संघ की पोल खोल भाग-6 : आज़ादी का आंदोलन और गद्दार संघ

कुछ दिन पहले ही संसद में मोदी जी ने निवृत्तमान उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी पर तंज कसते हुए कहा था कि आपके परिवार के लोगों ने खिलाफत आंदोलन में भाग लिया था जिस पर हामिद मियां खीसें निपोरते रह गए. वही खिलाफत आंदोलन जिसका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और डॉ हेगडेवार ने विरोध किया था. तो आखिर क्या था खिलाफत आंदोलन? जिसे सुनते ही हामिद मियां और कांग्रेस असहज हो उठी? जानने के लिए पूरी पोस्ट को अंत तक अवश्य पढ़ें.

खिलाफत जानने से पहले आइए पहले जरा खलीफा को जान लें. खलीफा एक अरबी शब्द है जिसे अंग्रेज़ी में Caliph (कैलिफ) या अरबी भाषा में Khalifah (खलीफा) कहा जाता है, तो कौन होता है खलीफा? खलीफा मुसलमानों का वह धार्मिक शासक (सुल्तान) होता है जिसे मुसलमान मुहम्मद साहब का वारिस या successor मानते हैं.

[संघ की पोल खोल भाग-1 : First Hand Experience]

खलीफा का काम होता है युद्ध कर के पूरे विश्व पर इस्लाम का निज़ाम कायम करना (जो कश्मीर में बुरहान वानी करना चाहता था), यानी इस्लाम की ऐसी हुकूमत कायम करना जिसमें इस्लामिक यानी शरिया कानून चले और जिसमें इस्लाम के अलावा किसी और धर्म की इजाज़त नहीं होती है. जितने हिस्से या राज्य पर खलीफा राज करता है उसे Caliphate यानी अरबी भाषा में Khilafa (खिलाफा) कहते हैं, खलीफा यानी इस्लामिक सुल्तान और खिलाफा यानी इस्लामिक राज्य.

1919-22 के दौरान Turkey यानी तुर्की में ओटोमन वंश के आखिरी सुन्नी खलीफा अब्दुल हमीद-2 का खिलाफा यानी शासन चल रहा था जो कि जल्दी ही धराशाई होने वाला था. इस आखिरी इस्लामिक खिलाफा (शासन) को बचाने के लिए अब्दुल हमीद-2 ने जिहाद का आह्वान किया ताकि विश्व के मुसलमान एक हो कर इस आखिरी खिलाफा यानी इस्लामिक शासन को बचाने आगे आएं.

[संघ की पोल खोल भाग-2 : संघ में जातिवाद]

पूरे विश्व में इसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई सिवाए भारत के. भारत के अलावा एशिया का कोई भी दूसरा देश इस मुहिम का हिस्सा नहीं बना, लेकिन भारत के कुछ मुट्ठी भर मुसलमान इस मुहिम से जुड़ गए और लाखों किलोमीटर दूर सात समंदर पार तुर्की के खिलाफा यानी इस्लामिक शासन को बचाने और अंग्रेज़ों पर दबाव बनाने निकल पड़े.

इस समय भारत खुद गुलाम था और अपनी आजादी के लिए संघर्ष कर रहा था, लेकिन अंततः 1922 में तुर्की से सुलतान के इस्लामिक शासन को उखाड़ फेंका गया और वहाँ सेक्युलर लोकतंत्र राज्य की स्थापना हुई और कट्टर मुसलमानों का पूरे विश्व पर राज करने का सपना टूट गया, इसी सपने को संजोए आजकल ISIS काम कर रहा है.

[संघ की पोल खोल भाग-3 : कम्युनल संघ]

भारत के चंद मुसलमानों ने अंग्रेज़ी हुकूमत पर दबाव बनाने के लिए बाकायदा एक आंदोलन खड़ा किया जिसका नाम था खिलाफा आंदोलन (Caliphate movement) अब क्योंकि अंग्रेज़ी में लिखे जाने पर इसका हिन्दी उच्चारण खलिफत होता है (अरबी में caliphate को khilafa=खिलाफा लिखते है) तो कांग्रेस ने बड़ी ही चतुराई से इसका नाम खिलाफत आंदोलन रख दिया ताकि देश की जनता को मूर्ख बनाया जा सके और लोगों को लगे कि यह खिलाफत आंदोलन अंग्रेज़ो के खिलाफ है.

जबकि इसका असल मकसद purely religious यानी पूर्णतः धार्मिक था, इसका भारत की आज़ादी या उसके आंदोलन से कोई लेना देना नहीं था, कुछ समझ में आया? कैसे शब्दों की बाज़ीगरी से जनता को मूर्ख बनाया जा रहा था, कैसे खलिफत को खिलाफत बताया जा रहा था, [ठीक वैसे ही जैसे Feroze Khan Ghandi (घांदी) को Feroze Gandhi (फ़िरोज़ गांधी) बना दिया गया].

[संघ की पोल खोल भाग-4 : संघ प्रचारकों का पर्दाफाश]

उस समय भारत में इतने पढ़े लिखे लोग और नेता नहीं थे कि गांधी-नेहरू की इस चाल को समझ सकें, लेकिन इन सब के बीच कांग्रेस में एक पढ़ा लिखा शख्स मौजूद था जिसका नाम था डॉ. केशव बलिराम हेगडेवार. इस शख्स ने इस आंदोलन का जम कर विरोध किया क्योंकि खिलाफा सिर्फ तुर्की तक सीमित नहीं रहना था, इसका उद्देश्य तो पूरे विश्व पर इस्लाम की हुकूमत कायम करना था जिसमे गज़वा-ए-हिन्द यानी भारत भी शामिल था.

डॉ हेगडेवार ने कांग्रेस के गांधी और नेहरू को बहुत समझने की कोशिश की लेकिन वे नहीं माने, अंततः डॉ हेगडेवार ने कांग्रेस के इस खिलाफत आंदोलन का विरोध किया और कांग्रेस छोड़ दी. तो अब समझ में आया मित्रों कि कांग्रेसी जो कहते हैं कि RSS ने आज़ादी के आंदोलन का विरोध किया था, तो वो असल में किस आंदोलन का विरोध था? आप डॉ हेगड़ेवार की जगह होते तो क्या करते? क्या आप भारत को गज़वा-ए-हिन्द यानी इस्लामिक देश बनते देखते? या फिर डॉ साहब की तरह इसका विरोध करते?

[संघ की पोल खोल भाग-5 : स्वाधीनता संग्राम और संघ का योगदान]

1919 में खिलाफत आंदोलन शुरू हुआ था और 1920 में डॉ हेगडेवार ने कांग्रेस छोड़ दी और सभी को इस आंदोलन के बारे में जागरूक किया कि इस आंदोलन का भारत की आज़ादी से कोई लेना देना नहीं है और यह एक इस्लामिक आंदोलन है. जिसका नतीजा यह हुआ कि यह आंदोलन बुरी तरह फ्लॉप साबित हुआ और 1922 में आखिरी इस्लामिक हुकूमत धराशाई हो गयी.

मुस्लिम नेता इस से बौखला गए और मन ही मन हिन्दुओं और RSS को अपना दुश्मन मानने लगे और इसका बदला उन्होंने 1922-23 में केरल के मालाबार में हिन्दुओं पर हमला कर के लिया और असहाय अनभिज्ञ हिन्दुओं को बेरहमी से काटा गया, हिन्दू लड़कियों की इज़्ज़त लूटी गई, जबकि इस आंदोलन का भारत या उसके पड़ोसी देशों तक से कोई लेना देना नहीं था.

1923 के दंगों में गांधी ने हिन्दुओं को ही दोषी ठहराते हुए हिन्दुओं को कायर और बुजदिल कहा था. गांधी ने कहा, हिन्दू अपनी कायरता के लिए मुसलमानों को दोषी ठहरा रहे हैं, अगर हिन्दू अपने जान माल की सुरक्षा नहीं कर सकता तो इसमें मुसलमानों का क्या दोष? हिन्दुओं की औरतों की इज़्ज़त लूटी जाती है तो इसमें हिन्दू दोषी है, कहा थे उसके रिश्तेदार जब उस लड़की की इज़्ज़त लूटी जा रही थी?

कुल मिला कर गांधी ने सारा दोष दंगा प्रभावित हिन्दुओं पर मढ़ दिया और कहा कि उन्हें हिन्दू होने पर शर्म आती है, जब हिन्दू कायर होगा तो मुसलमान उस पर अत्याचार करेगा ही.

डॉ हेगडेवार को अब समझ आ चुका था कि सत्ता के भूखे भेड़िये भारत की जनता की बलि देने से नहीं चूकेंगे, इसलिए उन्होंने हिन्दुओं की रक्षा और उनको एकजुट करने के उद्देश्य से तत्काल एक नया संगठन बनाने का काम शुरू कर दिया और अंतः 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई. आज अगर आप होली और दीवाली मना पाते हैं, आज अगर आप हिन्दू हैं तो सिर्फ उसी खिलाफत आंदोलन के विरोध और RSS की स्थापना की वजह से वरना जाने कब का गज़वा-ए-हिन्द बन चुका होता.

तो बताइये RSS और डॉ हेगड़ेवार ने खिलाफत आंदोलन का बहिष्कार कर के सही किया या गलत?

Sources :
1. https://simple.m.wikipedia.org/wiki/Caliphate

2. https://en.m.wikipedia.org/wiki/Khilafat_Movement

3. https://en.m.wikipedia.org/wiki/Rashtriya_Swayamsevak_Sangh

4. http://www.asthabharati.org/Dia_Oct%20010/dev.htm

5. https://en.m.wikipedia.org/wiki/K._B._Hedgewar

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