कहते हो कश्मीर तुम्हारा, तो फिर सरला किसकी बेटी थी?

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यह रचना मेरी कश्मीर की तमाम बहन- बेटियों को समर्पित हैं जिन्होंने अपना बलिदान दिया. साथ ही तमाम पीड़ित कश्मीरी पंडित भाइयों को. इस रचना को लिखते वक्त मेरी आँखें अनवरत झर रही थी. काफी देर तक मैं रोता रहा. लाख कोशिशों के बाद भी अभी भी मैं इस कविता के प्रभाव से उबर नहीं पाया हूँ.

सरला भट्ट और गिरिजा टिक्कू के साथ हुई वहशियाना बलात्कार की सामूहिक वारदात और फिर जघन्य हत्या और उनके शरीर को आरी से काटकर सड़क पर फेंकने की घटना सोचकर मेरा ह्रदय खौफ और घृणा और क्रोध से भर गया. मेरे रोयें खड़े हो गये. ऐसी हृदयविदारक घटना पर किसी कवि का दिल नहीं पसीजा. कोई कविता नहीं निकली.

वेमुला, अखलाक, जुनैद पर कविता की झड़ी लगा दी गई. छाती भी पीटे… पीटिये… मुझे भी दुःख है…! पर एक तरफा ही क्यों दिल धड़कता है….? मुझे समझ में नहीं आता कि इन कवियों, लेखकों बुद्धिजीवियों की कलम से सरला और गिरिजा के लिए एक शब्द भी क्यों नहीं निकले, इसका उत्तर चाहता हूँ…. कश्मीर तुम्हारा है …वेमुला, जुनैद तुम्हारे हैं तो फिर सरला और गिरिजा किसकी हैं?

मेरी कश्मीरी और तमाम अनाम बहन बेटियों को समर्पित ये रचना जिन्हें बात-बात पर कविता लिखने वाले कवि मनुष्य मानते ही नहीं.
यह भारत है जातिवाद-समुदायवाद का एक गहरा खड्डा
राजनीति और वोट लूटने वालों का प्यारा-सा इक अड्डा
कवियों की भी कलम बिकी है यहाँ, पक्षपात का लिए नगाड़ा
कलमकार अब बना लिए हैं अपना-अपना एक बाड़ा.

बड़े-बड़े चश्मों से निकली बड़ी-बड़ी रचनाएं हैं
अखलाक, वेमुला और जुनैद पर आहत भावनाएं हैं,
तिल को ताड़ और राई को खींच पहाड़ बनाएं हैं
और बहुत कुछ घटा देश में, क्या ध्यान में आये हैं

करो पैरवी पीड़ित की, दुखियारों की, असहायों की
रंग-जाति और धर्म-भेद के बिना मदद असहायों की
पीड़ा में भी धर्म-जाति का चश्मा अगर लगाओगे?
फिर निष्पक्ष कलम क्या होगी, कैसे सच कह पाओगे?

भारत के महान कवियों! क्या तुम्हें याद नहीं कुछ भी
एक थी सरला, एक थी गिरिजा, क्या तुम्हें याद नहीं कुछ भी?
बहुत लिखा जग को मथ डाला, उन पर तो कुछ लिखा नहीं
स्मृतिलोप का रोग लगा है क्या तुम्हें याद नहीं कुछ भी?

नाम सुना है सरला भट्ट का, या याद तुम्हें दिलाऊं मैं?
एक थी गिरिजा टिक्कू भी, उनकी भी व्यथा सुनाऊं मैं?
कभी तुम्हारी कलम न डोली, इनकी नृशंस हत्याओं से?
कैसे इनकी अस्मत लुटी, यह भी तुम्हें बताऊं मैं?

कुछ कहते कश्मीर की बेटी, मैं कहता हूँ भारत की
उसकी भी इज्जत लुटी थी वह भी थी इस भारत की,
सामूहिक नोचा था उसको आतंकी गद्दारों  ने
हृदय-विदारक इस घटना पर छाती फटी न भारत की

सरला की अस्मत लूटी थी वहशी और दरिंदों ने
फिर भी उनका मन न भरा नोचा उसे दरिंदों ने,
खींच के सरला के शव को सड़कों पर करी नुमाइश थी
गलत हुआ, चिल्लाओ भी जो किया शैतान दरिंदों ने.

सरला वो थी जिसने  गद्दारों का पता बताया था
देश की खातिर लुटी-मिटी थी, देश का मान बढ़ाया था,
थोड़ी भी गर शर्म बची है कवियों और लेखकों में
सरला भट की गूँज करें सन नब्बे में जब लरज़ाया था.

कहते हो कश्मीर तुम्हारा, तो फिर सरला किसकी थी?
है कश्मीर तुम्हारा तो सरला भी तुम्हारी बेटी थी,
जिस कश्मीर पर छाती कूटे, उसकी बेटी सरला थी
कुछ शर्म करो, कुछ उठो करो वह भी तो हमारी बेटी थी.

एक कहानी और चलो तुमको मैं सुनाता हूं
90 का कश्मीर: तुम्हें वहां लेकर चलता हूं,
क्या गिरिजा टिक्कू का कभी नाम सुना है तुमने?
चलो तुम्हें मैं आज वहां लेकर चलता हूं

जब कश्मीरी पंडित लूटे जा रहे थे
दिन दोपहरी मारे काटे जा रहे थे,
छोड़ जमी अपनी बंजारे हो रहे थे
दौड़-भागकर अपनी जान बचा रहे थे.

उसी समय एक लड़की थी गिरिजा टिक्कू
जम्मू से बांडीपोरा जो आई थी,
‘घर से कहकर वेतन लेने जा रही हूं’
उसे पता नहीं मौत लेने जा रही हूं

बीच सड़क से उसे उठाकर पापियों ने बलात्कार किए
वक्षस्थल को नोचा-काटा अनगिनत दुर्व्यवहार किए,
उसकी पीड़ा का कुछ भी है क्या तुमको अंदाज भला?
सोच नहीं सकते तुम जो वह उस बेटी के साथ हुआ.

पहले नोचा, अस्मत लूटी मिलकर कई दरिंदो ने
चिंघाड़े वो मार के रोई छोड़ा नहीं दरिंदों ने
पत्ते-पत्ते घास-फूस मिट्टी का कण-कण रोया था तब
पर पत्थर दिल लोग चुप रहे, लब ना खोला घाटी ने

इतने से भी मन न भरा किया घृणित हैवानों ने
काट कर उसको आरी से फेंक दिया शैतानों ने,
सरला-गिरिजा की चीखें अभी गूंज रही है घाटी में
न्याय की खातिर तड़प रही है आज तलक वे घाटी में.

कलम तुम्हारी बिकी न हो तो कलम चलाओ इन पर भी
वो भी थीं भारत की बेटियां शंख-नाद करो उन पर भी,
नेता बोलें, चैनल बोले, कलम चले तो उन पर भी
न्याय मिले, हुंकार उठे कुछ कैंडल जले तो उन पर भी.

वरना छोड़ो राग सभी यह कि कश्मीर हमारा है,
अनेकता में एकता यह भारत देश हमारा है,
क्षेत्र, जाति और धर्म-वेश से ऊपर देश हमारा है
सरला-गिरिजा को न्याय मिले तो, कश्मीर हमारा है.

 

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जन्म-1982 अम्बेडकरनगर ,उत्तर प्रदेश, शिक्षा - स्नातक एवं  हिन्दी में ''साहित्यरत्न''.गत 18 वर्षों से मुंबई में निवास.12 वर्ष की उम्र से लेखन , भारत दररोज , जाबाज पत्रकार, मुंबई प्रताप, संवाद शक्ति, फिल्म्स टुडे, हमारे संस्कार,फ़िल्मी संसार,शोध -शक्ति जैसे पत्र- पत्रिकाओं का सम्पादन किया. आनलाइन पोर्टल एवं चैनल jjv न्यूज में कार्यकारी सम्पादक की जिम्मेदारी. दैनिक दिवस रात्रि [पूना ] दैनिक पंजाब केसरी [दिल्ली] इतवार पत्रिका [ दिल्ली ]दैनिक हिंदमाता [मुंबई],दैनिक उत्तर भूमि [मुंबई ] दैनिक ठाणे स्टाइल [ठाणे ] दैनिक प्रभासाक्षी [बिजनौर] सहित अनेक पत्र पत्रिकाओं के लिए लेखन  पहला चर्चित कहानी संग्रह ''चवन्नी का मेला'' 2005 में प्रकाशित. हाल ही में उपन्यास ''अठन्नी वाले बाबूजी'' अनुराधा प्रकाशन दिल्ली से  प्रकाशित. आनलाइन समाचार के चर्चित पोर्टलों प्रवक्ताडॉटकॉम,मेकिंग इंडिया,प्रभासाक्षीडॉटकॉम, जेजेवी न्यूज आदि पर लेख प्रकाशित.चित्रकला [पेंटिग्स] पर हिन्दी में सर्वाधिक लेखन व समीक्षा .. वर्ष 2014 - 15 में सनातन चैनल में रचनात्मक निर्देशक और शोध प्रमुख रहा. मेरी कहानी ''तेरे को मेरे को'' पर एक हिन्दी फिल्म भी बन रही है. इन्डियन प्रेस कौंसिल की 2004 प्रथम स्मारिका का सम्पादन किया, देश की सबसे बड़ी भजनों की पुस्तक भजन-गंगा का अतिथि सम्पादन किया. वर्ष २०११-२०१३ में विहिप के मुंबई से प्रकाशित मुखपत्र विश्व हिन्दू सम्पर्क का सम्पादन.  अटल जी के विशेषांक का अतिथि सम्पादक रहा. देश भर की पत्र पत्रिकाओं में 1500 से अधिक लेख ,कहानियाँ, कवितायें प्रकाशित, फिल्म राइटर्स एशोसिएशन का सदस्य, फिल्मों एवं एल्बम में गीत लेखन. स्वयं के चर्चित ब्लॉग - चवन्नी का मेला पर तमाम विषयों पर गंभीर लेखन ,भारतीय प्रकार संघ का -  कार्याध्यक्ष रहा [ वर्ष २००६-२००७] . हिन्दी भाषा के उन्नयन एवं विकास के लिए अनेक सम्मान . उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए आगाज़ और संवाद शक्ति शिखर सम्मान प्राप्त.  हाल ही में महापंडित राहुल सांकृत्यायन एवं राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर पर आल इण्डिया रेडियो मुंबई पर मेरा विशेष वक्तव्य प्रसारित हुआ .हिन्दी भाषा, कविता पाठ, पत्रकारिता  और उसके उत्थान पर देश भर में वक्तव्य एवं सेमीनारों में सहभागिता आदि सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन एवं हिन्दी और पत्रकारिता के विकास व उन्नयन के लिए देश भर में वक्तव्य, सेमीनार  व भ्रमण

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