तीन तलाक़ पर इससे अच्छा फैसला और कुछ हो सकता था क्या?

सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक़ मामले पर सुनवाई 18 मई को खत्म की थी. आपको क्या लगता है कि तीन महीने बाद चीफ जस्टिस खेहर सीधे बन्द लिफाफे में अपना फैसला लेकर आए होंगे और बाकी चार जजों के सामने पढ़ दिया होगा?

फैसले के मायने समझने के पहले, या फैसले पर अपना फैसला सुनाने के पहले आपको फैसले को समझना होगा, मुद्दे को समझना, मुद्दे की गम्भीरता और महत्व को समझना होगा. थोड़ा अतीत में भी जाना होगा. संविधान सभा, शाह बानो केस से लेकर समय-समय पर हुए तुष्टिकरण, सबको याद करना होगा.

ये भी समझना होगा कि जब वोट के लिए तुष्टिकरण होता है तो महिलाएं उसमें कहाँ ठहरती हैं? ये समझने की भी कोशिश करनी होगी कि क्या भारत की अधिसंख्य महिलाएं वोट देते समय अपने विवेक का इस्तेमाल करती हैं? गर करती हैं तो वो सरकारों को प्रभावित क्यों नहीं कर पाती.

फिर आपको न्यायपालिका की कार्यप्रणाली, उसकी व्यवस्था को भी समझना होगा. आपको ये समझना होगा कि अदालत हमेशा जनभावना के हिसाब से फैसले नहीं दे सकती.

बेंच के पांच जजों में चीफ जस्टिस खेहर सिख, जस्टिस ललित हिन्दू, जस्टिस नज़ीर मुस्लिम, जस्टिस नरीमन पारसी और जस्टिस जोसेफ ईसाई थे. पांच धर्मों के पांच जजों ने तमाम पक्षों को सामने रखते हुए 3-2 के बहुमत से फैसला सुनाया. अगर यही आंकड़ा 4-1 हो जाता तो सोचिए फैसला कितना आसान लगता.

अगर आप सोचते हैं कि यही जज अगर एक ही धर्म से होते तो फैसला कुछ और होता तो आप गलत सोचते हैं. प्रेमचन्द की पंच-परमेश्वर तो पढ़ी ही होगी! ये पूरी तरह सोच विचार कर लिया गया फैसला था, जिसमें फैसले के आंकड़े को जानबूझ कर 3-2 रखा गया ताकि आपको मसले की गंभीरता तो समझ आए ही साथ ही ये भी पता चले कि फैसला आसान या साधारण नहीं था. आखिर इस एक फैसले के लिए ये बेंच कोर्ट रूम के बाहर भी अनेकों बार बैठी होगी. तब फैसला भी तो साझा ही होगा ना!

माननीय मुख्य न्यायाधीश ने ये कहा कि धर्म तर्क का नहीं आस्था का विषय है तो इसमें गलत क्या कहा? अगर ये धर्म के हिसाब से चली आ रही एक प्रथा है तो ये अनुच्छेद 25, जो कि धर्म के स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है, उससे स्वाभाविक तौर पर जुड़ ही जाती है. ऐसे में आपको जस्टिस खेहर से सवाल करने से पहले संविधान निर्माताओं से सवाल पूछने चाहिए.

फिर धर्म तो आस्था का विषय है ही, उसमें तर्क तो आप भी नहीं चाहते! मगर यहाँ धर्म की स्वतंत्रता के ऊपर लिंग के आधार पर व्यक्ति की स्वतंत्रता वैसे ही भारी पड़ जाती है जैसे 2 के ऊपर 3. इसलिए ये 3-2 का आंकड़ा और भी महत्वपूर्ण हो जाता है! यकीन मानिए जज जिस भी धर्म के होते, फैसला यही आता।

फिर अगर इस मामले में एक्सपर्ट ओपिनियन दे रहे हैं तो अधिक नहीं तो कम से कम शाह बानो केस तो आपको याद ही होगा! याद तो होगा आपको कि कैसे जनता की चुनी हुए एक लोकप्रिय सरकार ने माननीय सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था. कैसे एक महिला इस लोकतंत्र में अपनी लड़ाई जीत कर भी हार गई थी.

एक वर्ग इसलिए भी असहमत है कि न्यायालय ने फैसले में सरकार को कानून बनाने के लिए कहा है. तो सोचिए अगर सुप्रीम कोर्ट सीधे फैसला देती और 1985 जैसा कुछ हो जाता तो? या अगर अगली बार परिस्थितियां ऐसी होती कि ऐसे ही किसी मामले में सुप्रीम कोर्ट को कुछ अलग फैसला सुनाना पड़ जाता तो? कानून के अभाव में पीड़ित तो कुछ कर पाती तब? कोर्ट के फैसले कानून तो होते नहीं! फिर ब्रिटेन की तरह यहां पिछले फैसलों से सबकुछ तय तो होता नहीं! ऐसे में तो तब सबकुछ पलट जाता!

भारतीय लोकतंत्र में संसद सर्वोच्च है और कानून बनाने का अधिकार उसी को है. फिर छह महीने तक ट्रिपल-तलाक पर रोक भी लगा दी गई है और अगर तबतक कानून नहीं आ जाता तो ये रोक आगे भी जारी रहेगी.

कोर्ट की टिप्पणी तकनीकी होती है और इसके कई मायने होते हैं. महत्वपूर्ण, फैसला होता है. आप फैसले को देखिए, इससे अच्छा फैसला और कुछ हो सकता था क्या?

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