सभ्यता के इतिहास में इनका क्या स्थान है?

ऊपर दिख रही तस्वीर एक सीधा सादा ट्रैफिक राउंडअबाउट है… गोलचक्कर… क्यों होते हैं ये गोलचक्कर? इसमें तो बीच में किसी गाँधी या अम्बेडकर की प्रतिमा भी नहीं है, फिर सड़क के बीच में इस बेकार सी चीज पर खर्च क्यों किया जाता है?

हमारे देश में ट्रैफिक राउंडअबाउट का उपयोग ये है कि उसका नाम किसी लोकल छुटभैया के नाम पर बाबू-भईया चौक रख दो, या उसके बीच में किसी की मूर्ति लगा दो. पर दुनिया के कुछ देशों में इसकी कुछ उपयोगिता भी है.

ट्रैफिक राउंडअबाउट के कुछ नियम होते हैं. दाईं ओर से आ रहे व्यक्ति का राइट ऑफ वे होता है. यानी जब कोई दाईं ओर से आ रहा होगा तो बायीं ओर वाला व्यक्ति रुकेगा, और उसके लिए उसके बायीं ओर वाला व्यक्ति रुकेगा… जिससे सभी को इस राउंडअबाउट को पार करने का सामान अवसर मिलेगा.

आपको आश्चर्य होगा, इस नियम से ट्रैफिक कितना स्मूथ हो जाता है… और एक भी व्यक्ति इसका उल्लंघन करता नहीं पाया जाता. कोई पेनल्टी के डर से नहीं… यह एक नियम है जो पेनल्टी के डर से नहीं बल्कि एक आदत की तरह इम्प्लीमेंट होता है. सबको आदत है, दाएं देखते हैं… अगर आने वाली गाड़ी थोड़ी दूर है तो राउंड अबाउट में घुस जाते हैं, नहीं तो इंतज़ार करते हैं.

ऐसा नहीं है कि लोग ज्यादा सभ्य सुसंस्कृत हैं. पर पूरे देश को एक तरह से सोचने की ट्रेनिंग दे दी गई है और सबने समझा है कि ट्रैफिक स्मूथ चले इसका यही तरीका है. इसलिए मैं इसे आधुनिक सभ्यता की एक बड़ी उपलब्धि मानता हूँ. पूरे समाज का सर्व-हित में किसी एक बिंदु पर सहमत हो पाने की क्षमता सभ्यता का महत्वपूर्ण मानक है.

पिछले वर्ष भारत गया था, तो बड़े भैया ने बताया कि उनका एक्सीडेंट हो गया. उनके आगे चल रही गाड़ी ने दायीं ओर का इंडिकेटर दिया. भैया ने समझा वह पास दे रहा है और उन्होंने ओवरटेक करने के लिए स्पीड बढ़ा दी. तभी वह दायीं ओर मुड़ गया…

मैंने कहा – “लेकिन उसने तो दायीं ओर का इंडिकेटर दिया था तो उसे तो दाएं ही मुड़ना था”. भैया ने कहा – “नहीं, यहाँ राइट से पास देने के लिए राइट इंडिकेटर देते हैं”. अच्छा, तो फिर राइट टर्न के लिए क्या इंडिकेटर देते हैं???

हमारा समाज आज तक मिलकर यह तय नहीं कर पाया है कि दाएं मुड़ने लिए क्या सर्वमान्य दिशा संकेत होगा. राउंडअबाउट पर कैसे पार करना है यह तो एक रहस्य ही है. हमारी ट्रैफिक तो लगता है जैसे एक बच्चा ऊन के गोले से खेल रहा है.

खैर, अब नीचे वाली तस्वीर को भी ध्यान से देखिए. यह पेरिस का आर्क-डी-त्रिओम्फे यानी एक विजय स्मारक है. यह नेपालियन ने अपनी यूरोप विजय के उपलक्ष्य में बनाया था. यह मूल रूप में एक विशाल ट्रैफिक राउंडअबाउट ही है, जिसमें 12 एग्जिट हैं. यह शायद दुनिया का सबसे प्रसिद्ध, ऐतिहासिक राउंडअबाउट है.

विजय स्तंभ साम्राज्यों की विजय कीर्ति के स्मारक रहे हैं… मेरी नज़र में ट्रैफिक राउंडअबाउट सभ्यता का स्मारक है… और नेपालियन के विजय स्मारक का एक विशाल ट्रैफिक राउंडअबाउट होना एक भव्य रूपक है. अगर हमने अपनी सामुदायिकता और सह-अस्तित्व की इस समस्या को सुलझा लिया… मिल कर, कलेक्टिवली, एक भी विषय पर सहमत हो पाए, एक ट्रैफिक राउंडअबाउट के आर-पार चलना भी सीख लें तो यह हमारी सभ्यता का भव्य विजय-स्मारक बनेगा.

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