अध्यात्म के नाम पर मानवपतन : ये श्रद्धा है या अंधश्रद्धा?

आत्मिक विकास और आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए श्रद्धा जितनी आवश्यक और उपयोगी है उतनी ही घातक है- अन्ध श्रद्धा. अन्धश्रद्धा का अर्थ है बिना सोचे समझे, आँख मूँदकर किसी पर भी घनघोर विश्वास. इस तरह की अंधश्रद्धा किस प्रकार सर्वनाश के कगार पर ले पहुँचती है इसका उदाहरण पिछली शताब्दी में अमेरिका में 900 व्यक्तियों द्वारा सामूहिक आत्महत्या किये जाने के समय देखने में आया था. 21 नवम्बर 1978 को विश्व के लगभग सभी समाचार पत्रों में यह समाचार छपा था. 900 व्यक्तियों द्वारा सामूहिक रुप से आत्महत्या कर लिए जाने के पीछे अमेरिका के एक धर्मगुरु का हाथ था, जो स्वयं को अपने अनुयायियों का पिता बताता था.

दक्षिण अमेरिका के एक प्रान्त गुयाना की राजधानी जार्ज टाउन से 238 किलोमीटर दूर घने जंगलों में करीब 11 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में एक नगर बसा हुआ था जोंस टाउन. यह कस्बा जिम जोंस के अनुयायिओं द्वारा बसाया गया था और जिम जोन्स यहां आपने अनुयायियों के साथ यहाँ रहता था. अन्य व्यक्तियों का प्रवेश निषिद्ध था. 18 नवम्बर 1978 को शाम के समय इस कस्बे में बने एक उपासना घर में एकत्रित करीब नौ सौ व्यक्ति जिमजोंस के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे थे. उन व्यक्तियों के कान में अपने गुरु की आवाज गूँजी- “अब वह समय आ गया है जिसके लिए मैं तुम लोगों को सदैव तैयार रहने के लिए कहता रहा हूँ. हम सबको आज ही मरना है, इसी वक्त.”

इसके बाद उपस्थित सभी पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों को विष मिला शरबत बाँटा गया. कुछ लोग ऐसे भी थे जो मरना नहीं चाहते थे. वे भागने की सोच रहे थे. इसके लिए उन्होंने अपने आस-पास देखा तो पाया कि चारों ओर बन्दूक तथा विष बुझे तीर चढ़ाये कमान ताने पहरेदार तैनात हैं. कुछ लोगों ने इस पर आपत्ति की तो उनसे कहा गया कि बेहतर है स्वयं ही विषपान कर लिया जाये क्योंकि यहाँ से बचकर कोई नहीं जा सकता.

पहले छोटे-छोटे बच्चों को चम्मच से विष पिलाया गया. इसके बाद उपस्थित स्त्री-पुरुषों ने विषपान किया. जिन्होंने अपने गुरु की अवज्ञा करते हुए भागने की चेष्टा की वे पहरेदारों के तीरों और बन्दूक की गोलियों का निशाना बने. कुछ ही घण्टों में जोंस टाउन लाशों से पटा था. न केवल मनुष्यों की वरन् पशु-पक्षियों की लाशें भी वहाँ बिछ गयीं अंत में पीपुल्स टेम्पल के गुरु जिम जोंस ने स्वयं को गोली मार ली.

जिम जोंस पश्चिम में अन्धश्रद्धा का व्यापार चलाने वाले अधर्म गुरुओं में से एक था, जो पश्चिम की चकाचोंध कर देने वाली भौतिक समृद्धि से ऊबे लोगों की आध्यात्मिक जिज्ञासा का दोहन करने में लगे हुए थे. पिपासा इतनी तीव्र थी और अज्ञान इतना गहरा कि कौन सही तथा कौन गलत… इसका निर्णय करने की किसी को फुरसत ही नहीं. जहाँ थोड़ा बहुत आकर्षण दिखाई दिया, वहीं प्रभावित हो गए और उन्हीं को अपना ईष्ट, आराध्य मानकर उनकी उचित-अनुचित आज्ञाओं, आदेशों का आँख मूँदकर पालन करने लगे.

जिमजोंस ने पश्चिमी सभ्यता से ऊबे लोगों की इसी कमजोरी का लाभ उठाने के लिए सन् 1950 में पीपुल्स टेम्पल नामक एक “सम्प्रदाय” चलाया… लोगों में अपना प्रभाव बढ़ाने तथा उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने की हर संभव कोशिशें की. परिणामतः बड़ी संख्या में लोग जिमजोंस के अनुयायी बनने लगे. जब उसके शिष्य बड़ी संख्या में बनने लगे तो उसने सन् 1970 में अपना मुख्यालय कैलीफोर्निया से सैनफ्राँसिस्को स्थानाँतरित कर लिया.

1968 तक जिम का सितारा पूरी बुलन्दी पर था, लेकिन 1969 में उसके कुछ अनुयायियों ने पीपुल्स टेम्पल के रहस्य खोलना आरम्भ कर दिये. उनका कहना था कि पीपुल्स टेम्पल देखने भर को ही आदर्शों का प्रचार करने वाला संगठन है अन्यथा इस सम्प्रदाय में आतंक और नाटकीय यातनाओं का राज्य है. वहाँ जिम की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता. उसकी मर्जी के थोड़ा भी विरुद्ध जाने वालों को बुरी तरह पीटा जाता है तथा कठोर दण्ड दिया जाता हैं. जिमजोंस पर झूठा धार्मिक उपचार करने और भक्तों की सम्पत्ति हथियाने का आरोप भी लगाया गया.

अमेरिकी अधिकारियों से यह शिकायत की गई कि जिम अपने अनुयायिओं से बहुत ही पाशविक व्यवहार करता है. न केवल उनके अनुयायिओं को मारापीटा जाता है बल्कि उनसे दिनभर जमकर मेहनत कराई जाती है और नाम मात्र का भोजन दिया जाता है. कड़ी मेहनत करने वाले व्यक्ति वही लोग होते हैं जो अपनी सम्पत्ति पीपुल्स टेम्पल को सौंप चुके होते हैं. एक बार उसके चंगुल में फँसकर बच निकलना मुश्किल है. जिम ने अपने अनुयायिओं के बीच ही काफी गुप्तचर छोड़ रखे हैं और छोटी सी सेना भी बना रखी है ताकि बाहरी संकट का सामना किया जा सके.

इन खबरों के सामने आने पर अमरीका में जिम विरोधी हवा बहने लगी. न्यू वेस्ट और सैनफ्राँसिस्को एग्जामिनर पत्रिकाओं ने पीपुल्स टेम्पल के बारे में सनसनी खोज विवरण प्रकाशित किये और अमरीकी प्रशासन से उसकी जाँच कराने की माँग की. यह माँग जोर पकड़ने लगी तो जिमजोंस अपने अनुयायिओं सहित गुयाना भाग गया.

स्वयं और सम्प्रदाय पर संकट के बादल मँडराते और पोल खुलती देखकर जिम अपने अनुयायिओं को समझाने लगा था कि कोई बाधा सिर पर आती देखकर हम लोग आत्महत्या कर लेंगें. उसने सामूहिक आत्महत्या की योजना को कई बार अपने अनुयायिओं के बीच स्पष्ट किया था. जिमजोंस से विद्रोह करने वाले उसके एक भूतपूर्व अनुयायी डैवी ब्लैकी ने अदालत को यह बताया कि “उसके गुरु ने कुछ खास अनुयायिओं को आश्रम के सभी बच्चों को मार डालने की जिम्मेदारी सोंप दी थी. उसके साथ यह भी बता दिया था कि बच्चों को मारने के बाद वे एक दूसरे की हत्या कर देंगें.”

जनता जैसे-जैसे पीपुल्स टेम्पल की असलियत जानने के बाद उसकी जाँच कराने की माँग करने लगी, उससे जिम का मनोबल टूटने लगा. उसने एक वक्तव्य दिया कि-“यदि सरकार या अन्य किसी बाहरी व्यक्ति ने आश्रम में घुसने का प्रयास किया तो वे सामूहिक आत्महत्या कर लेंगे.”

जनता की माँग और पीपुल्स टेंपल की गतिविधियों का रहस्य जानने के लिए अमेरिकी सीनेटर लियोरियान की अध्यक्षता में एक बारह सदस्यीय दल गुयाना पहुँचा. 18 नवम्बर को यह दल अपने साथ कुछ असंतुष्ट जोंस पंथियों को लेकर मठ से बाहर निकल रहा था कि आश्रम के कुछ लोगों ने उन्हें चाकू दिखाकर रोका. बीच बचाव करने और समझाने, बुझाने के बाद वह लोग सुरक्षित बाहर निकल सके. वहाँ से निकल कर दल के लोग और प्रतिनिधि उस जंगल में बनी पोर्ट कैतुमा हवाई पट्टी पर खड़े विमान में सवार होने लगे तो पीपुल्स टेंपल के अनुयायिओं का एक दस्ता वहाँ आ पहुँचा और विमान पर गोलियों की बौछार करने लगा. इससे लियोरियान सहित चार जाँचकर्ता मारे गये.

यह आक्रमण जिम द्वारा अपने मठ की सुरक्षा के लिए गठित सेना द्वारा किया गया था. इस हत्या के परिणामों से जिमजोंस इतना भयाक्राँत हो उठा कि उसे अगले दिन अपने 900 शिष्यों सहित सामूहिक आत्म-हत्या अथवा हत्या के लिए बाध्य होना पड़ा. अमेरिकी प्रतिनिधि मण्डल पर हमले की खबर जब गुयाना की राजधानी पहुँची तो वहाँ के सैनिक जोंसटाउन पहुँचे. सैनिकों ने जोंसटाउन में प्रवेश किया तो उन्हें वहां लाशों का अम्बार मिला. नौ सौ लाशों के अलावा आश्रम में 17 गन, 15 रायफल, 7 रिवाल्वर एक फ्लोयर गन और भारी मात्रा में गोला बारुद का भण्डार भी मिला. इसके अलावा करीब 800 पासपोर्ट, कीमती सामान और नकद डॉलर भी बरामद हुए.

एक ही पंथ के अनुयायियों द्वारा इतनी बड़ी संख्या में एक साथ आत्म-हत्या करने की यह घटना विश्व इतिहास में अनोखी और अकेली घटना थी. जिम जोंस और उसके अनुयायियों द्वारा इतनी बड़ी संख्या में मौत को गले लगाने की घटना अन्धश्रद्धा का प्रतिफल था.

हरियाणा के पंचकूला में भी अभी कुछ ऐसे ही हालात बने हुऐ है. डेरा सच्चा सौदा के बाबा राम रहीम और उनके “अनुयायी” ठीक वैसे ही मरने मारने और जान देने की बात कर रहें हैं तो बचपन मे अखंड ज्योति में पढ़ी ये घटना स्मरण मे लौट आई. पंजाब और हरियाणा में अभी इमरजेंसी जैसे हालात बने हुए हैं.

अंधविश्वास या अंधश्रद्धा व्यक्ति और समाज की दुर्बल मनोभूमि का परिचायक है और यह सिद्ध करता है कि उसमें स्वतः विचार कर निर्ष्कष करने की क्षमता का अभाव है. विश्वास श्रद्धा में भी किया जाता है पर फिर प्रश्न उठता है कि अंधश्रद्धा और श्रद्धा में कोई सीमा रेखा खींची जा सकती है? श्रद्धा और अंधश्रद्धा स्वरुपतः एक जैसी ही दिखाई पड़ने पर भी दोनों में मूलभूत अन्तर है.

श्रद्धा का अर्थ है आत्मविश्वास, ईश्वर पर विश्वास. प्रतीक कुछ भी चुन लिए जाएँ, परन्तु श्रद्धा अपने विवेक को ताक पर रखने की प्रेरणा नहीं देती. स्मरण रखा जाना चाहिए कि श्रद्धा के आधार प्रतीक चुन लिए जाएँ तो भी उसमें किसी भी प्रतीक पर पूर्णतः निर्भर नहीं हुआ जाता, क्योंकि कोई भी प्रतीक प्रतिमान का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता. वह आधार सहायता के लिए चुने जाते हैं न कि उनपर निर्भर होने के लिए.

जबकि अंधश्रद्धा प्रतीकों को ही पकड़कर बैठ जाती है और उन्हीं पर निर्भर रहने लगती है. हमें श्रद्धावान तो बनना चाहिए, अंधश्रद्धा और अन्ध भक्ति से सदैव बचना चाहिए.

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