निजता मौलिक अधिकार, आधार पर अलग से सुनवाई

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अपने एक निर्णय में निजता के अधिकार (राइट टु प्रिवेसी) मौलिक अधिकार मानते हुए कहा है कि यह संविधान के आर्टिकल 21 (जीने के अधिकार) के तहत आता है. सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक बेंच ने सर्वसम्मति से यह फैसला किया.

चीफ जस्टिस जेएस खेहर, जस्टिस चेलामेश्वर, जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस आरके अग्रवाल, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस एएम सप्रे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एसके कौल, जस्टिस अब्दुल नजीर की संवैधानिक बेंच ने हालांकि कहा कि निजता का अधिकार कुछ तर्कपूर्ण रोक के साथ ही मौलिक अधिकार है.

संविधान का आर्टिकल 21 देश के हर नागरिक को जीवन जीने की आजादी और व्यक्तिगत आजादी के संरक्षण की व्‍याख्‍या करता है. इसमें कहा गया है, ‘किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त उसके जीवन और शरीर की स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता’.

हालांकि इस आर्टिकल में ‘निजता’ के अधिकार की व्‍याख्‍या नहीं की गई है, ना ही इसका सीधा उल्‍लेख है लेकिन आर्टिकल 21 में शामिल ‘जीवन’ शब्‍द की व्‍याख्‍या में इस पहलू को भी शामिल किया गया है.

कर्नाटक हाई कोर्ट के पूर्व जज केएस पुत्तास्वामी ने 2012 में आधार स्कीम को चुनौती देते हुए इस मामले में याचिका दायर की थी. सुप्रीम कोर्ट ने 20 से ज्यादा आधार से संबंधित केसों को इस मुख्य मामले से जोड़ दिया. याचिकाकर्ताओं में बी विल्सन, अरुणा रॉय और निखिल डे भी शामिल हैं.

हालांकि, इस फैसले से आधार की किस्मत नहीं तय होगी. आधार पर अलग से सुनवाई होगी. बेंच को सिर्फ संविधान के तहत राइट टु प्रिवेसी की प्रकृति और दर्जा तय करना था. 5 जजों की बेंच अब आधार मामले में ये देखेगी कि लोगों से लिया गया डेटा प्रिवेसी के दायरे में है या नहीं.

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने कोर्ट में कहा था कि निजता मौलिक अधिकार नहीं है. अब इस फैसले का सीधा असर आधार कार्ड और दूसरी सरकारी योजनाओं के अमल पर होगा. लोगों की निजता से जुड़े डेटा पर कानून बनाते वक्त तर्कपूर्ण रोक के मुद्दे पर विचार करना होगा. सरकारी नीतियों पर अब नए सिरे से समीक्षा करनी होगी.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY