समय ‘निकाह’ से पहले और ‘निकाह’ के बाद का

तीन तलाक के मामले को सबसे पहले पुरज़ोर तरीके से 1982 में फिल्म निर्माता-निर्देशक बी आर चोपड़ा की फिल्म ‘निकाह’ में उठाया गया था. उस समय डॉ अचला नागर की मूल कहानी ‘तलाल तलाक तलाक’ पर इसी नाम से ये फिल्म बनी, लेकिन सेंसर बोर्ड ने इसका नाम बदलवा कर ‘निकाह’ कर दिया.

फिल्म सलमा आगा के राज बब्बर से प्रेम… लेकिन उसका बिजनसमैन दीपक पाराशर से निकाह… और निकाह के बाद उस बिजनसमैन की स्वाभाविक बिज़ीनेस (व्यस्तता) से दोनों में ‘तलाक तलाक तलाक’. इसके बाद एक बार फिर से राज बब्बर का सलमा आगा की ज़िंदगी में आना… पुरानी मोहब्बत गहराना… लेकिन फिर दीपक पाराशर को पछतावा, पुनः सलमा आगा से शादी का प्लान… तब मोहब्बत के त्याग में राज बब्बर हलाले को तैयार होता है… लेकिन सलमा आगा इस कुरीति को तड़ाक तड़ाक तड़ाक कर देती है…

ये तो थी इस फिल्म की थीम… जो भी था इस फिल्म ने तीन तलाक की गंदगी को समाज के सामने बड़ी खूबसूरती से पेश किया था.

लेकिन इस ने एक पीढ़ी को बिलकुल बदल दिया था… मामला मियां-मियाईन का था… लेकिन जिंदगी हराम हो गयी बनियों के लड़कों की… बनिया कहो या व्यापारी… सारे युवाओं की महत्वाकांक्षा ‘दिल की ये आरज़ू थी कोई दिलरुबा मिले’ के साथ-साथ अपना बिजनस सेटल करना भी होता है.

अच्छा भला सिस्टम चल रहा था… शादी हुयी… हनीमून टाइम के दो-चार-दस दिन निकले… फिर लड़के ने सुबह नाश्ता किया… निकल लिया दुकान, कारखाने या फैक्टरी पर… ना फोन, ना मोबाइल, ना SMS, न फेसबुक मैसेंजर, ना व्हाट्सएप… देर शाम आए घर, पहले घर के आदमी लोगों ने भोजन किया… फिर सास, बहू, नन्द सबने मिल कर प्रेमपूर्वक भोजन कर चौका बासन निपटाया… और बहू दूध का गिलास लेकर अपने मियां के कमरे की ओर… दिन भर की दूरी और मानसिक या शारीरिक थकान के बाद उस प्यार की ये हर रात ‘फ़ज़ा भी है जवां जवां’ वाली हनीमून नाइट का ही आनंद देती थी.

लेकिन कमबख्त ये पिक्चर क्या आई… हर लड़की का दिमाग खराब हो गया… अब तो हर लड़की यही चाहे कि उसका मियां उसकी आँखों के सामने रहे… दिन में चार बार उसे चूमे… छ: बार हाल चाल ले… मानो नोट तो भगवान बरसा ही देंगे… लेकिन ऐसा हो तो नहीं सकता था ना… लड़के को दुकान फैक्टरी पर भी ध्यान देना है और इधर करोड़पति सुसर की दुलारी… तुनकमिजाज़ सास की लाड़ली को भी खुश करना…

हालत ये हुई कि तनाव दर तनाव… कभी सास से झगड़ा कभी पति से झगड़ा… और लगा ली फांसी… उंडेल लिया मिट्टी का तेल, दिखा ली माचिस… और पूरा घर 498A, 304B में अंदर…

खैर तब तो घर में दो से ज्यादा भाई, दो-चार चाचा ताऊ भी होते थे सो सारे सुख दुख संकट मिलजुल कर बाँट लेते थे… लेकिन अब तो पिता अकेला… भाई कोई नहीं… माँ की भी कोई देवरानी जिठानी नहीं… इकलौता बेटा…

इधर जेंडर टेस्ट की मेहरबानी से लड़कियों की घटती संख्या… और ऊपर से रही सही कसर नारीवादी अपनी कारिस्तानियों से पूरी कर देते हैं… साली ज़िंदगी ज़हर बन गयी है.

लड़की दिखी, भले ही सगाई ना हुयी हो… लड़की को मोबाइल गिफ्ट… मैसेंजर और व्हाट्सएप-बाजी चालू… सगाई होते ही लड़के की लड़की को होटल ले जाने की ज़िद…

जिस हनीमून नाइट के लिए विदा के बाद भी देवी-देवता पूजने के लिए सोमवार या गुरुवार के दिन देख कर वो रात नसीब होती थी… वैसी प्रगाढ़ आत्मीयता के ना जाने कितने दौर शादी से पहले ही हो जाते हैं… और शादी के दिन भांवरों तक का सब्र नहीं होता…

हनीमून नाइट का रोमांच अब शेष रह ही कहाँ जाता है… और फिर एक-दो बार लड़की अपने पीहर गयी, एकाध बार अपने बाप की गाड़ी को लेकर अपने इष्ट देव के मंदिर… और लड़का हर समय उसकी आँखों के सामने रहे ये कंडीशन तो मस्ट है ही…

उधर बहू की सासु माँ को अपनी सासु जी का कठोर प्रशासन याद आए तो ससुर साब को लड़के पर गुस्सा आए ‘उल्लू का पट्ठा, गुलाम बन के रह गया है… ना दुकान की चिंता… ना कारखाने की… खर्चे ऐसे करता है मानो सुसर ने परखा दिये हों…’

रोज की टें टें… चिख चिख… झिक झिक… और फिर यदि बेटे वाला गरीब हुया तो सब के सब बहू के गुलाम… यदि ठीक ठाक हुये तो वो ही अनकहा ‘तलाक तलाक तलाक’… बिरादरी और रिश्तेदारों की पंचायत हुई… जेवर कपड़ों का बक्सा गाड़ी में, चैक हाथ में…

बस… ‘दिल के अरमां आंसुओं में बह गए’… और फिर भगवान ऐसा भी करता है जब दोनों एकांत में कह उठते हैं ‘चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है’… तो बिगड़ी ज़िंदगी बन भी जाती है.

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