी एक ब्राह्मण गुरु से गणित का ज्ञान प्राप्त कर रहा है. फिबोनासी का भारतीय गणित गुरु संभवतः भास्कराचार्य द्वितीय थे, जिन्होंने ब्रह्मगुप्त के गणितीय सिद्धांतों को फिबोनांसी को पढाया था.

फिबोनासी की इस पुस्तक के मुखपृष्ठ के चित्र को वृहद (enlarge) करके देखने पर –

स्पष्ट है कि प्राचीन समय में रोमन विद्यार्थी भारत से ही गणित का ज्ञान प्राप्त करते थे.

भारतीय गणितज्ञ और कैलकुलस : सूर्य चन्द्र का ग्रहण काल निकलने में वराह मिहिर (505–587 CE) ने कुछ सूत्रों का प्रयोग किया जो कैलकुलस के हैं, लेकिन उन्होंने कैलकुलस को पृथक शाखा नहीं माना था. भारतीय गणितज्ञ मंजुला (932 AD) ने स्पष्ट रूप से कैलकुलस का प्रयोग किया. मंजुला ने कैलकुलस के अनेक सूत्र प्रतिपादित किये – उनके अनुसार sin w’ – sin w = (w’ – w) cos w, जबकि (w’ – w) अति सूक्ष्म हो. एवं δu = δv ± e cos θ δ θ. भास्कराचार्य-II (1114–1185) को मंजुला के सूत्रों का ज्ञान था, वे सिद्धांत शिरोमणि में लिखते हैं – δ (sin θ) = cos θ δ θ.

भारतीय ज्योतिष में ग्रहों की तात्कालिक गति व सूक्ष्मगति की गणना सम्बन्धी समस्या को हल करने के लिए कैलकुलस का उपयोग भास्कराचार्य-II ने किया. ग्रहों की काल गणनाओं, तात्कालिक गति व सूक्ष्मगति निकालने वाले अध्याय को ‘काल-कोलाष‘ नाम दिया गया है. संभवतः यही ‘काल-कोलाष’ अंग्रेजों का ‘कैलकुलस’ बना. भास्कराचार्य ने derivative के लिए ‘फ़लाक्ष’ शब्द का प्रयोग किया.

वे लिखते हैं – “ज्या का फ़लाक्ष कोज्या होता है”. Means d sinx/dx = cos x
“किसी राशि की द्विघात का फ़लाक्ष उस राशि के द्विगुण होता है”. Means d x2/dx = 2x

भारतीय गणितज्ञ derivative के स्थान पर फलाक्ष शब्द का उपयोग सन 1150 AD से कर रहे है. यह भी देखने वाली बात है कि न्यूटन ने भी अपनी पुस्तक में derivative के स्थान पर FLUXION (फलाक्ष) शब्द का उपयोग 1680 AD में किया था. यद्यपि भास्कराचार्य ने क्षेत्रफल निकालने हेतु इंटीग्रल कैलकुलस का उपयोग भी किया था लेकिन वह बड़ी प्रारंभिक अवस्था में था.

सन 1300 से 1632 तक केरल का गणित अत्यंत उच्च अवस्था में था जिसे Kerala school of astronomy and mathematics कहा जाता है. जिसमे परमेश्वर, नीलकंठ सोमयाजी, ज्येष्ठ देव, अच्युत पिशारती, मेलपथुर नारायण भट्टाथिरी, अच्युत पणिक्कर जैसे अनेक महान गणितज्ञ हुए. इन्होने कैलकुलस व अनंत श्रेणी को सम्पूर्ण ऊंचाइयों तक पहुचाया. अंग्रेज गणितज्ञ विश whish लिखता है – ‘केरल गणित में fluxion के तरीकों की पूर्ण प्रणाली विकसित कर ली गयी और अनंत श्रेणी के सिद्धांत जो प्राप्त हुए वे दुनिया के किसी देश में नहीं पाए जाते. भारतीय गणितज्ञ माधव के कार्य से न्यूटन और लैब्नीज़ को प्रेरणा मिली.’ भारत के केरल के महान गणितज्ञ माधव ने चौदहवीं शताब्दी में कैलकुलस के कई महत्वपूर्ण अवयवों की चर्चा की. उन्होने टेलर श्रेणी, अनन्त श्रेणियों का सन्निकटीकरण (infinite series approximations), अभिसरण (कन्वर्जेंस) का इन्टीग्रल टेस्ट, अवकलन का आरम्भिक रूप, अरैखिक समीकरणों के हल का पुनरावर्ती (इटरेटिव) हल, यह विचार कि किसी वक्र का क्षेत्रफल उसका समाकलन होता है, आदि विचार (संकल्पनाएं) उन्होने न्यूटन के जन्म से 200 साल पहले लिख दिया.

एक फ़्रांसिसी मिशनरी फादर Jordanus Catalani 1320 में भारत आया. ये भारत का प्रथम बिशप था. ये गुजरात, केरल, मंगलोर और ठाणे में रहा. इसने गणित, विज्ञान, धातुकर्म, पशु चिकित्सा के अनेक भारतीय ग्रंथों का अनुवाद किया और फ़्रांस ले गया. Jordanus ने एक पुस्तक लिखी जिसका अंग्रेजी शीर्षक है वंडर्स ऑफ़ द ईस्ट. इस पुस्तक में वे लिखते हैं – “पंडितों ने ब्रह्माण्ड की आयु ट्रिलियन वर्ष निकाल रखी है. ये लोग ज़ीरो और दशमलव पद्धति का उपयोग करते हैं. इनको ज्यामिती, ट्रिगनॉमेट्री, कैलकुलस और खगोलीय गणनाओं का पूर्ण ज्ञान है. ये लोग मानते है कि पृथ्वी पर इंसानी सभ्यता का अस्तित्व भी ट्रिलियन वर्ष से है. पंडित सटीक खगोलीय गणना करते हैं और सूर्य केन्द्रित सौर प्रणाली मानते है तथा ग्रहों उपग्रहों की कक्षा अंडाकार मानते हैं. ये लोग precession of the equinoxes की गणना करते हैं.” भारत आये जेसुइट पादरियों ने भी कैलकुलस की पुस्तकों का अनुवाद किया और यूरोप ले गए.

सारांश – भारतीय गणितज्ञ 6वीं शताब्दी से ही कैलकुलस का उपयोग कर रहे थे. सन 1300 में केरल में गणित घराना अत्यंत विकसित था. जिन्होंने डिफरेंशियल और इंटीग्रल कैलकुलस के सभी प्रमेय व सूत्र खोज लिए थे, जिसे फलाक्ष कहा जाता था. भारतीय गणित की बहुत सारी पुस्तकों का अनुवाद पादरियों द्वारा इटालियन (रोमन) भाषा में हुआ, जिसे मार्को पोलो इटली ले गया. इटली के गणितज्ञों से कैलकुलस न्यूटन और लिब्नीज के पास पंहुचा.

और अधिक जानकारी के लिए देखिये

https://youtu.be/9o9SgPv1x3Y

https://www.math10.com/en/maths-history/math-history-in-india/hindu-maths/hindumaths.html

https://en.wikipedia.org/wiki/Bh%C4%81skara_II

https://en.wikipedia.org/wiki/Brahmagupta%E2%80%93Fibonacci_identity

http://en.wikipedia.org/wiki/Kerala_school_of_astronomy_and_mathematics

http://discovermagazine.com/2008/jan/calculus-was-developed-in-medieval-india

http://indianrealist.com/2009/01/26/how-jesuits-took-calculus-from-india-to-europe/

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