वामपंथियों के आतंक पर एक बोधकथा

दीपू एक स्कूल मास्टर का बेटा था. 1960 के दशक की बात है, तब मास्टरों की परिस्थिति बहुत खराब थी, अक्सर दूसरे मास्टर की बेटी ही मिलती थी. पिताजी स्कूल में साइन्स सिखाते थे लेकिन उनको व्यक्तिगत रुचि इतिहास में थी. दीपू को काफी कहानियाँ बताते थे. दीपू भी बड़े चाव से सुनता था. वैसे मास्टरजी बेटे को साइन्स पढ़ते ही थे लेकिन दीपू को उनसे साइन्स सीखने से ज्यादा रूचि उनसे इतिहास जानने में होती थी. लड़का वैसे बुद्धू नहीं था, अच्छे नंबर लाता था.

दीपू सातवी में होगा, जब उसे इतिहास में एक मुद्दे से दिक्कत हुई. उसने भरी क्लास में उठकर प्रश्न पूछने की अनुमति मांगी और प्रश्न पूछ डाला. इतिहास के शिक्षक वैसे तो कड़क थे लेकिन अनुशासन के साथ साथ न्यायप्रिय भी थे. ऊपर से दीपू के पिता उनके सहकर्मी होने के साथ अच्छे मित्र भी थे.

मुद्दा ज़रा अलग से संभालना जरूरी था. सो उन्होने इतना ही कहा कि “तेरा कहना सही नहीं है, एक काम कर, स्कूल के बाद मिलना, ठीक से समझा दूंगा. अभी इतना पोर्शन पड़ा है पूरा करने को, क्लास का समय इस पर नहीं लगाते”.

दीपू मान गया और स्कूल के बाद इतिहास के शिक्षक से मिलने गया. वे उसका ही इंतजार कर रहे थे. बोले, “बेटा, तुम्हारी शंका को लेकर तुम्हारे पिताजी से मैंने बात की है, उन्हें जो संदर्भ देने थे दे दिये हैं. वे ही तुझे समझा देंगे”.

दीपू घर आया, हाथ मुंह धोकर सब नित्यकर्मों से निपट कर रोज़ के जैसा पिताजी के पास बैठा. केमिस्ट्री की किताब खोली उसके पहले ही पिताजी ने वो इतिहास वाला विषय छेड़ा.

उत्साहित होकर दीपू बोला, “हाँ पिताजी, किताब में जो लिखा है वो, आप ने मुझे बताया था उसके बिलकुल विपरीत है, इसलिए मैंने बात उठाई”.

पिताजी सपाट स्वर में बोले, “बेटा उन्होने जो बोला है, वही उत्तर लिख दे”.

दीपू झुँझला उठा, “ऐसे कैसे, आप ने ही बताया था…”

पिता का तमतमाया चेहरा देखकर उसके शब्द रुक गए – “तुम्हें जितना बताया है उतना करो, कोई बहस नहीं”. और उन्होने बेंत उठाया.

दीपू सहम गया. लेकिन अचानक बेंत फेंककर पिता ने उसे खींचकर गले लगाया और फफक कर रो पड़े. थोड़े समय बाद सहज होने पर अवरुद्ध कंठ से बोले, “बेटा, जो कहा उतना कर, साल बर्बाद मत करना. पढ़ाई महंगी होती है मेरे जैसे आदमी के लिए. खैर, तू जा अपना होमवर्क कर, आज पढ़ा नहीं पाऊँगा”.

उस दिन के बाद मास्टरजी ने दीपू को कभी भी इतिहास नहीं पढ़ाया और अपनी किताबों वाली आलमारी को ताला मार दिया. वो दीपू के इंजीनियरिंग पास करने के बाद ही एक दिन चुपचाप खोल दिया.

यथावकाश दीपू यानि श्री दीपक कुमार को अच्छी नौकरी मिली, उनका विवाह भी हुआ, और उनको भी पुत्र संतान का लाभ हुआ. पोते का मुंह देखकर चंद सालों में मास्टर जी प्रसन्नता से विदा हुए.

दीपक कुमार जी बेटे से प्यार तो करते ही थे और उसे साइन्स भी पढ़ाते थे. इतिहास तो पढ़ाते नहीं थे लेकिन बेटा पढ़ने का शौकीन था, दादाजी की अलमारी चाट बैठा था.

एक दिन दीपक कुमार जी से बेटे ने शिकायत की – “डैड, स्कूल की हिस्ट्री टेक्स्ट बुक में कुछ लिखा है, लेकिन दादाजी के कलेक्शन की फलां-फलां किताब कुछ और बताती है. कौन सा सही है”?

बचपन का प्रसंग दीपक कुमार जी के आँखों के सामने घूम गया. अंदर से जरा असहज हुए लेकिन आवाज़ पर नियंत्रण लाते हुए बेटे को प्रेम से समझा दिया कि “बेटा, टेक्स्ट बुक में लिखा है वही आन्सर लिखा कर. एक्ज़ाम पास करना जरूरी है सन, छोटी-छोटी बातों के लिए टीचर से उलझना नहीं, साल बर्बाद नहीं करते. तुम्हें पता है ना, तुम्हारी स्कूल कितनी एक्सपेंसिव है? टेक्स्टबूक ही फॉलो करना, ओके? प्रॉमिस”?

बच्चा वैसे संस्कारी था, आज्ञाकारी था. हाँ कहकर निकल गया. उसके बाद दीपक कुमार जी फिर से पेपर पढ़ने लगे. खबर तो रोज़मर्रा की थी, आतंक को लेकर. लेकिन टेरर शब्द पढ़कर ही उन्होने पेपर रख दिया और अपने पिता के तस्वीर के सामने जाकर खड़े हुए.

पिता की आँखों में आंखे डालकर देखते रहे, और अचानक उनके आँसू बहने लगे. धुंधलाई नजर से उन्हें लगा कि शायद उनके पिताजी के भी आंसू उनके साथ ही बह रहे हैं… कथा समाप्त… उम्मीद है बात पहुँच गई होगी.

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