ट्रिपल तलाक़ : सांप के मुंह में छछूंदर फंसानी है क्या?

तीन तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सोशल मीडिया में इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई है. मुसलमानों में व्याप्त इस असभ्य और अमानवीय प्रचलन को सीधे-सीधे असंवैधानिक घोषित कर इसे ख़त्म करने से बचकर सुप्रीम कोर्ट ने आम भारतीयों की भावनाओं को भड़का दिया है. इससे यह धारणा भी पुष्ट हुई है कि देश में अल्पसंख्यक, आम नहीं देश के विशिष्ट नागरिक है, विशेषाधिकारों से संपन्न. इस फैसले पर फेसबुक पर आईं कुछ त्वरित टिप्पणियाँ पढ़िए… कहना आवश्यक है कि सभी प्रतिक्रियाएं उनके लेखकों की निजी राय है.

वरुण जायसवाल : 6 महीने की जो रोक लगाई है उसका पालन करवाना कौन सुनिश्चित करेगा ? संविधान के कस्टोडियन होने का जो दम्भ है उसे सरेंडर करने का वक़्त आ गया है. सरकार को कानून बनाने की सलाह देना बंद करो, यह सिर्फ़ जनमानस का विशेषधिकार है.

इसको मौलिक अधिकारों एवं समानता के अधिकारों का उल्लंघन मानकर सीधे निष्प्रभावी किया जा सकता था, कानून बनाने की सलाह देकर सिर्फ़ बला टाली है हुजूरों ने… ख़त्म नहीं किया बस रोक लगाई है अस्थायी रूप से.

रही बात कानून बनाने की तो ये सिर्फ़ गेंद दूसरे पाले में डालने की बात है, कोर्ट के पास संवैधानिक उपाय थे, जिससे एक झटके में ट्रिपल तलाक को खत्म किया जा सकता था… फ़िलहाल कोर्ट ने इस पर राजनीति को बेजा अवसर दिया है

स्वामी व्यालोक : हो गयी रफूगिरी… 3 तलाक! 6 महीने की रोक क्या होती है?… 56 इंच… हंसी और दया दोनों आती है. हामिद को इस देश के मोहम्मडेन डरे हुए नज़र आते हैं, जबकि इस देश का सर्वोच्च न्यायालय भी ‘उनके’ डर से, तीन-तलाक़ जैसी बर्बर, मध्ययुगीन और अमानवीय प्रथा को एक झटके में रद्द नहीं करती. क्यों?

न्यायालय को ‘मोहम्मडेन’ से डर लगता है. हिंदुओं के आराध्य भगवान राम टेंट में रह सकते हैं, जय श्रीराम बोलने पर फतवा हो सकता है, लेकिन उस जहालत को सीधे जहालत नहीं कहा जायेगा, जिसे खुद ‘कुरान’ पर चलनेवाले 56 मुल्कों में से अधिकांश ख़ारिज़ कर चुके हैं. इंदिरा माई के लाए सेकुलरिज्म का उन्वान यही होना था.

संदीप बसलस : हां तो नरेंद्र मोदीजी, सांप के मुंह में छछूंदर फँसानी है क्या? तो सुनो… ज़रा अपने अजीज दोस्त सऊदी के प्रिंस से लिखित में एक अनौपचारिक राय मंगा लो कि तीन तलाक का क्या करना चाहिये.

और उनकी राय होनी ही है तीन तलाक के खिलाफ, वहां तो कानूनी है नहीं तीन तलाक, और उनकी राय को कानूनी जामा पहना दो यहां.

अब यहां की अरब की भेड़ें करके दिखाएं विरोध, अरबियों के कदमों के बोसे को सवाब समझने वाली कौम किस मुंह से विरोध करेगी?

फंस गई न छछूंदर सांप के मुंह में… थोडा लिखा बहुत समझना…

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