बिजली की कहानी – 4 : बिजली व्यवस्था में सुधार या बिजली व्यवस्था का पतन?

सन 2003 में हमारे देश में एक नया कानून बना जिसे विद्युत् अधिनियम कहा जाता है. इस कानून के लागू होते ही अंग्रेजों के ज़माने का भारतीय विद्युत् अधिनियम 1910 तथा विद्युत प्रदाय अधिनियम 1948 समाप्त हो गए. इस नए कानून का मुख्य मकसद बिजली क्षेत्र में प्राइवेट कम्पनियों को लाना था. इस कानून में बिजली उत्पादन को लाइसेंस विहीन किया गया अर्थात अब कोई भी बिना सरकारी अनुमति के बिजली का उत्पादन कर सकता है.

बिजली उत्पादन में रिलायंस, एस्सार, जिंदल, जे पी, टाटा जैसी बड़ी कंपनिया आ गयी. इन कंपनियों के परस्पर प्रतिस्पर्धा से बिजली का दाम कम होना चाहिए, जो कि नहीं हुआ. इस कानून में बिजली क्षेत्र पर नियंत्रण और नियमन के लिए “केंद्रीय विद्युत् नियामक आयोग“ तथा “राज्य विद्युत् नियामक आयोग” जैसी न्यायिक संस्थाओं का गठन किया गया. सभी राज्यों के बिजली बोर्ड को तोड़ कर उनको उत्पादन, पारेषण तथा क्षेत्रीय वितरण कम्पनियों में बाँट दिया गया, जिनका स्वामित्व राज्य सरकार का रखा गया. कुछ राज्यों में इन कंपनियों के अधिकतम शेयर निजी कम्पनियों को दे दिए गए. जैसे दिल्ली में टाटा और रिलायंस.

 

जैसा कि पूर्व भाग में बताया गया था कि नेताओं की नज़र लगते ही बिजली बोर्ड घाटे में आ गये और बीमार हो गए. अगर कोई बीमार है तो उसका इलाज किया जाना चाहिए. मगर यहाँ पर नेताओं और नौकरशाहों की यह धारणा थी कि बीमार के हाथ, पैर, सर, धड़ काट कर अलग कर देने से बीमार ठीक हो जायेगा. इस तरह का पहला प्रयोग ओड़िसा में किया गया, ओड़िसा बिजली बोर्ड को तोड़ कर उनको उत्पादन, पारेषण तथा क्षेत्रीय वितरण कम्पनियों में बाँट दिया गया. एक साल बाद ही इसके दुष्परिणाम सामने आये और ओड़िसा बिजली कम्पनियों का घाटा दुगना हो गया. इस प्रकार विद्युत् अधिनियम 2003 पर आधारित ओड़िसा मॉडल पूरी तरह फेल साबित हुआ. फिर भी सरकार ने इस मॉडल को देश के सभी राज्यों में लागू कर दिया.

बिजली एक समेकित प्रणाली है, इसमें उत्पादन, पारेषण तथा वितरण एक दूसरे में समाहित व परस्पर पूर्ण निर्भर रहते हैं. इनको अलग अलग करना संभव नहीं, पर दुर्भाग्य है कि देश की बिजली नीति बनाने वाले लोग विद्युत् विशेषज्ञ नहीं होते. बिजली नीति विश्व बैंक, आई ऍम एफ, GATT या निजी कम्पनियों को लाभ प्रदान करने के एजेंडे अनुसार होती है जिसे नेताओं और नौकरशाहों द्वारा जबरन लागू कर दिया जाता है.

बिजली बोर्ड को तोड़ कर कंपनियों बनाने के पीछे सरकार का तर्क है कि इससे कम्पटीशन को बढ़ावा मिलेगा, बिजली के रेट कम होंगे और बिजली कम्पनियों को सरकारी नियंत्रण से मुक्ति मिलेगी. लेकिन ये सब जनता की आँख में धूल झोंकने वाला झूठ ही साबित हुआ. न तो बिजली क्षेत्र में कम्पटीशन आया, न ही बिजली के रेट कम हुए और बिजली कम्पनियों के ऊपर राजनैतिक नियंत्रण पहले से और ज्यादा हो गया.

विद्युत नियामक आयोग जिस अवधारणा से बनाया गया था कि यह बिजली कम्पनियों में परस्पर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देगा. मगर यहाँ प्रतिस्पर्धा ही ख़त्म कर दी गयी. सभी राज्यों के विद्युत नियामक आयोग सेवानिवृत नौकरशाहों को रोजगार और ठाठ बाट देने के केंद्र बन गए हैं.

विद्युत् अधिनियम 2003 को राज्य सरकारों ने अपनी सुविधानुसार इस्तेमाल किया. जैसे अधिनियम में प्रावधान है कि जनता की सुविधा के किये जिला स्तर पर विशेष विद्युत् अदालते बनायी जायेंगी, ताकि उपभोक्ताओं की बिजली कम्पनियों सम्बन्धी शिकायतों का तात्कालिक निराकरण हो जाये. मगर राज्य सरकार ने जिला स्तर पर प्रथक विद्युत् अदालते न बना कर जिला न्यायालय को ही विद्युत् अदालत घोषित कर दिया. जिनके पास पहले से ही हजारों मुकदमों का बोझ है उन जजों पर विद्युत् सम्बन्धी मुकदमों का अतिरिक्त बोझ डाल दिया गया.

इसी अधिनियम में “ओपन एक्सेस” का प्रावधान है, अर्थात अगर आप अपने स्थानीय बिजली कम्पनी की सेवा से संतुष्ट नहीं है तो उसी स्थान पर “ओपन एक्सेस” के तहत दूसरी बिजली कम्पनी का कनेक्शन ले सकते हैं. जैसे जबलपुर में आप केरल या हिमाचल प्रदेश की बिजली कम्पनी का कनेक्शन ले सकते हैं. आपको केरल बिजली कम्पनी का रेट लगेगा साथ में केरल से मध्यप्रदेश तक का बिजली परिवहन चार्ज भी देना होगा. अब यह चार्ज इतना ज़्यादा है कि आपकी बिजली बहुत महंगी हो जायेगी, और आप इसे लेने में समर्थ नहीं होंगे. “ओपन एक्सेस” की धारणा अच्छी है, लेकिन यह व्यावहारिक न होने से लागू नहीं हो पा रहा.

जब एक बिजली बोर्ड को तोड़ कर 6 या 8 कम्पनियां बनेंगी तो स्वाभाविक है कि अब एक की जगह 6 या 8 चेयरमेन बनेंगे, उतने ही एम डी, और 6 गुना डायरेक्टरस होंगे. इतने ही नए ऑफिस बनाने होंगे, और इतने ही बंगले गाड़ी नौकर चाकर आदि. अर्थात कम्पनी बनाने पर सरकारी खर्चा 6 गुना बढ़ जायेगा.

बिजली सुधार के नाम पर बिजली बिचौलियों की संख्या बढ़ी, इन बिचौलियों के कमीशन और लाभ के कारण उपभोक्ता को बिजली महंगे दामों में मिलने लगी. ये बिचौलिये हैं – पॉवर ट्रेडिंग कम्पनी, जो केवल कम्प्यूटर पर उत्पादन कम्पनियों से कम दाम में बिजली खरीद कर कम्प्यूटर पर ही वितरण कम्पनियों को ज़्यादा दाम में बेच देते हैं, और बीच में अपना कमीशन ले लेते हैं. एक कमरे के ऑफिस में मात्र कुछ कम्प्यूटरों पर चलने वाली पॉवर ट्रेडिंग कम्पनियां आज हजारों करोड़ का मुनाफा कमा रहीं हैं. इनमे प्रमुख हैं – अदानी इंटरप्राइजेज, टाटा पॉवर ट्रेडिंग, डी एल एफ एनर्जी, जे पी एसोसिएट्स, एस्सार इलेक्ट्रिक पॉवर डेवलपमेंट, पार्श्वनाथ, मणिकरण पॉवर आदि.

जिस तरह स्टॉक एक्सचेंज होता है, जहां शेयर के दाम गिरते उठते हैं ठीक उसी तरह सरकार ने बिजली के दो एक्सचेंज स्थापित किये जिन्हें ‘पॉवर एक्सचेंज इंडिया’ और ‘इंडियन एनर्जी एक्सचेंज’ कहा जाता है. अब बिजली आम जनता की प्राथमिक जरूरत नहीं बल्कि ट्रेडर्स के खेल की वस्तु हो गयी. अब निजी बिजली उत्पादन कम्पनियां अपनी बिजली इन एक्सचेंज के हवाले कर देते है. सभी बिजली वितरण कम्पनियां इन एक्सचेंज की मेम्बर बनती है और बिजली खरीदने के लिए बोली लगाती है. यह सब्जी या अनाज मंडी जैसा कारोबार हो गया है. जिसकी बोली ज़्यादा उसे बिजली बेच दी जाती है. इन बिजली एक्सचेंजों में प्रतिदिन करोड़ों का कारोबार चलता है, दलाल सक्रिय रहते हैं. वितरण कम्पनियां तात्कालिक बिजली और अगले दिन की बिजली की अधिकतम बोली लगा कर बिजली खरीदने के लिए प्रयासरत रहती हैं.

विद्युत् सुधार 2003 के पहले और बाद में देश की बिजली व्यवस्था चित्र में देखें –

इस अधिनियम में बिजली-फ्रेंचाइज़ी का प्रावधान है. अर्थात बिना लाइसेंस के किसी निजी कम्पनी को विद्युत् वितरण में प्रवेश कराना हो तो उसे फ्रेंचाइज़ी बना कर यह किया जा सकता है. अगर कोई निजी कम्पनी वितरण के क्षेत्र में आना चाहती है तो उसे पहले ज़्यादा घाटे वाले क्षेत्र जैसे ग्रामीण इलाके में बिजली प्रदाय का कार्य दिया जाना चाहिए, जहाँ सरकारी तंत्र अक्षम है. लेकिन सरकारों ने इसका उल्टा किया. निजी कम्पनियों को पहले शहरी क्षेत्र सौपें जहाँ सरकारी बिजली कम्पनियां पहले ही अच्छा कार्य कर रहीं थी.

महाराष्ट्र में नागपुर (स्पेंको कंपनी ), म प्र में उज्जैन , सागर व ग्वालियर ( एस्सेल कम्पनी ) आदि को फ्रेंचाइज़ी बनाया गया. इन निजी कम्पनियों को बिजली की पूरी बनी बनाई हजारों करोड़ की अधोसंरचना ( लाइने, खम्बे, ट्रांसफार्मर आदि ) मुफ्त में प्राप्त हुई, अब तो इनको सिर्फ प्रॉफिट कमाना था बस. मगर इनका एक मात्र उद्देश्य उपभोक्ता से बिल या पेनालिटी वसूली करना रह गया. कम्प्लेन अटेंड करने और सेवा प्रदान करने पर कोई भी ध्यान नहीं दिया. इन कंपनियों की मुनाफाखोरी के चलते शहर की बिजली व्यवस्था ध्वस्त हो गयी, जनता त्राहि त्राहि करने लगी. फलस्वरूप सरकार ने इन फ्रेंचाइज़ी कम्पनियों से उन शहरों की बिजली व्यवस्था छीन कर पुनः सरकारी वितरण कम्पनी को दे दी.

अधिनियम के लागू होने के बाद एक एक राज्य में तीन से छह वितरण कम्पनियां हो गयी है, जिनको बिजली प्रदान करने हेतु अलग अलग क्षेत्र आवंटित है. अर्थात ये कम्पनियां एक दूसरे के क्षेत्र में बिजली प्रदान नहीं कर सकती हैं और न ही एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर सकती हैं. राज्य नियामक आयोग द्वारा पूरे राज्य में बिजली की एक ही दरें रखी जाती है. अर्थात इन वितरण कम्पनियों की बिजली की दरें भी समान हैं. और ये कम्पनियां सामूहिक टेंडर करती हैं. ऐसी स्तिथि में एक राज्य में इन अलग अलग सरकारी वितरण कम्पनियां होने का क्या औचित्य है? सिर्फ इसलिए कि इनको समय आने पर निजी कम्पनियों को बेच दिया जाए.

क्या हमारे देश के लिए बिजली क्षेत्र में निजीकरण लाभप्रद रहेगा? इसका उत्तर नेता और नौकरशाह हाँ में देते हैं और यह गलत बताते हैं कि जिस तरह टेलिकॉम या एयरलाइन क्षेत्र में कम्पटीशन बढ़ा और सेवाओं के रेट कम हुए तथा गुणवत्ता बढ़ी वैसा ही बिजली क्षेत्र में हो जायेगा. बिजली क्षेत्र की तुलना इनसे नहीं की जा सकती है . टेलिकॉम या एयरलाइन मानव की मूलभूत आवश्यकता नहीं है, जबकि रोटी कपड़ा और मकान के साथ आज बिजली भी मानव की मूलभूत आवश्यकता है.

हर व्यक्ति को बिजली पाने का अधिकार है. बिजली का दाम व्यक्ति की क्रयशक्ति और देश की प्रति व्यक्ति आय के अनुरूप होना चाहिए ताकि गरीब से गरीब व्यक्ति भी बिजली का खर्च वहन कर सके. इंसान की मूलभूत आवश्यकता होने के कारण बिजली को निजी कम्पनियों की मुनाफाखोरी के लिए नहीं छोड़ा जाना चाहिए. अतः अभी अनेक वर्षों तक बिजली क्षेत्र पर पूर्ण सरकारी नियंत्रण आवश्यक है.

बिजली क्षेत्र सदैव से ही मोनोपोली व्यापार रहा है, अर्थात एक इलाके में एक ही बिजली कम्पनी वितरण का कार्य कर सकती है , जबकि टेलिकॉम या एयरलाइन क्षेत्र में ऐसा नहीं है. बिजली सुधार के नाम पर जो भी नवीन प्रयोग किये गए उनसे बिजली की उत्पादन लागत बढ़ी, बिचोलियाँ कम्पनियों के कारण बिजली की दरें बढ़ी, सेवाओं में कमी हुई और देश में निजी कम्पनियों की बिजली मुनाफाखोरी बढ़ी.

मार्च 2015 के अंत तक देश की सभी बिजली वितरण कंपनियों का घाटा 3.8 लाख करोड़ रूपये था और इन पर कर्ज 4.3 लाख करोड़ रुपये था. यह देश की बिजली नीति बनाने वालों , बिजली सुधारवादियों और विद्युत् अधिनियम 2003 की पूर्ण असफलता दर्शाता है.

बिजली की कहानी – 3 : भारत में बिजली गोल की पोल खोल

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