शिक्षा का अभाव और बेरोजगारी खड़ी करती है बाबाओं की फौज

अभी हाल मे ही CBI अदालत ने बाबा राम रहीम को बलात्कार के मामले में दोषी करार दिया तो तीन प्रदेशों का जीवन अस्तव्यस्त हो गया. कुछ लोग बाबा राम रहीम के समर्थकों पर दोष दे रहे हैं कुछ लोग प्रदेश सरकार विशेषकर हरियाणा सरकार को इसका ज़िम्मेवार मान रहे हैं और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो पुलिस और प्रशासन की असफलता मान रहे हैं.

कहीं सभी धर्म गुरुओं पर आपराधिक गतिविधियों में लिप्त होने की बात कही जा रही है तो कहीं भक्तों को अंध भक्त होने की दलील दी जा रही है. कहीं अशिक्षा और कहीं बेरोजगारी को इसका कारण बताया जा रहा है. मेरी व्यक्तिगत राय में यह एक जटिल मामला है और बिना इसकी पूर्ण पड़ताल को समझे हम भविष्य में भी शायद ऐसी घटनाओं को नहीं रोक पाएंगे.

ऐसे कितने ही धर्म गुरुओं पर पहले भी लांछन लगे हैं, कुछ आज़ाद घूम रहे हैं और कुछ पकड़े भी गए हैं. परंतु सभी धर्म गुरु ऐसी घटनाओं को करते हैं और आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हैं ऐसा भी नहीं कहा जा सकता. यह अभी हो रहा है ऐसा कहना भी न्यायसंगत नहीं होगा. आपको याद होगा की 1984 में स्वर्ण मंदिर में भी एक तथाकथित धर्म गुरु ने भारतीय सेना से टक्कर लेने की व्यवस्था कर ली थी. यह भी कहा जाता है इस सबको (जो अवैध कार्य करते हैं) विदेशी शक्तियों का समर्थन प्राप्त है.

परंतु इस पूरे प्रकरण मे मेरे विचार से तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल बिहारी जी, उन CBI के अधिकारियों और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और पीड़िता जिसने अपनी जान की परवाह किए बिना अदालत में बयान दिये हैं, सभी श्रेय के पात्र हैं.

अब इस प्रश्न पर विचार करें कि क्यों इतने समर्थकों को पंचकुला पहुँचने दिया. दरअसल उनको रोकने का काम जिनका था उनमें से भी बहुत से लोग बाबा राम रहीम को अपना भगवान मानते हैं चाहे उसमें प्रशासन के लोग हों या पुलिस बल के लोग. दरअसल पुलिस और प्रशासन के ये वही लोग हैं जिन्हें हमारे नेता तथाकथित गुरु से आशीर्वाद लेने के समय ले गए थे. और वह सब भी उन्हें कल तक तो भगवान ही मानते थे. अब एक ही झटके में, जो कल तक नतमस्तक होते थे अपने भगवान के सामने, उनसे यह उम्मीद रखना भी मेरे विचार से गलत हैं. उनमें से बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्हें प्रशासन और पुलिस बलों में उसी तथाकथित धर्म गुरु ने अपने आप सिफ़ारिश करके नौकरी दिलवाई है. तो इस प्रकार से तथाकथित धर्म गुरु उनका अन्नदाता ही था. यह धर्म गुरु अपने शिष्यों को प्रशासन में और सरकारी महकमों में इसी लिए लगवाते हैं जिससे समय पड़ने पर वह अपना बचाव कर सकें.

अब रही बात उन नेताओं की जिन्हें इसमें हस्तक्षेप करना था, आप यह समझिए नेता को लोकतन्त्र में जनता या वोटर बनाता है. आज की राजनीतिक स्थिति है कि हर नेता को अपने वोट पाने के लिए धर्म गुरु ही नहीं, बल्कि जिसकी समाज में कुछ पहचान होती है, उसके पास पहुंचाना चाहते हैं. समाज सेवी हो या उद्योगपति हो या धर्म गुरु सबके पास इन्हें अपने वोट के लिए आना है. इसके विपरीत यदि उन्हीं नेताओं ने अपने समय में अपनी जनता की सेवा की हो तो शायद उन्हें मात्र जनता के पास वोट मांगने पड़े. बाबा के दोषी करार होने के बाद भी नेताओं को पंचकुला या सिरसा में लाखों जनता नहीं बल्कि लाखों वोटर नज़र आ रहे थे जिसके कारण उन्हे अगले चुनाव में हार का डर सताने लगेगा.

अब अंत में बात करते हैं डेरा समर्थकों की तो इस निर्णय से पहले तो सब बाबा को भगवान ही मानते थे और उनमें अगाध श्रद्धा रखते हैं. इसमें से ऐसे लोग जिनकी कुछ साख होती है उनपर तथाकथित गुरु इतनी मेहरबानी करते हैं कि उनकी रोज़ी रोटी की व्यवस्था गुरु जी करते हैं. अब यहीं पर देख लीजिये 200 बिस्तर का अस्पताल, 400 दुकानें और कुछ स्कूल और कॉलेज. अब जितने लोग भी इसी के व्यवसाय से अपनी रोज़ी रोटी कमाते हैं उनके लिए तो गुरु अन्नदाता ही होगा. इसी प्रकार जिन लोगों ने उन कॉलेज से शिक्षा ले कर नौकरी कर ली उनके लिए गुरू गलत कैसे होगा? उनमें उसी पर एक ही अदालत के फैसले में अश्रद्धा कैसे होगी.

एक और उदाहरण से समझे यदि एक तस्कर, तस्करी के पैसे से एक होटल खोल ले या कुछ और व्यवसाय करले और उसमें जितने भी लोग काम करेंगे तो वह तो अवैध काम नहीं कर रहे और उनके लिए वह तस्कर एक अन्नदाता ही रहेगा. आप जानते हैं कि हर अवैध काम के पैसे को दिखाने के लिए ऐसे काम किए जाते हैं. यह मुझे याद आया शक्ति फिल्म में जब दिलीप कुमार (DCP अश्वनी कुमार), अपने पुत्र अमिताभ (विजय) से कुलभूषण खरबन्दा (KD NARANG) के होटल में काम करने को मना करते हैं तो अमिताभ का उत्तर देखिये “ मैं उसके होटल में काम करता हूँ और होटल तो कोई गैरकानूनी काम नहीं है”

अब इस देश मे बेरोजगारी और गरीबी इतनी है कि बहुत से लोग इस सच्चाई को जानते बूझते भी इस प्रकार के गुरुओं का साथ देते हैं क्योंकि उनसे धन प्राप्त होता हैं. आप आज की कश्मीर सरकार की नीतियों को देखें. यदि कोई आतंकवादी मारता है तो सरकार उसके परिवार को वजीफा देती है यह कह करके कि उसके परिवार का क्या दोष? उस परिवार का बच्चा मर गया है उसके परिवार की देखभाल करना हमारा कर्तव्य है. इसीलिए कश्मीर के युवा सेना से बेहतर आतंकवादी बनना चाहते हैं. यदि कोई धर्म गुरु यह कह दे कि मुझ पर आंच आने के बाद यदि किसी समर्थक की जान भी चली जाये तो उसके परिवार की ज़िम्मेवारी मैं लूँगा तो उसके समर्थक भावोवेश में किसी भी हद तक जा सकते हैं.

अब आप यह भी समझें कि इस प्रकार में संगत कौन सी होती है जो तर्क और विवेक का प्रयोग नहीं करती. दरअसल अधिकांश लोग जात पांत में बंटे हुए, गरीबी के बोझ तले, सामाजिक शोषण का शिकार इत्यादि होते हैं. उन्हे कोई भी अपने वश में भावनाओं में बहा कर ले जाता है. उनमें पहले से अविश्वास और स्वाभिमान की कमी है जिसे कोई भी बहका लेते हैं चाहे वह नेता हो या धर्म गुरु हो. जहां तक शिक्षा की बात है हमारी शिक्षा क्योंकि आज मात्र साक्षरता प्रदान करती है. असली शिक्षा जो जीवन के मूल्यों को समझने में मदद करे वह नहीं है. इसलिए आज कई शिक्षित भी इसी भ्रम जाल में पड़ जाते हैं.

मेरे विचार से देश की बेरोजगाई और असली शिक्षा का अभाव इसके बड़ा ज़िम्मेवार है. इस युग की तथाकथित शिक्षा से इसका निदान मिलना असंभव सा प्रतीत होता है.

इसके निदान के लिए समाज के हर व्यक्ति को विवेकशील सोच के साथ जीना प्रारम्भ करना होगा. नेता अपने वोट अपने काम पर पाएँ और लोग भी नेता को किसी के कहने पर नहीं पर अपने काम से वोट दें. ध्यान दीजिये नेता ऐसा होने में अवश्य रुकावट करेंगे क्योंकि उनकी दुकान स्वयं बंद होने का खतरा है.

अंत मे राम रहीम जानते हैं कि इनकी गलतियाँ पकड़ी गयी हैं. यदि नहीं तो इसके पास अभी भी उच्च न्यायालय में अपील करने का रास्ता है. उनके वकीलों ने बता दिया होगा कि अब कुछ उम्मीद नहीं है तभी तो उनके वरद हस्त पर समर्थक यह सब करने को राज़ी हो गए. यहाँ यह ज़रूर कहना चाहूँगा कि सभी साधू संत ऐसे ही हैं यह नहीं कहना चाहता. इसी देश में विवेकानंद, राम कृषण परम हंस, दयानंद इत्यादि भी रहे हैं.

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