अगर वे 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे स्तर की हिंसा पर उतर आए तो संभाल लेंगे न आप?

70-80 के दशकों में वेस्ट इंडीज की पेस बैटरी घातक थी. बैट्समैन का सिर्फ विकेट ही नहीं, जबड़ा भी निशाने पर होता था. उनके सामने जो सबसे सफल बल्लेबाज हुआ, वह था सुनील गावस्कर. बिना हेलमेट के खेलते हुए कभी भी गावस्कर को कोई बाउंसर छू भी नहीं पाया. गावस्कर वेस्ट इंडीज के खिलाफ अपने कैरियर के शुरू से आखिर तक शानदार खेले, और कुल 13 शतक बनाये.

बाउंसर का सामना करने का गावस्कर का सबसे अच्छा हथियार था उनकी तेज नज़र. बॉल को डक करते समय वो अपनी नज़र गेंद से नहीं हटाते थे…

पर वेस्ट इंडीज के विरुद्ध खेलते हुए एक और बल्लेबाज़ बहुत ही सफल हुआ – मोहिंदर अमरनाथ. अमरनाथ के पास गावस्कर जैसी टेक्निक नहीं थी, पर कलेजा शेर का था. जिंदगी में जितने बाउंसर अपने मुँह पर खाकर वह बंदा खड़ा और डटा रहा, उतने और किसी ने नहीं खाये.

1976 की सीरीज में जहाँ आधी टीम घायल थी और टीम को चोटों से बचाने के लिए बेदी ने 4 विकेट बाकी रहते पारी डिक्लेअर कर दी थी… तब भी मोहिंदर अमरनाथ अपने हुक शॉट और छक्कों के लिए मशहूर रहे.

बाद में 1983 की सीरीज में, वर्ल्ड कप से पहले मोहिंदर अमरनाथ ने अपनी टेक्निक को थोड़ा बदला, हुक शॉट को और निखारा और सीरीज में 2 शतक और 4 अर्धशतक के साथ 600 रन बनाए.

दोनों बल्लेबाजों की टेक्निक बताती है, बाउंसर से निबटने के दो तरीके हैं. या तो डक करना सीख लीजिये… आँखें मूंद कर, सर पकड़ कर नीचे बैठने को डक करना नहीं कहते. नज़र गेंद पर बनी रहनी चाहिए.

या जम कर खड़े रहिये. हुक कीजिये. गेंद को सीने पर लीजिये… दाँत टूटे या पसलियाँ… जमे रहिये, हुक कीजिये, पुल कीजिये… कुछ भी कीजिये, डरना अफोर्ड नहीं कर सकते…

मोदी सरकार ने पिछले तीन सालों में बहुत से बाउंसर झेले हैं. पटेल आरक्षण, जाट आरक्षण, बंगाल की हिंसा… और हर बार गेंद जबड़े पर लगी है. साफ लगता है, हम इसे डक करना चाहते हैं, पर नज़र गेंद पर नहीं है. हर बार लगता है, सरकार पकड़ी गई… सूचना तंत्र विफल हुआ.

आपसे जाट नहीं संभलते, पटेल नहीं संभलते, गुर्जर नहीं संभलते, बाबा राम-रहीम वाले नहीं संभलते… मालदा नहीं संभला… अगर वे 16 अगस्त 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे के स्केल की हिंसा पर उतर आए तो संभाल लेंगे क्या?

एक दिन में कलकत्ता की सड़कों पर एक लाख लाशें बिछ गई थीं… इस एक दिन की हिंसा ने गाँधी के “पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा” की प्रतिबद्धता की पोल खोल दी थी…

आगे आगे देखिए…ऐसे बाउंसर भी आएंगे. उन्हे अगर डक नहीं कर पा रहे, गावस्कर की तरह नज़र नहीं है तो मोहिंदर अमरनाथ की तरह कलेजा ही रखिये… सीने पर लीजिये, झेलिये, पर हुक कीजिये… भागते-छिपते तो नज़र नहीं आइये….

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