कभी यूं भी करिए, सुनहरे भविष्य के लिए

2002 में एक सरदार जी अपने पूरे परिवार सहित कनाडा से आये थे, ज़रा उनकी दास्तान सुनिए. कनाडा में उन्होंने अपने बेटे को जो दसवीं में पढ़ता था एक थप्पड़ मार दिया. क्यों मारा! क्योंकि साहबजादे ने शराब पी रखी थी. उन्होंने एक थप्पड़ मार दिया. अपना बेटा था, इकलौता, कौन सुधारेगा? थोड़ी देर बाद बेटे ने पुलिस बुला ली. सरदार जी पकड़ कर ले जाए गए जेल.

सरदार जी लौटकर आए काफी परेशान. फिर दो-तीन दिन बाद यह बीयर पीकर घूम रहा था और घर आया. वह ऐसी हरकत कर रहा था बर्दाश्त न हुआ. आव देखा ना ताव, एक थप्पड़ फिर जड़ दिया. उसने फिर पुलिस बुला ली.

सरदार जी बड़े आदमी थे, पैसे वाले थे. ज़मीन जायदाद थी, बिजनेस था, कोठी थी, बड़ी इज्ज़त थी. पुलिस को लाख समझाया कि हमारे यहां तो बच्चों को समझाने का तरीका है यह. हमारा बेटा है, आगे से भी हमारी सारी जायदाद संभालनी है. बुढापा इसी की देखरेख में कटेगा. कनाडा पुलिस वाले नहीं माने. फिर 15 दिन की जेल काट कर लौटे घर.

पहला काम किया, वहां से सारी जायदाद बेच दी. वह भी औने-पौने. इसमें कुल महीना-दो महीना लगा होगा. पूरे परिवार सहित जिसमें उनके बुजुर्ग माँ-बाप भी शामिल थे इंडिया (बंगलोर) आ गए. वहां एक होटल में रुके.

अब सरदार जी सीधे बाजार गये. बाजार से एक मोटा डंडा खरीद कर लाये. बेटे को होटल में जी भरकर कूटा. होटल मैनेजमेंट ने चिल्ल-पौं सुनकर थाने को खबर कर दी. वहां भी पुलिस आई और पुलिस वालों ने सब सुनने के बाद बेटे को 7-8 थप्पड़ लगाए. साला! यह बाप तेरी अच्छी जिंदगी की खातिर ही तो इतना कष्ट सह रहा, और तू पुलिस बुलाता है.

बाद में होटल ने सरदार जी को रहना-खाना मुफ्त का ऑफर दिया, उनके भारत में सैटल होने तक. सरदार जी ने कहा ‘भाई वह सब मैं किसके लिए रखता, ऐसा लड़का बड़ा हो कर वैसे भी बर्बाद कर देता’.

अगले दिन बंगलोर के अखबारों में छपा. आप 5 फरवरी 2004 का कोई भी अखबार उठाइये. डेट में मुझे कन्फ्यूज़न है 12 या 13 का है. खबर छपी थी यह पक्का है. बड़ी मजेदार थी तो सबने पढा भी.

बेंगलुरु की एक सोसाइटी ने सरदार जी को सम्मानित भी किया कि बहुत अच्छा काम किया. अपने बाल-बच्चों के प्रति हम ही ज़िम्मेदार हैं. एक उम्र में यही एक तरीका है सुधारने का.

लड़का भी अब इस समय बेंगलुरु में खेती-बाड़ी संभाल रहा है बाप के साथ. एकदम सुधर गया है, ना पुलिस आती है ना जेल जाना पड़ता है. शराब तो वैसे ही छूट गई है. भई प्रश्न यह है हमारे बच्चे अगर बिगड़ रहे हैं तो हमें ही ठीक करना है. उनका भविष्य सोचना हमारी ज़िम्मेदारी है.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY