‘माननीय’ चाहते तो नहीं भड़कती हिंसा

यह एक copied मैसेज है, उसके बाद मेरी टिप्पणी-विश्लेषण : यह सारी दुनिया को पता है कि भारत के ‘माननीय’ स्टे-ऑर्डर देने में तथा फैसले सुरक्षित रखने में माहिर होते हैं. राम रहीम के इस मामले में भी ‘माननीय’ चाहते तो बड़े आराम से फैसला एक माह या पन्द्रह दिन सुरक्षित रख लेते… मुझे तो नहीं लगता कि भीड़ बार-बार एकत्रित हो सकती है… भीड़ को कभी न कभी तो थकना ही है…. ‘माननीय’ कोई भी कानूनी तकनीकी पेंच फँसाकर मामले को तब तक टालते जाते, जब तक बाबा के पागल भक्तों की भीड़ बोर होकर कम होने लगती, या हरियाणा सरकार कोई पुख्ता व्यवस्था कर लेती.

माना कि खट्टर सरकार भीड़ को एकत्रित होने से रोकने में नाकाम रही, इसका इंटेलीजेंस भी फेल रहा… लेकिन कोर्ट के ‘माननीय’ किसी दूसरी दुनिया में तो नहीं रहते हैं, उन्हें भी पता ही होगा कि लाखों की भीड़ मौजूद है, जो हिंसक हो सकती है.

बाबा के कारनामों अथवा उसकी राजनीति के बारे में कुछ कहना जल्दबाजी होगी… लेकिन जो हिंसा-आगज़नी-अव्यवस्था चल रही है, उस बारे में कई मित्रों का यह सुझाव पढ़ा, उसमें दम लगता है कि अगर माननीय’ चाहते और थोड़ी सामाजिक जिम्मेदारी दिखाते हुए कुछ चतुराई दिखाते तो इस हिंसाचार रोका जा सकता था… क्योंकि ‘स्टे-ऑर्डर देना’ और ‘फैसला सुरक्षित’ रखने की तो आदत है इनको.

याने एक ऑर्डर से हिंसाचार स्टे हो सकता था… ऐसा नहीं कि हिंसाचार का खयाल नहीं किया जाता. नोटबंदी पर तो कह रहे थे कि दंगे हो सकते हैं और यहाँ तो लाखों की भीड़ जम गई थी, सारा देश देख रहा था. नेट बंद किया जा रहा था, सशस्त्र बल इकट्ठा किया गया था तो क्या यह हिंसा का आगाज़ नहीं था?

भीड़ एक बार जमा हो जाये फिर कौन किसको पहचानता है? बाबा के फॉलोवर भी सभी एक दूसरे को जानते नहीं होंगे. वैसे गुस्से में तो थे ही जो घरों से निकलकर आए थे.

आगजनी, पथराव – कहने को आसान है, लेकिन कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा परिणाम लाने को ‘अनुभवी, ट्रेनिंग वाले लोग’ चाहिए जो जानते हैं कि बड़ी आग झट से जलाने के लिए क्या चाहिए. पथराव में भी अंतर और निशाना सधा हुआ. आग लगाते समय जब वो भड़के तो खुद पर कैसे आंच न आने दें. जाहिर है आप ने इस मुद्दे पर गौर नहीं किया होगा.

बड़ी भीड़ में बड़ी मात्रा में ऐसे लोग मिलाना मुश्किल नहीं. एक बार वो अगुवाई करें तो बाकी लोग वहीं से शुरू हो जाते हैं. एक ही बात है, बड़ी संख्या में ऐसे लोगों को जुटाना. खर्चा कम नहीं होता. और अगर बार बार जुटाते रहो तो बात लीक भी होने के आसार हैं ही.

स्टे मिलता तो तैयारी पानी में. बाबा को निष्प्रभ करने का ऐसा अवसर फिर नहीं मिलता. बाबा को हिन्दू गुरु कर के प्रोजेक्ट किया है मीडिया में, जब कि वो कोई हिन्दू की बात नहीं करता था, उसका अपना मत था.

दंगे से हुए नुकसान की भरपाई के लिए कोर्ट ने असाधारण फुर्ती दिखाकर डेरा की संपत्ति जब्त करने का आदेश दिया है. बहुत बढ़िया, इसे आइंदा हर दंगे में आवश्यक माना जाये. लेकिन स्टे मिलता तो शायद दंगे न होते, संपत्ति जब्त न होती, सद्भावना खत्म न होती.

राम रहीम हो या और कोई भी बाबा हो, मैं न किसी का चेला हूँ और न ही समर्थक. ना ही उसके मासूम होने का दावा कर रहा हूँ. लेकिन मैं रणनीति समझता हूँ. बाबा पंजाब में फैलते इसाइयत का विरोधी था. नशीले पदार्थों का विरोधी था. सरहदी राज्य है पंजाब और ड्रग्स से कैसे ‘उड़ता पंजाब’ हुआ यह भूले नहीं होंगे आप?

पाकिस्तान के एक जनरल ने जो दर्पोक्ति की थी कि इस बार युद्ध हुआ तो पंजाब तोड़ लेंगे – भूल गए? आंध्र में सोनिया के पिट्ठू YSR के समय में अभूतपूर्व इसाइकरण हुआ, कॉंग्रेस सरकार थी. आज पंजाब में कॉंग्रेस सरकार लौटी है. कहाँ-कहाँ कैसे लोग बैठे हैं यह भी किसी से छुपा नहीं है.

भीड़तन्त्र का गलत समय पर उपयोग कर के बाबा ने मूर्खता की. हमें यह समझ लेना चाहिए कि हमारे शत्रु जो हैं वे रणनीति करते हुए धर्म हैं और उनके समर्थक उस रणनीति को बिना शर्त और समर्पित समर्थन देते हैं. हम संगठित नहीं हो रहे हैं. यह हिंदुओं की निष्क्रियता है कि जो बाबा के समर्थक हैं वे सनातन से जुड़े नहीं हैं जबकि उनकी जड़ें सनातन में ही मिलेंगी.

आज बाबा के कट जाने से यह संख्या और संपत्ति शत्रु के खेमे में जाने की पूरी संभावना है, इस नुकसान को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. If you cannot defend your front yourself, at least cultivate and protect possible alliances!

वहाँ के निवासियों के तहत, वह विधर्मी बस्तियों में यह त्योहार की खुशी मनाई जा रही है. और यहाँ हम मीडिया से पूरी तरह मैनेज हो कर कौन सी खुशी मना रहे हैं, भगवान जाने. इस विषय में शायद और नहीं लिखूंगा. क्या फायदा अगर उसे मूल उद्देश्य से भटकाकर बाबा का समर्थन माना जा रहा हो?

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY