तीन तलाक़ : भारतीय राजनीति और वोट नीति दोनों को बदलने वाला है सुप्रीम कोर्ट का फैसला

आज का दिन भारतीय लोकतंत्र और संविधान के नाम है. भारत में जहां लोग 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हो गये थे, वहीं तब से गुलामी में ही जीती आ रही मुस्लिम महिलाओं के स्वतंत्रता का दिन है. आज जो यह तीन तलाक पर, 2 के मुकाबले 3 जजों के बहुमत से सर्वोच्च न्यायलय का दिया गया निर्णय है, उसको सिर्फ मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों के हनन से मुक्ति तक समझने की भूल मत कीजियेगा. दरअसल यह निर्णय, भविष्य में भारत और उसके समाज में होने वाले निर्णायक परिवर्तनों की कुंजी है.

आज जहाँ, मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक की विभीषिका से मुक्ति मिली है, वहीं हलाला जैसी ज़लील रवायत से भी मुक्ति मिली है क्योंकि यह हलाला, हमेशा इस वहशी और पुरुष प्रधान तीन तलाक से ही जन्म लेता आया है. मेरे लिये, आज सिर्फ मुस्लिम महिलाओं को ही मुक्ति नही मिली है बल्कि मुस्लिम समाज की आधी आबादी को मुल्ला-मौलवी की जहालत से मुक्ति मिली है.

यह जो यह मुक्ति मिली वह मुस्लिम कट्टरपंथियों, कठमुल्लों और सेक्युलरों के लिये बहुत बुरी खबर है क्योंकि एक बार उनके चंगुल से बाहर आई यह मुस्लिम आबादी, भारत के भविष्य की राजनीति और वोट नीति दोनों को ही बदलने वाली है. यह किस हद तक बदलेगी यह भविष्य में मोदी जी की सरकार द्वारा उठाय गये कुछ कदमों पर निर्भर करेगा.

मैंने कुछ लोगों की प्रतिक्रियायें देखी हैं जो सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों से इस लिये आक्रोशित हैं क्योंकि उन्होंने तीन तलाक को असंवैधानिक मानते हुये, खुद कुछ न करते हुये, केंद्र सरकार को 6 महीने में कानून बनाने को कहा है.

मैं समझता हूं, यही उचित है. सर्वोच्च न्यायालय का काम कानून बनाने का नहीं है और बिना कानून के वह, एक सीमा से ज्यादा जा भी नहीं सकता है. यहां हमको यह नहीं भूलना चाहिये कि आज से तीन दशक पूर्व इसी सर्वोच्च न्यायालय ने शाहबानो के हक में फैसला दिया था और उस फैसले को इस भारत की संसद ने, राजीव गांधी की अगुवाई में, निरस्त कर दिया था.

अंत में मैं यह कहूंगा कि सर्वोच्च न्यायालय ने, बड़ी दूरदर्शिता से प्रधानमंत्री मोदी को गाजे बाजे के साथ, कांग्रेसियों, वामपंथियों, सेक्युलरों और कठमुल्लाओं के सीने पर चढ़ कर, तीन तलाक को लेकर कड़े कानून बनाने का मार्ग प्रशस्त किया है.

मैं आज तीन तलाक पर आये सर्वोच्च न्यायलाय के फैसलों को, ‘शाहबानो’ के साथ हुए अन्याय की श्रद्धांजलि के रुप में देखता हूँ और जब कल, मोदी जी इस पर संसद में कानून बनायेंगे, तब मैं उसे पूर्व में भारतीय संसद द्वारा, शाहबानो के फैसलों को निरस्त करने व मुस्लिम महिलाओं के शोषण पर मौन रहने के अपराध का प्रायश्चित मानूंगा.

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