जरूर सुनें अचेतन मन के संदेश

आज के तनाव भरे माहौल में ऐसा कोई इंसान नहीं जिसे किसी भी तरह की शारीरिक परेशानी या मानसिक उलझन ना हो. इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल होने से हमारे देखने सुनने की नैसर्गिक क्षमतायें कुंद सी जो गई है. यही कारण है कि मनुष्य का शरीर उसका ध्यान आकर्षित करने के लिये कठोर भाषा अपनाती है, जो हमें बीमारियों के रुप में अपने शरीर में नज़र आने लगती है. पेट दर्द, सिरदर्द, या फिर कोई लाइलाज मर्ज. ये सब हमारे अवचेतन मन के संदेश हैं, जिसे हम रोजमर्रा की भागदौड़ वाली ज़िन्दगी में अनदेखा व अनसुना करते रहते हैं.

हमारा कॉन्शस माइंड यानि सचेत मन, मनुष्य के समूचे अस्तित्व का दसवाँ हिस्सा भर है. ये कहना गलत न होगा कि सचेतन मन, अवचेतन मन का छिलका भर है. उसी छिलके को हम सुसंस्कृत, सभ्य, और शिक्षित बनाते हैं. सही-गलत, धर्म-कर्म, नीति-अनीति सिखाते हैं और फिर इसी अचेतन मन की परतों को अनदेखा भी करते जाते हैं. जब हम बहुत क्रोध, डर, ईर्ष्या, द्वेष, दुःख आदि में अंदर ही अंदर घुट रहे होते हैं तो यह अंतस में दबते दबते नासूर बन जाता है और फिर इससे निकलने वाले रसायन धमनियों में बहने वाले रक्त कणों में मिलकर शरीर को कमजोर बनाते हैं, जिसके फलस्वरूप हम बीमार होते चले जाते हैं.

कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य की तीन अवस्थाओं में रोग, निरोग और नैरोग्य यानि वेलनेस में, नैरोग्य (वेलनेस) का बहुत गहरा संबंध हमारे शरीर और मन से होता है. जब जब देह और मन का संतुलन आपस में बिगड़ता है तब तब हम बीमार होते हैं.

अगर हम अपनी डेली रूटीन लाइफ में मेडिटेशन को प्राथमिकता दें, ध्यान के द्वारा अपने शरीर से संवाद करें, रिलैक्स होकर अवचेतन मन के संदेश को सुनें तो अपने शारीरिक और मानसिक कष्ट को बहुत हद तक कंट्रोल कर सकते हैं. शरीर और मन के बीच जितना सुदृढ तारतम्य स्थापित होगा, हम न केवल शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी खुद को स्वस्थ रख पायेंगे और एक स्वस्थ समाज के निर्माण में अपना बहुमूल्य योगदान भी दे पायेंगे.

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