ट्रिपल तलाक असंवैधानिक नहीं, 6 महीने तक रोक, केंद्र को क़ानून बनाने का निर्देश

नई दिल्ली. मुसलमानों में प्रचलित एक बार में तीन तलाक की वैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट ने आज को अपना फैसला सुनाते हुए इसे असंवैधानिक मानने से इनकार कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तीन तलाक आर्टिकल 14, 15 और 21 का उल्लंघन नहीं है. यानी तीन तलाक असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता है.

हालांकि कोर्ट ने तीन तलाक पर 6 महीने तक रोक लगा दी है. कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि इस मामले में वह संसद में कानून बनाए. मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने तीन तलाक पर छह दिन तक मैराथन सुनवाई करके गत 18 मई को फैसला सुरक्षित रख लिया था.

मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर, न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ, न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन, न्यायमूर्ति यूयू ललित और न्यायमूर्ति अब्दुल नजीर की पीठ ने एक बार में तीन तलाक की वैधानिकता पर बहस सुनी. इस पीठ की खासियत यह भी है कि इसमें पांच विभिन्न धर्मों के अनुयायी शामिल हैं.

इस मामले की शुरुआत तब हुई थी जब उत्तराखंड के काशीपुर की शायरा बानो ने पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दायर कर तीन तलाक और निकाह हलाला के चलन की संवैधानिकता को चुनौती दी थी. हालांकि कोर्ट ने शुरुआत में ही साफ कर दिया था कि वह फिलहाल एक बार में तीन तलाक पर ही विचार कर रहा है. बहुविवाह और निकाह हलाला पर बाद में विचार किया जाएगा.

गौरतलब है कि 5 जजों की बेंच इस मुद्दे पर सुनवाई कर रही थी. कोर्ट में यह सुनवाई 6 दिनों तक चली थी. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए गए हलफनामे में साफ किया था कि वह तीन तलाक की प्रथा को वैध नहीं मानती और इसे जारी रखने के पक्ष में नहीं है. सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने तीन तलाक को ‘दुखदायी’ प्रथा करार देते हुए न्यायालय से अनुरोध किया था कि वह इस मामले में ‘मौलिक अधिकारों के अभिभावक के रूप में कदम उठाए.’

इस पर सुनवाई तो कोर्ट ने स्वयं संज्ञान लेकर शुरू की थी लेकिन बाद में छह अन्य याचिकाएं भी दाखिल हुईं जिसमें से पांच में तीन तलाक को रद करने की मांग है. मामले में तीन तलाक का विरोध कर रहे महिला संगठनों और पीडि़ताओं के अलावा इस पर सुनवाई का विरोध कर रहे मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत ए उलेमा ए हिंद की ओर से दलीलें रखी गईं. केंद्र सरकार ने भी इसे महिलाओं के साथ भेदभाव बताते हुए रद करने की मांग की है.

मामले में याचिकाकर्ताओं ने दलीलें थीं कि तीन तलाक महिलाओं के साथ भेदभाव है. इसे खत्म किया जाना चाहिए. महिलाओं को तलाक लेने के लिए कोर्ट जाना पड़ता है जबकि पुरुषों को मनमाना हक दिया गया है. यह भी कहा गया था कि कुरान में तीन तलाक का जिक्र नहीं है और यह गैरकानूनी और असंवैधानिक है.

जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत की तरफ से कहा गया कि तीन तलाक अवांछित है लेकिन वैध है. यह पर्सनल लॉ का हिस्सा है. कोर्ट इसमें दखल नहीं दे सकता. यह भी दलील दी गई कि यह 1400 साल से चल रही प्रथा है. यह आस्था का विषय है, संवैधानिक नैतिकता और बराबरी का सिद्धांत इस पर लागू नहीं होगा. पर्सनल लॉ में इसे मान्यता दी गई है. तलाक के बाद उस पत्नी के साथ रहना पाप है. धर्मनिरपेक्ष अदालत इस पाप के लिए मजबूर नहीं कर सकती. पर्सनल लॉ को मौलिक अधिकारों की कसौटी पर नहीं परखा जा सकता.

वहीं केंद्र सरकार ने कोर्ट में अपना रुख रखते हुए कहा कि तीन तलाक महिलाओं को संविधान में मिले बराबरी और गरिमा से जीवन जीने के हक का हनन है. यह धर्म का अभिन्न हिस्सा नहीं है, इसलिए इसे धार्मिक आजादी के मौलिक अधिकार में संरक्षण नहीं दिया जा सकता. केंद्र की तरफ से कोर्ट को बताया गया कि पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित 22 मुस्लिम देश इसे खत्म कर चुके हैं. धार्मिक आजादी का अधिकार बराबरी और सम्मान से जीवन जीने के अधिकार के अधीन है. सुप्रीम कोर्ट मौलिक अधिकारों का संरक्षक है. कोर्ट को विशाखा की तरह फैसला देकर इसे खत्म करना चाहिए. अगर कोर्ट ने हर तरह का तलाक खत्म कर दिया तो सरकार नया कानून लाएगी.

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