बिजली कंपनी, पुलिस और कानून आपका, और बिजली चोरी की सज़ा ईमानदार उपभोक्ता को!

प्रिय पीयूष गोयल जी और नरेंद्र मोदी जी, आपके काम का आज तक का रिकॉर्ड बहुत शानदार रहा है, जैसे – मार्च 2014 में विद्युत् उत्पादन था 243 गीगा वाट जो मार्च 2017 में हुआ 320 गीगा वाट, लगभग 35% की बढ़ोतरी. इसी तरह 2014 में अधिकतम विद्युत अभाव रहा था 6103 मेगा वाट जो 2017 में आज तक अधिकतम रहा है 2608 मेगा वाट. साथ ही भारत बिजली का आयातक देश होता था, जबकि आज 5798 मेगा वाट निर्यात करता है.

इतने पर भी एक क्षेत्र है जिसमें आपकी पकड़ आज भी नहीं है, और वो है लाइन लॉस. पहले लाइन लॉस का 40% का एवरेज था जो आज भी बदस्तूर जारी है. और अब आप इसका ठीकरा राज्य सरकारों पर भी नहीं फोड़ सकते क्योंकि 16 राज्यों में सरकार भाजपा की ही है. इस 40% लाइन लॉस में से 10% ही सिर्फ टेक्निकल है और 30% है कॉमर्शियल लॉस यानी चोरी.

सरकार आपकी, बिजली कंपनी आपकी, पुलिस आपकी, कानून व्यवस्था आपकी, और बिजली चोरी का दंड भरे ईमानदार उपभोक्ता! रूपए 1.80 से लेकर रूपए 2.30 प्रति यूनिट की दर से खरीदी बिजली (ये रेट आप सरकारी विद्युत प्रवाह एप्प पर रोज देख सकते हैं कि आज का भाव क्या है) राज्य में उपभोक्ता तक पहुंचे 6 से 12 रुपये में!

क्या आप पर मोनोपोली कानून लागू नहीं होता? इतने जबरदस्त मार्जिन वाली चीज़ बेचकर भी विद्युत निगम घाटे में चलते है… क्यों?

हम उपभोक्ता, जो ईमानदारी से बिना चोरी किये बिजली का बिल देते हैं, और उसमें बिजली चोरी की कीमत भी शामिल है, हमारी क्या गलती है???

राज्य सरकारों से क्यों नही कहा जाता कि हर हाल में चोरी रोकें और बिजली की कीमत कम करें, 2 रूपए यूनिट की बिजली, 1 रूपए अधिकतम वितरण खर्च, यानी लागत सिर्फ 3 रूपए प्रति यूनिट और हम घर पर 6 रूपए और शॉप पर 12 रूपए प्रति यूनिट चुकाते हैं.

बिजली चोरी में विद्युत् विभाग भी शामिल होता है, उन पर कार्यवाही की जगह नियामक आयोग हर साल रेट बढ़ा देता है. इसको बदलने की जरूरत है.

केंद्र बिजली की अधिकतम दर तय करे, कोई राज्य उससे ज्यादा कीमत नहीं ले सके, चोरी रोकी जाए. आज बिजली मूलभूत आवश्यकता है और सरकार का काम है उचित लागत पर सेवाएं प्रदान करना न कि प्रॉफिट कमाना.

एक व्यथित आम नागरिक

( 1 गीगा वाट = 1000 मेगा वाट, 1 मेगा वाट = 1000 किलो वाट)

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