यह पवित्र भूमि ही आर्यों की जन्मभूमि, और हम सब आर्यों अर्थात श्रेष्ठ जनों के वंशज

आर्य ना तो बाहरी थे ना ही आक्रमणकारी, इस कथन के समर्थन में पूर्व में दो लेख लिखे थे, जिनके मूल में निम्नलिखित दो तर्क थे –
क. आर्य अगर बाहरी होते तो अपने साथ अपना कोई धार्मिक ग्रंथ लाते, जैसे ईसाईयों ने बाईबल और मुगल अपने साथ कुरान हिन्दुस्तान लाये. बल्कि आर्यों ने तो अपनी भारत की भूमि पर ही महान वेदों की रचना की. क्या कोई आक्रमणकारी बर्बर मानव समूह, वेदों जैसे ग्रंथ की रचना कर सकता है? नहीं, कदापि नहीं. [क्यों फैलाया गया आर्य आक्रमण और उनके बाहरी होने का झूठ]
ख. हिमालय और सिंधु नदी द्वारा प्राकृतिक रूप से सुरक्षित इस भारत भूमि पर, हजारों साल पहले, उन दिनों इतनी बड़ी संख्या में आदमी और औरतों का बाहर से आना संभव ही नहीं कि सप्तसिंधु जैसी विशाल भूमि पर फ़ैल भी जाएँ और कब्जा भी कर लें.[धर्म परिवर्तन के गिरोहों, आदिकाल से चले आ रहे आदिधर्म के आदिदेव का नाम महाकाल भी है]

अब आज के लेख में उपरोक्त कथन के समर्थन में कुछ प्रमाण देने की बारी है, जो यह सिद्ध करेंगे कि वैदिक संस्कृति (जिसे आर्यों से जोड़ा जाता है) और सिंधु-सरस्वती सभ्यता (जिसे मूल निवासी या द्रविड़ से जोड़ कर देखा जाता है) दोनों में समानता है. और वेदों की ऋचाओं और सप्तसिंधु की खुदाई में मिली समानता यह प्रमाणित करेगी की दोनों एक ही हैं.

अर्थात हड़प्पा-मोहनजोदाड़ो सभ्यता असल में वैदिक संस्कृति का ही एक हिस्सा है. ‘आर्य बाहरी थे’ यह कहने वालो की पोल तब ही खुलना प्रारम्भ हो गई थी जब खुदाई में हड़प्पा-मोहनजोदड़ो सभ्यता दूर-दूर तक फ़ैली हुई मिलने लगी. जैसे कि राजस्थान के सरस्वती नदी के तट पर स्थित कालीबंगा, हरियाणा में सरस्वती तट पर बनावली-राखीगढ़ी और कुणाल, गुजरात में लोथल-धोलावीरा-सुरकोटड़ा और रंगपुर, उत्तरप्रदेश में हुलास और आलमगीरपुर तथा महाराष्ट्र में दाइमाबाद.

यही कारण हुआ कि पहले सिंधु सभ्यता के नाम से प्रचलित हड़प्पा-मोहनजोदड़ो को बाद में सिंधु-सरस्वती सभ्यता नाम देना पड़ा. सप्तसिंधु के विशाल भूभाग पर फैले इस सिंधु-सरस्वती सभ्यता का फैलाव दिन प्रतिदिन फैलता जा रहा है जो दक्षिण में महाराष्ट्र और पूर्व में मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ तक पहुंच चुका है. इन स्थानों की संख्या हजार का आंकड़ा पार कर चुकी है. और अधिक उत्खनन होने पर इसका विस्तार सुदूर पूर्व और दक्षिण तक जाने की पूरी संभावना है. खुदाई में मिल रहे अवशेष अब यह प्रमाणित कर रहे हैं कि यह सभ्यता भी वैदिक संस्कृति का ही हिस्सा थी.

धार्मिक आस्था और कर्मकांड :

खुदाई में प्राप्त अवशेषों में छोटे बड़े पत्थर के बने लिंग जो योनि में स्थापित नजर आते प्रतीत होते हैं यह बतलाते हैं कि सिंधु-सरस्वती सभ्यता के लोग लिंग उपासक थे जो शिव का ही रूप है जबकि ऋग्वेद में रूद्र (शिव) उपासना है. खुदाई में प्राप्त कुछ एक पट्टिका में पालथी मार कर योगिक मुद्रा में बैठी आकृति है जिसके तीन मुख हैं, जो त्रिदेव माने गए. ब्रह्मा विष्णु महेश का वर्णन वेदों में भिन्न-भिन्न नामों से हुआ है जबकि पुराणों में इनकी स्तुति सर्वश्रेष्ठ देवताओं के रूप में हुई है.

कई खुदाई में प्राप्त अनेक आकृतियों में बलि की प्रथा दिखाई देती है जिसका वर्णन वेदों में भी है. कई मूर्तियां ध्यान मुद्रा में मिली हैं. जिन्हे योगी, पुरोहित या देवता की मूर्ती मानी जा सकती है. कई जगह सौभाग्य और समृद्धि के प्रतीक स्वास्तिक के चिन्ह मिले हैं. जो वैदिक परम्परा रही है. कुछ एक जगह कमंडल भी मिला है. हड़प्पा में हाथी की मूर्तियां मिली हैं और ऋग्वेद में हाथी का उल्लेख आया है.

देवी-देवता :

खुदाई में जो साक्ष्य मिले हैं उनसे प्रतीत होता है कि सिंधु-सरस्वती सभ्यता में मनुष्य, पशु और अन्य प्रतीक के रूप में देवी-देवताओं की मान्यता थी और ऋग्वेद में भी मानव, पशु और अन्य प्रतीकों का वर्णन है. ऋग्वेद में पृथ्वी को देवी मानकर स्तुति की गई है तो सिंधु-सरस्वती सभ्यता की खुदाई में कई मूर्तियां में मातृदेवी की उपासना नजर आती है. पुरुष देवता के साक्ष्य दोनों जगह एक जैसे मिलते हैं.

सिंधु-सरस्वती सभ्यता की खुदाई में कई पट्टिकाओं पर पशु उकेरे गए हैं ऐसा अनुमान है कि यह पूजा के लिए प्रयोग में आते होंगे और ऋग्वेद में तो पशुओं को देवता मानकर स्तुति की ही गई है. उत्खनन में वृक्ष पूजा के प्रमाण हैं तो ऋग्वेद में कई ऋचाओं में वृक्ष और वन की उपासना की गई है.

यज्ञ स्थल और हवन कुंड :

आर्यों में यज्ञ के प्रति गहरी आस्था नजर आती है. ऋग्वेद में इस पर विस्तार से वर्णन है. सिंधु-सरस्वती सभ्यता की खुदाई में बणावली लोथल और कालीबंगा आदि कई स्थानों पर हवन कुंड मिले हैं. उत्खनन में यज्ञ स्थल के पास पुरोहितों के रहने के स्थान भी मिले हैं.

शव विसर्जन और पुनर्जीवन :

सिंधु सभ्यता की खुदाई में शवों को जलाने और दफनाने दोनों के प्रमाण मिले हैं. कई कब्रों में मृतक को उत्तर-दक्षिण दिशा में लिटाया गया है और साथ ही बर्तन आदि रखे मिले हैं, कइयों में चूड़ी हार अंगूठियां आदि भी मिली हैं. जो यह दर्शाता है कि यह दूसरी यात्रा में जाने की तैयारी है. ऋग्वेद में भी ऐसी यात्रा का वर्णन है. साथ ही पुनर्जन्म के बारे में वेदों में चर्चा है, साथ ही कई ऋचाओं में शव को दफनाने के भी संकेत मिलते हैं.

वस्त्र आभूषण :

खुदाई में कपास की खेती और वस्त्र आदि के प्रमाण मिले हैं, चांदी के बर्तन में आभूषण और कपड़े के अवशेष हैं जबकि ऋग्वेद में वस्त्रभूषण आदि की चर्चा है. और इन दोनों में साम्यता पाई गई है. खुदाई में एक नर्तकी की मूर्ति भी मिली है जिसके बाल संवारे हुए और आभूषण भी पहने हुए दिखाई देता है जिसका वर्णन वेदों पुराणों में हुआ है.

खुदाई में कृषि और पशुपालन के साक्ष्य मिले हैं जो वेदों में किये गए वर्णन से मेल खाते हैं. लोथल की खुदाई से साफ़ प्रमाणित होता है कि वहाँ एक विकसित बंदरगाह रहा होगा जिसके द्वारा विदेश से व्यापार होता था और वेद में भी ऋचाओं में नावों का उल्लेख है जिनमें समुद्र यात्रा के संकेत मिलते हैं.

ऐसे अनेक साक्ष्य हैं जो यह प्रमाणित करते हैं कि सिंधु-सरस्वती सभ्यता वैदिक संस्कृति का ही एक हिस्सा थी. असल में वेदों की रचना, कोई एक-दो दिन में नहीं हुई, इसके लिए हजारों साल लगे, और धीरे-धीरे सभ्यता के विकासक्रम के साथ-साथ वेद भी सुसंस्कृत होते चले गए. उन दिनों, इतने बड़े भूभाग पर फ़ैली वृहद सभ्यता कैसे एक वैदिक संस्कृति से जुडी हुई थी, सोच कर हैरानी होती है.

भौगोलिक अवस्था और प्राकृतिक व्यवस्था के कारण दो स्थानों के बीच में आपस में अगर कोई भिन्नता मिलती भी है तो वही हमारी संस्कृति की विविधता के रूप में विकसित होती चली गई, जिसे आज भी देखा जा सकता है. जरूरत है इस विविधता में छिपी भिन्नता को समझने की. ना की झूठ फैला कर भ्रमित करने की.

बहरहाल, हमारे इतिहास से जानबूझ छेड़खानी क्यों की गई, यह विस्तार में फिर कभी लिखूंगा, फिलहाल यहां बस इतना ही कि बाहरी अंग्रेजों और मुगलों को यह सत्य और तथ्य कभी नहीं स्वीकार हो पाता था कि जिस भूभाग पर वो राज कर रहे हैं वहाँ हजारों साल पहले से अति विकसित संस्कृति थी. ये लुटेरे यहां आये ही सबकुछ लूटने के उद्देश्य से थे.

यही लुटेरे षड्यंत्रपूर्वक यहां के शासक तो जरूर बन बैठे मगर उनमें हीनता का भाव कम ना हो पाया. इस हीन भाव ने ही उन्हें यहां के समृद्ध इतिहास को धूमिल करने के लिए प्रेरित किया. मगर वे यह नहीं जानते थे कि इस भूमि के कण-कण में इतिहास बसा है, कहाँ-कहाँ वे उसके निशान मिटा पाते? यह असंभव था.

आज हम यह सच जान रहे हैं कि यह पवित्र भूमि ही आर्यों की जन्मभूमि रही है और हम सब हिन्दुस्तानी उन्ही आर्यों अर्थात श्रेष्ठ जनों के वंशज हैं.

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