संघ की पोल खोल भाग-1 : First Hand Experience

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में आपने सुना तो बहुत कुछ होगा लेकिन मैं आपके सामने आज संघ की ऐसी पोल खोलूंगा कि आप सबके दिमाग की बत्ती जल जाएगी. जो संघ नहीं गए और जो कांग्रेसी और वामपंथी विचारधारा के हैं, वे इस लेख को ज़रूर पढ़ें. लेख थोड़ी लंबा है कृपया अंत तक पढ़ें.

मुझे संघ की एक इकाई के अभ्यास वर्ग में जाने का मौका मिला, शुरू में तो मैंने बहाने बनाने की कोशिश की लेकिन मेरी एक न चली और आमंत्रित करने वाले प्रांतीय अधिकारी ने दो टूक कह दिया “आपको चलना ही है”. बहुत अच्छे मित्र हैं मेरे, बहानेबाज़ी का कोई चांस ही नहीं था, मरता क्या ना करता जाना ही पड़ा.

पहुँचा तो देख कर तोते उड़ गए, बहुत सारे लोग थे बड़े बड़े, हॉल में नीचे गद्दे बिछे हुए हैं उन्ही पर सोना है. अब हम जैसा व्यक्ति जो डनलप के गद्दों के किंग साइज बेड पर सोता हो उसके लिए ये किसी यातना से कम न था. खैर शायद वे मेरी शक्ल से पीड़ा पढ़ चुके थे सो एक अन्य अधिकारी के साथ रूम की व्यवस्था की गई.

भोजन करने के बाद हम चल दिये शयन कक्ष की ओर, थोड़ी देर आपस में बातचीत की फिर अन्य अधिकारी भी आ गए और मंत्रणा चालू हो गयी, पिछले वर्ष में क्या-क्या कार्य हुए आगे क्या करना है क्या नहीं, किसे कौन सा पद देना है वगैरह. ये मीटिंग सुबह 4:15 तक चली, इसके बाद हम चादर तान कर सोने को तैयार हो गए.

चादर तानी ही थी कि किसी ने जोर से दरवाजा पीट दिया “चलिये उठिये”, “हाइला ई तो चीटिंग है, अबे अभी तो लेटे थे और 5:00 बजते ही उठा दिया”. खैर फ्रेश होने और स्नान कर के तैयार होने का आदेश था.

बाथरूम की तरफ बढ़ा तो मेरी आत्मा की चीख निकल गयी इतनी लंबी लाइन? हे भगवान् ये कैसा अन्याय है, यहाँ तो घर में भी मेरा बाथरूम कोई और शेयर नहीं करता बीवी और बच्चा भी नहीं सिर्फ कभी कभार ही इस्तेमाल करते हैं और यहाँ तो एक बाथरूम को 20-20 लोग शेयर कर रहे हैं.

अब अपने आपको गाली देने से कोई फायदा नहीं था, मेरा होटल का बिल भी इसीलिए ज़्यादा आता है क्योंकि रूम में सबसे पहले बाथरूम चेक करता हूँ. बजट होटल के बाथरूम चकाचक नहीं होते सो मंहगे में ठहरना पड़ता है, और जितने इत्मीनान से आधे घंटे तक में नहाता हूँ उसके उलट वहाँ 2 मिनट बाद ही दरवाजा पीटना शुरू हो गया, by god गन नहीं थी वर्ना 2-4 टपक जाते.

इतनी असुविधाओं के बावजूद मैने देखा कि लोग बिना शिकायत सारे काम बेहद अनुशासन में कर रहे हैं, हर चीज़ के लिये लाइन, भोजन के लिए, पानी के लिए हर जगह Proper Que, मानो किसी सेना के सैनिक हों. इस अव्यवस्था में जबरदस्त व्यवस्था और अनुशासन को देख कर मैं चकित था.

मैं नया था लेकिन बाकी 20-20 साल पुराने स्वयंसेवक यानी उन्हें इन सब चीज़ों का अच्छा खासा एक्सपीरियंस था फिर भी वे आते हैं और हिस्सा बनते हैं, किस के लिए? क्या मिलता है? अरे मिलना छोड़ो साहब किसी भी अभ्यास वर्ग में उल्टा सीखने के पैसे देने पड़ते हैं, मने पैसे दे कर असुविधा मोल लेते हैं स्वयंसेवक, स्वयंसेवकों की इज़्ज़त मेरी नज़र में आज हज़ार गुना बढ़ गयी, स्वयंसेवक कोई मामूली इंसान नहीं होता वो देश के लिए जीने और मरने वाला व्यक्ति होता है, हर एक स्वयंसेवक को मेरा सलाम.

सुबह 5 बजे उठ कर 6 बजे तक ग्राउंड पहुंचना और फिर सूर्य नमस्कार और व्यायाम, बेहद कड़ा और अनुशासित जीवन, उस असुविधा का भी अपना ही अलग एक मज़ा है, बहुत कुछ सीखने को मिलता है, इस वर्ग का मुझ पर ये प्रभाव पड़ा कि आज अपने आप सुबह 5 बजे नींद खुल गयी, सारे काम फटाफट निपट गए, बहुत अच्छा महसूस कर रहा हूँ.

सच मानिए अगर आप संघ की शाखा नहीं गए हैं तो आप जिंदिगी में बहुत कुछ मिस कर रहे हैं, जिंदगी एक ही बार मिलती है इस जिंदगी में एक बार शाखा ज़रूर ज़रूर जाइये, आपका जिंदगी के प्रति नज़रिया ही बदल जायेगा.

मैं तो कहता हूँ स्कूलों में RSS एक सब्जेक्ट के तौर पर पढ़ाया जाना चाहिए, और बाकायदा हर बच्चे को पूरी ट्रेनिंग देनी चाहिए, यही राष्ट्र निर्माण का सबसे सशक्त माध्यम साबित होगा.

भारत माता की जय, वंदे मातरम.

क्रमशः

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