बाढ़ की लूट मची है, कोई धन लूट रहा है, तो कोई मौत…

इतिहास की किताबें बताती हैं, सभी प्राचीन सभ्यताएं नदी किनारे बसी थीं, और सभी मानते थे कि बाढ़ समृद्धि ले कर आती है. सचमुच बाढ़ समृद्धि ले कर आती थी, बाढ़ का पानी जाते जाते उपजाऊं मिट्टी छोड़ जाती थी, फिर फसल लहलहा उठती थी. बाढ़ अब भी समृद्धि ले कर आती है, अंतर बस इतना है कि पहले बाढ़ सबके लिए समृद्धि ले कर आती थी, अब कुछ विशेष लोगों के लिए ले कर आती है. बाढ़ आ जाय तो उस क्षेत्र के अधिकारी, नेता, ठेकेदार सब लाल हो जाते हैं. जनता का क्या है, वह तो है ही जनता.

आज स्कूल में आठवीं के एक छात्र ने पूछा- सर, क्या सचमुच बाढ़ की तबाही रोकने का कोई उपाय नहीं?

मैंने कहा- बिल्कुल है. सरकार चाहे तो एक साल में ऐसा कर देगी कि बाढ़ सजा नहीं मजा देने लगेगी.

– तो फिर करती क्यों नहीं? सरकार जब जानती है कि हर साल बाढ़ आनी ही है, तो फिर कोई पक्का उपाय क्यों नहीं करती?

मैं बहुत देर तक सोचता रहा कि क्या मुझे इस बच्चे में सरकार के प्रति नकारात्मकता भरनी चाहिए? पर मैं स्वयं से ज्यादा देर तक लड़ नहीं पाया, मैंने कहा- सरकार अगर बाढ़ का पक्का इलाज कर दे तो हर साल अरबों खरबों के खेल कैसे होंगे बेटा? बाढ़ घर भरने आती है. जिनका घर भरता है वे बाढ़ लाने के लिए कुछ भी कर देंगे.

बच्चा मेरी बात पूरी तरह नहीं समझ पाया. हमलोग भी कहां समझ पाते हैं, कि जो बांध आज से पच्चीस तीस साल पहले तक कभी नहीं टूटते थे, वे अब हर साल कैसे टूट जाते हैं? जिस जमाने में बांध सिर्फ मिट्टी के होते थे, उस जमाने में कभी नहीं टूटने वाले बांध अब पत्थर के बड़े बड़े बोल्डर से बंधे होने के बावजूद कैसे टूट जाते हैं.

कल वरिष्ठ साहित्यकार मंजू श्री बुआ से बात हो रही थी. उनका गांव भी पानी से घिरा हुआ है. उन्होंने कहा- जानते हो सर्वेश, अंग्रेज कितने भी बुरे क्यों न हों, पर उनमें थोड़ी नैतिकता थी, पर आज के शासक-प्रशासकों में थोड़ी भी नैतिकता नहीं. बाढ़ के इलाके को ठीक से घूम के देख लो तो देख कर रोंगटे खड़े हो जाएंगे कि कैसे बाढ़ को धकेल कर लाया जाता है.

वे गलत नहीं कह रही थीं. बाढ़ वाले इलाके के एक शिक्षक मित्र बता रहे थे कि नेशनल हाइवे पर बाढ़ का पानी निकालने के लिए जितने भी पुल बने हैं, आश्चर्यजनक रूप से सबको उत्तर की तरफ से मिट्टी गिरा कर बन्द कर दिया गया था. पुल को किसने और क्यों बन्द किया, और उसे क्या सजा मिली यह तो ईश्वर जाने, हाँ पानी जरूर रुक गया और नदी तथा हाइवे के बीच के सारे गांव डूब गए. डूब गए तो फिर राहत का दौर शुरू हो गया. युवा नेताओं को चंदा मांग मांग, राहत बांट कर तस्वीरे खिंचने और सोशल मीडिया में पोस्ट करने का मौका मिल गया. अधिकारी भी माथे पर मिट्टी की टोकड़ी ढो कर टूटे बांध की मरम्मत के दावे करने लगे, और मीडिया की कृपा से हीरो बन गए. हालांकि दुनिया जाने न जाने, पर दियर के ग्रामीण जानते हैं कि टूट रहे बांध को डीएम साहेब की चार टोकड़ी मिट्टी रोकना तो दूर रोकने का प्रयास भी नहीं कर सकती.

इन सबके बीच एक सत्य यह भी है कि बाढ़ राहत में खर्च होने वाले अरबों की राशि का कोई हिसाब या ऑडिट नहीं होता, कोई खरीद वाउचर जमा नहीं होता. बाढ़ आने के पहले इलाके के सारे सरकारी कार्य जो अभी चल रहे होते हैं, सब उजड़ जाते हैं तो उनके हिसाब किताब का भी कोई भय नहीं होता. ठेकेदार उन्हें जितना हुआ बता दे वही सत्य मान लिया जाता है.

लोगों को शायद पशुपालन घोटाला याद न हो, उसमें सारे विभागों का पैसा पशुपालन विभाग में ट्रांसफर कर निकाल लिया गया था. सांढ़ों को ढोने के लिए प्रयोग की गयी गाड़ियों के रजिस्टर में दर्ज नम्बर को जब बाद में जांचा गया तो पता चला था कि वह मोटरसाइकिल, स्कूटर के नम्बर थे. बाढ़ राहत के खर्चे में ऐसा कोई रजिस्टर होता भी है कि नहीं, भगवान जाने.

बाढ़ तब से आती है जबसे सभ्यताएं बनी हैं, पर इतनी भीषण तबाही और विनाश की परम्परा मात्र चालीस पचास वर्ष पुरानी है. बाढ़ का पानी अगर उन्मुक्त बह जाय तो वह विनाशकारी नहीं होगा. पर नदियों के आसपास के क्षेत्र को ऊंचे सड़कों से घेर कर पानी को बांध देने की गलती, या कहें तो अपराध ने ही विनाश की परंपरा को जन्म दिया है. बाढ़ का पानी यदि खुला बह जाय तो कहीं भी एक दो फिट से ऊपर न जाएगा, पर बांध और ऊंची सड़क के बीच में फंसा पानी पांच पांच फिर तक जाता है और तबाह करता है.

कितना हास्यास्पद है न, कि भारत में एक तरफ जहां सबसे ज्यादा बाढ़ आती है, वहीं दूसरी तरफ सबसे ज्यादा सूखा पड़ता है. मेरे गोपालगंज में ही एक तरफ कुचायकोट, बरौली, बैकुंठपुर तीन प्रखंड बाढ़ में डूबे हुए हैं, तो भोरे में खेत सूख रहे हैं. सत्तर सालों में भी हमारा बाढ़ प्रबन्धन इस लायक नहीं हुआ कि बाढ़ के थोड़े पानी को दूसरे क्षेत्रों में हटाया जा सके.

कल फेसबुक पर एक तस्वीर तैर रही थी. एक पिता अपने शिशु का शव बहा रहा था. एक पिता के लिए अपने बच्चे का शव उठाना दुनिया का सबसे पीड़ादायी काम है, पर अपने मासूम बच्चे के शव की अंतिम क्रिया भी न कर पाने वाला पिता कितनी पीड़ा से गुजरा होगा, यह बस वही जानता होगा. उसकी पीड़ा कौन समझे, और क्यों समझे? दुनिया के सबसे भ्रष्ट देश का प्रशासन संवेदना का अर्थ नहीं जानता.

बाढ़ की लूट मची है, जिसके हिस्से में जो आ रहा है वह वही लूटने के चक्कर में है. कोई धन लूट रहा है, तो कोई मौत… हाँ, यह तय है कि अगले वर्ष भी बाढ़ आएगी, और तब भी वही होगा जो आज हो रहा है.

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