मसला-ए-ट्रिपल तलाक़ : मुस्लिम बहनों को क्या और कोई फायदा हुआ भी है

इस्लाम के अंदर विवाह संबंध एक समझौता है और इसलिये इस समझौते को तोड़े जाने की गुंजाइश भी रखी गई है जिसे तलाक़ कहा जाता है. अब तलाक़ दिया कैसे जाये इसको लेकर मुस्लिम समाज के अंदर कई तरह की विधियाँ प्रचलन में रहीं है.

मुसलमानों की बीच सामान्यत: तीन किस्म के तलाक वजूद में हैं :
1. तलाके-बिदअत – जिसमें तीन तलाक एक बार में दिए जाते हैं.
2. तलाके-हसन – इसमें तलाक देकर एक महीने रुका जाता है (हैज के लिये) फिर तलाक दिया जाता है, फिर एक महीना रुका जाता है और फिर तीसरा बार तलाक दिया जाता है.
3. तलाके-अहसन – ये तलाक देने का वो तरीका है जो कुरान और हदीस में उल्लिखित है. इसमें ये है कि अगर कोई तलाक दे देता है तो उसे तीन माह तक रुकना चाहिये और अगर उस तीन महीने के अंदर उसे लगता है कि उसने गलती की या उसे तलाक़ नहीं देना चाहिये था, तो वह अपनी बीबी के साथ रुजु (प्रायश्चित) हो सकता है. इस तीन महीने के अंदर अगर वो रुजु न हुये फिर वो मियां-बीबी नहीं रहते. लेकिन उसके बाद भी अगर शौहर चाहे तो वो अपनी पुरानी बीबी से दुबारा निकाह कर सकता है.

कुरान में आता है- “और जब तुम स्त्रियों को तलाक दे चुको और वो इद्दत पूरी कर लें तो फिर उन्हें उनके पति के साथ निकाह करने से न रोको।” (सूरह बकरह, 2:232)
मगर इस निकाह में फिर से नया मेहर तय किया जाएगा. दुबारा निकाह होने के बाद फिर से कोई समस्या हुई और तलाक देना पड़ गया तो फिर से तीन महीने की मुद्दत है जिसमें वो बीबी के साथ रुजु कर सकता है.

तीन बार ऐसा जायज़ है, उसके बाद फिर से उसे अपनी बीबी से निकाह करने के लिये हलाला विधि का सहारा लेना पड़ेगा जिसके अंदर ये है कि उसकी बीबी किसी और मर्द के साथ निकाह में रहेगी (अरबी में निकाह का एक मतलब ‘विवाह’ है और दूसरा मतलब है ‘जिस्मानी-ताअल्लुकात’) और फिर अगर वो मर्द उसे तलाक़ दे देता है तभी वो अपने पहले शौहर से फिर से निकाह कर सकेगी.

तलाके-हसन का तरीका भी वही है, फर्क बस इतना है कि वहां (तलाके-अहसन) रुजू की मुद्दत तीन महीने की है और यहाँ एक महीने की.

कल जो माननीय सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया है उस फैसले में केवल और केवल एक बात है कि इकट्ठे दी गई तीन तलाक़ (यहाँ तीन तलाक़ माने “एक साथ एक ही वक़्त” में दी गई तीन तलाक़) को असंवैधानिक घोषित किया गया है. यानि सुप्रीम कोर्ट ने तलाक़ की एक विधि, जिसे ‘तलाके-बिदअत’ कहा है, को खत्म किया है.

इसका अर्थ ये है कि :
– तलाक़ की बाकी दो विधियाँ यानि तलाके-हसन और तलाके-अहसन का तरीका अभी भी मौजूद है.

– अगर कोई फोन या whatsapp पर अपनी पत्नी को तलाक़ कह देता है तो उसके मान्य होने की भी गुंजाइश है क्योंकि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इसके ऊपर कुछ नहीं कहा है.

– मुस्लिम महिलाओं को केवल फौरी तलाक़ से मुक्ति मिली है जिस तरीके को पाकिस्तान समेत दुनिया के कई मुस्लिम देश पहले ही अमान्य कर चुके हैं.

– इन तीनों ही विधियों में एक बात कॉमन है कि तलाक़ देते वक़्त औरत से उसकी मर्जी पूछना अनिवार्य नहीं है.

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने तलाक की जिस विधि को खत्म किया है उसे कहा जाता है “तलाक़े-बिदअत”. इस्लाम में बिदअत का अर्थ है “दीन में कोई नई या अलग बात शामिल कर लेना”. जाहिर है इसे मुस्लिम समाज अच्छा नहीं मानता.

इसका मतलब ये है कि “तलाक़े-बिदअत” का तरीका पैगंबर साहब के ज़माने में वजूद में नहीं था, इसके प्रमाण भी हैं. मसलन, पैगंबर साहब के ज़माने में हजरत रुकाना ने अपनी औरत को एक मस्जिद में इकट्ठे तीन बार तलाक दे दी. नबी ने इस पर फरमाया, यह तो एक ही बार है, अगर चाहो तो रुजु कर लो. चुनांचे उसने रुजु कर लिया और अपना घर आबाद कर लिया। (मस्नदे इमामे, 1/265).

एक हदीस में आता है जिसके अनुसार नबी को एक आदमी की खबर दी गई कि उसने अपनी बीबी को तीन तलाक़ें दे दी थी, पैगंबर साहब इस खबर को सुनते ही गुस्से की वजह से खड़े हो गये और फिर फरमाया कि क्या मेरी मौजूदगी में अल्लाह की किताब के साथ खेल किया जाता है.

इसका अर्थ है कि नबी का स्पष्ट फरमान था कि एक साथ चाहे तीन बार तलाक़ कहो या तीन सौ बार, उसे एक ही माना जायेगा. बाद में हजरत उमर फारुख की खिलाफत के दौर में कुछ महिलाओं के अनुरोध पर उन्होंने एक फतवा देते हुए कहा था कि अगर कोई एक साथ तीन तलाक दे देता है तो वो तीन ही मानी जायेगी.

कहते हैं कि बाद में हजरत उमर फारुख ने अपने इस फतवे पर रुजू भी किया था पर ये हो गया था इसलिये मुस्लिम समाज में तलाक देने के इस विधि को भी स्वीकार्यता मिल गई जो आज तक चली आ रही है.

इस्लाम के जो अधिकृत विद्वान हैं, कोर्ट का फैसला उनके लिये बड़ा सुकून देने वाला है और वो बेवजह खुश हो रहे अति-उत्साही राष्ट्रवादियों(?) के ऊपर हँस रहे हैं.

खैर, अनुत्तरित प्रश्न अब भी ये खड़ा है कि एक झटके के तीन तलाक़ को छोड़कर मुस्लिम बहनों को क्या और कोई फायदा हुआ है? जवाब है – नहीं, दुनिया आज भी गोल ही है.

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