डोकलाम में ताल ठोकते भगवती चरण वर्मा ‘दो बाँके’

भारत चीन तनाव पर मुझे भगवती चरण वर्मा की कहानी ‘दो बाँके’ याद आ गयी. उसके अंतिम दृश्य का विवरण पढ़िये… यहाँ इस पार का बांका मोदी जी को और उस पार का बांका जिनपिंग और शागिर्दों को फेसबुकिया मान कर थोड़ा परिवर्तन कर दिया गया है…

म्याँज इक्के़वाले ने जवाब दिया – “हुजूर, भारत के हिन्दू फेसबुकियों का सरगना मोदी जी हैं और उधर वालों का सरगना जिनपिंग. कल मोदी जी के शोहदे से जिनपिंग के शोहदे का कुछ झगड़ा हो गया और उस झगड़े में कुछ मार-पीट हो गई. इस फिसाद पर दोनों बाँकों में कुछ कहा-सुनी हुई और उस कहा-सुनी में ही मैदान बद दिया गया.”

“अरे हुजूर! इन बाँकों की लड़ाई कोई ऐसी-वैसी थोड़ी ही होगी; इसमें खून बहेगा और लड़ाई तब तक खत्म न होगी, जब तलक एक बाँका खत्मी न हो जाए. आज तो एक-आध लाश गिरेगी. ये चारपाइयाँ उन बाँकों की लाश उठाने आई हैं. दोनों बाँके अपने बीवी-बच्चों से रुखसत लेकर और कर्बला के लिए तैयार होकर आवेंगे.”

इसी समय दोनों ओर से ‘जय बजरंग बाली’ ‘या अली!’ की एक बहुत बुलंद आवाज़ उठी. मैंने देखा कि पुल के दोनों तरफ हाथ में लाठी लिए हुए दोनों बाँके आ गए. तमाशाइयों में एक सकता सा छा गया; सब लोग चुप हो गए.

मोदी जी ने कड़ककर जिनपिंग से कहा – “उस्ता द!” और जिनपिंग ने कड़क कर उत्तर दिया – “उस्ता द!”
मोदी जी ने कहा – “उस्तोद, आज खून हो जाएगा, खून!”
जिनपिंग ने कहा – “उस्तोद, आज लाशें गिर जाएँगी, लाशें!
मोदी जी ने कहा – “उस्तोद, आज कहर हो जाएगा, कहर!”
जिनपिंग ने कहा – “उस्तोद, आज कयामत बरपा हो जाएगी, कयामत!”

चारों ओर एक गहरा सन्नाटा फैला था. लोगों के दिल धड़क रहे थे, भीड़ बढ़ती ही जा रही थी. मोदी जी ने लाठी का एक हाथ घुमा कर एक कदम बढ़ते हुए कहा – “तो फिर उस्ता द होशियार!” मोदी जी के शागिर्दों ने गगन-भेदी स्वेर में नारा लगाया – “जय बजरंग बली!”

जिनपिंग ने लाठी का एक हाथ घुमा कर एक कदम बढ़ाते हुए कहा, “तो फिर उस्ता द सँभलना!” जिनपिंग के शागिर्दों ने गगन-भेदी स्वर में नारा लगाया – “या अली!”

दोनों तरफ के दोनों बाँके, कदम-ब-कदम लाठी के हाथ दिखलाते हुए तथा एक-दूसरे को ललकारते आगे बढ़ रहे थे, दोनों तरफ के बाँकों के शागिर्द हर कदम पर ‘जय बजरंग बली’ ‘या अली!’ के नारे लगा रहे थे, और दोनों तरफ के तमाशाइयों के हृदय उत्सुकता, कौतूहल तथा इन बाँकों की वीरता के प्रदर्शन के कारण धड़क रहे थे.

पुल के बीचोंबीच, एक-दूसरे से दो कदम की दूरी पर दोनों बाँके रुके. दोनों ने एक-दूसरे को थोड़ी देर गौर से देखा. फिर दोनों बाँकों की लाठियाँ उठीं, और दाहिने हाथ से बाएँ हाथ में चली गईं.

मोदी जी ने कहा – “फिर उस्तारद!”
जिनपिंग ने कहा – “फिर उस्ताहद!”

मोदी जी ने अपना हाथ बढ़ाया, और जिनपिंग ने अपना हाथ बढ़ाया. और दोनों के पंजे गुँथ गए. दोनों बाँकों के शागिर्दों ने नारा लगाया – ‘जय बजरंग बली’ “या अली!”

फिर क्या था! दोनों बाँके जोर लगा रहे हैं; पंजा टस-से-मस नहीं हो रहा है. दस मिनट तक तमाशबीन सकते की हालत में खड़े रहे.

इतने में मोदी जी ने कहा – “उस्ताहद, गजब के कस हैं!”
जिनपिंग ने कहा – “उस्तारद, बला का जोर है !”

मोदी जी ने कहा – “उस्तासद, अभी तक मैंने समझा था कि मेरे मुकाबिले का एशिया में कोई दूसरा नहीं है.”
जिनपिंग ने कहा – “उस्तोद, आज कहीं जाकर मुझे अपनी जोड़ का जवाँ मर्द मिला!”

मोदी जी ने कहा – “उस्तोद, तबीयत नहीं होती कि तुम्हारे जैसे बहादुर आदमी का खून करूँ!”
जिनपिंग ने कहा – “उस्तासद, तबीयत नहीं होती कि तुम्हा़रे जैसे शेरदिल आदमी की लाश गिराऊँ!”

थोड़ी देर के लिए दोनों मौन हो गए; पंजा गुँथा हुआ, टस-से-मस नहीं हो रहा है. मोदी जी ने कहा – “उस्तांद, झगड़ा किस बात का है?”
जिनपिंग ने कहा – “उस्तांद, यही सवाल मेरे सामने है!”

मोदी जी ने कहा – “उस्तासद, पुल के इस तरफ के हिस्से का मालिक मैं!”
जिनपिंग ने कहा – “उस्तांद, पुल के इस तरफ के हिस्से का मालिक मैं!”
और दोनों ने एक साथ कहा – “डोकलाम पेनियांग से न हमें कोई मतलब है और न हमारे पट्ठों को!”

दोनों के हाथ ढीले पड़े, दोनों ने एक-दूसरे को सलाम किया और फिर दोनों घूम पड़े. छाती फुलाए हुए दोनों बाँके अपने शागिर्दों से आ मिले. बिजली की तरह यह खबर फैल गई कि दोनों बराबर की जोड़ छूटे और उनमें सुलह हो गई.

इक्केवाले को पैसे देकर मैं वहाँ से पैदल ही लौट पड़ा क्यों कि देर हो जाने के कारण नख्खास जाना बेकार था.

मोदी जी फेसबुकियों से घिरे चल रहे थे. फेसबुकिए कह रहे थे – “उस्ताद, इस वक्त बड़ी समझदारी से काम लिया, वरना आज लाशें गिर जातीं.” “उस्ताद हम सब-के-सब अपनी-अपनी जान दे देते!” “लेकिन उस्ताद, गजब के कस हैं.”

इतने में किसी ने मोदी जी से से कहा – “मुला स्वाँग खूब भरयो!” मोदी जी ने देखा कि एक लंबा और तगड़ा देहाती, जिसके हाथ में एक भारी-सा लट्ठ है, सामने खड़ा मुस्कुरा रहा है. उस वक्त मोदी जी खून का घूँट पीकर रह गए. उन्होंने सोचा – भला ट्रम्प-पुतिन की मौजूदगी में उन्हें हाथ उठाने का कोई हक भी है.

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