निजता मौलिक अधिकार : नेताजी को अब नहीं बताना पड़ेगा कि मर्द हैं या गे

जब रेल की पटरी पर शौच करते हो तब निजता कहाँ जाती है? जब सड़क पर पेशाब करते हो तब निजता कहाँ जाती है? जब आपके घर की बहू बेटियां खेत मे शौच के लिए जाती हैं तब निजता कहाँ जाती है? जब उल्टे सीधे कपड़े पहनते हो तब निजता कहाँ जाती है?

जब एंड्राइड फ़ोन को चलाने के लिए अपनी सारी जानकारी विदेशी सर्वर पर दे देते हो तब निजता कहाँ जाती है? जब किसी App को चलाने के लिए अपने माइक्रोफोन, फोनबुक, मैसेज, कैमरा, डेटा और बाकी जानकारी अनजान आदमी को गिरवीं रख देते हो तब निजता कहा जाती है?

जब इनाम के लालच में अपनी बैंक डिटेल तक दे बैठते हो तब निजता कहाँ जाती है. जब पोर्न साइट “above 18” का डिक्लेरेशन मांगता है तब निजता कहाँ जाती है? जब सड़क पर kiss of love करते हो तब निजता कहाँ जाती है? जब मर्द डॉक्टर के सामने बुरका उतारना पड़ता है तब निजता कहाँ जाती है?

हकीकत यह है कि एक आम आदमी को निजता से कोई फर्क ही नही पड़ता, बल्कि मैं तो कहता हूं कि हर आदमी की हर जानकारी वेबसाइट पर उपलब्ध होनी चाहिए. आधार या pan नंबर डालो और सामने स्क्रीन पर आ जाये कि फलां बन्दा कितनी बार जेल गया, किस-किस जुर्म में गया, कितनो का पैसा खाये बैठा है, कितना झगड़ालू है, बिजली-टेलीफोन का बिल भरता है कि नही, बैंक की कितनी उधारी है, सब कुछ सामने आना चाहिए ताकि हमें उस आदमी से डील करना है कि नहीं, ये सुनिश्चित किया जा सके.

भाई जो सही है, सच्चा है उसे काहे का डर! जो बेईमान है चिंता तो उसे होनी चाहिए. असल में समस्या उन बड़े लोगों को है जिनके 20-20 बंगले हैं, 40-50 प्लाट हैं, उन्हें डर है कि आधार लागू होने पर कहीं उनकी काली कमाई भी पकड़ में ना आ जाये और सारी प्रॉपर्टी सरकार के सामने ना आ जाये, कोलकत्ता का साल्ट लेक में माननीयों के प्लाट वाला केस तो याद होगा आप सबको?

बाकी आज एक राजनेता और उसके अनुयायी बहुत खुश हैं, कहते हैं अब नहीं बताना पड़ेगा कि मर्द हैं या गे (gay).

इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर समाज के सभी तबकों में तीव्र प्रतिक्रिया हुई है. अधिकांश इस फैसले को ‘आधार’ पर लागू किए जाने की स्थिति में असहमत हैं. लगभग सभी का मानना है कि इस तकनीकी युग में जब मोबाइल और इन्टरनेट के उपयोग के चलते यूज़र्स की लगभग समस्त निजी जानकारियां विदेशी सर्वर्स में दर्ज हो चुकी हैं, तब इस पर सुप्रीम कोर्ट का ये निर्णय समझ के परे है और इससे आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को प्रोत्साहन मिलेगा. अब कुछ अन्य विशिष्ट व्यक्तियों की प्रतिक्रियाएं जानते हैं (संपादक)

आनंद जी. शर्मा : आधार कार्ड से मेरी निजता का हनन बिल्कुल स्वीकार है यदि आधार कार्ड के द्वारा भारत के खजाने से लाखों की तादाद में फ़र्जी छात्रवृत्ति, करोड़ की तादाद में फ़र्जी मनरेगा, फ़र्जी तनख़्वाह और इसी तरह के फ़र्जीवाड़ों के मार्फ़त बेहिसाब रकम लूट कर टैरर फंडिंग करने वाले स्लीपर सेल बेनकाब हो कर पकड़े जाते हों और उनसे लूट की रकम वसूल करके भारत से गद्दारी करने के जुर्म में तुरन्त सख़्त से सख़्त सजा दी जाए.

मनोज सिंह : चौबीस घंटे मोबाइल पर चिपकने, और घड़ी-घड़ी अपने सोने-जागने की फ़ोटो भी सोशल मीडिया पर शेयर करने वाले लोग जब निजता के अधिकार पर ताली बजाते हैं तो समझ आ जाता है कि सूचना के इस युग मे भी कितनी अज्ञानता है. By the way, nothing is absolute in nature,neither freedom nor privacy.

डॉ राजीव मिश्रा : आज रास्ते में पेट्रोल भराने रुका, फेसबुक का नोटिफिकेट आ गया… आप फलाने फलाने पेट्रोल पंप के पास हैं… कृपया इसकी जानकारी चेक करने में मदद करें… पब्लिक शौचालय में जाओ तो फेसबुक को पता चल जाएगा कि आप हग रहे हैं या मूत रहे हैं… और वो आपसे पूछ बैठेगा कि फेसबुक पर बताइए फलाने पब्लिक शौचालय का फ्लश काम कर रहा है या नहीं… और सुप्रीम कोर्ट को आधार कार्ड में निजता का हनन दिख रहा है! चोर चोर मौसेरे भाई…

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