भारतीय संतों की परम्परानुसार तिलक को दी गयी थी समाधि

बालगंगाधर तिलक जीवन्मुक्त थे. उन्हें भारतीय संतों की परम्परानुसार समाधि दी गई थी. देह छोड़ने के उपरांत बैठी हुई अवस्था में उनकी बारात निकालकर बैठी हुई अवस्था में ही उन्हें भूमि में समाधि दी गई.

संसार की समस्त इच्छाओं से मुक्त होने के कारण उनकी चिता का दाहसंस्कार नहीं किया गया था. श्रीमद्भगवतगीता पर उनकी टीका उनकी विद्वता और गम्भीर जीवनदृष्टि का परिचायक है.

बालगंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव की परम्परा का आरम्भ किया जो भारतीय पुनर्जागरण को गति देने में बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ.

– अम्बर पाण्डेय

 

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