लालू के पदचिह्नों पर तेजप्रताप

रविवार को बिहार के पटना में हुई विपक्षी दलों की ‘भाजपा भगाओ, देश बचाओ’ रैली में विपक्ष की एकता को एक ताने बाने में बुनने का प्रयास हुआ. अखिलेश यादव, शरद यादव, ममता बनर्जी के साथ कांग्रेस के भी नेता मंच पर दम भरते दिखाई दिये. यह बात अलग है कि इस एकता को बनाने के लिये रैली से पहले पिछली 17 तारीख को दिल्ली में हुई बैठक में विपक्ष के 17 दलों के प्रतिनिधि मौजूद थे जो आज घटकर 14 रह गये. मायावती और सीताराम येचुरी ने रैली से दूरी बना ली तो केजरीवाल को रैली में शामिल होने का न्यौता ही नहीं मिला था.

रैली के दौरान ही जनसमूह को लेकर भी दावे होने शुरु हो गये. तेजस्वी यादव ने पच्चीस लाख की भीड़ बताई तो लालू ने उनसे भी आगे जाते हुये लोगों की संख्या तीस लाख तक पंहुचा दी. हालाँकि उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी और मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने इसे फ्लॉप करार दिया. शाम होने से पहले रैली की भीड़ को लेकर ट्वीटर पर ट्रोल भी शुरू हो गया. लालू यादव ने गांधी मैदान की जिस तस्वीर को ट्वीट करके तीस लाख लोगों की भीड़ बताया उसका सच कुछ ही देर में सामने आ गया और तस्वीर फोटोशॉप बतायी जाने लगी. इस बात को लेकर ट्वीटर पर तेजस्वी और लालू को जमकर ट्रोल भी किया गया.

बहरहाल इन सब मुद्दों से अलग मुझे तेजप्रताप यादव में भविष्य का लालू नजर आया. बोलचाल और हावभाव से वह पूरी तरह से लालू यादव का कट पेस्ट नजर आये. पूरे भाषण में कोई मुद्दा नहीं बस लफंगई वाली भाषा और ताली बजवाने के लिये बेहूदा शब्दों का प्रयोग करते हुये उटपटांग हरकतें. शिष्ट तो जब अपने पूरे जीवन में लालू ही नहीं हो सके तो फिर उनके महान बेटों से इसकी उम्मीद भी बेमानी है.

भोजपुरिया लहजे में हिन्दी के शब्दों को बोलकर बिहार की जनता में हीरो बन जाना लालू से बेहतर कौन जान सकता है. तेजस्वी यादव भले ही थोड़े परिपक्व नजर आते हों लेकिन तेजप्रताप अपने पिता की शैली का अनुसरण करके उनसे ज्यादा तालियां बटोर ले गया. विपक्षी एकता और रैली से संबंधित मुद्दों का भले ही पूरे भाषण में कोई जिक्र तक नहीं किया गया हो, लेकिन शंख बजाकर और संघ प्रमुख मोहन भागवत को हाफमाइंड बोलकर बेशक वह भीड़ को उत्साहित करते नजर आये.

वैसे रैली के बाद इस एकता का क्या हश्र होगा यह तो अभी भविष्य के गर्त में है. लेकिन अब तक के उदाहरण और अन्य विपक्षी दलों की प्रतिक्रियाएं देखकर इस पर शंका होना वाजिब है. मायावती और येचुरी ने रैली में शामिल होना उचित नहीं समझा तो सबसे बड़ी विपक्षी दल के नेता ने रैली की बजाय विदेश जाना ज्यादा पसंद किया.

फिर भी बंगाल मे ममता बनर्जी और बिहार में लालू और शरद यादव की जोड़ी के साथ यूपी में अखिलेश की अभी भी इतनी जमीन है कि इन राज्यों में भाजपा के माथे पर शिकन लाने का कारण बन सकती है. रैली के बाद अगले लोकसभा चुनावों तक अगर यह एकता कायम रहती है तो निश्चित तौर पर भाजपा को इन तीनों राज्यों में इनसे पार पाना कठिन साबित हो सकता है. लेकिन देश के सर्वाधिक महत्वाकांक्षी लोगों का गठबंधन कब तक कायम रहता है यह देखने वाली बात है.

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