मैंने ट्वीट पढ़ी, आंखे भर आई और मुंह से बस इतना ही निकला ‘सर आप कूद ही जाओ’

शाम को थोड़ा वक्त मिला तो रिवरसाइड में जाने का मन किया. स्टीलवेल हाइवे पर लेखापानी से कुछ और आगे जाने पर दिहिंग नदी हाइवे के साथ साथ समांतर बहती है.

स्कूटी को साइड में खड़ी कर नदी को देखने लगी …बाबा रे इतना पानी. नीचे नदी, ऊपर हाइवे. पानी बार बार तेज़ी से टकराता हुआ.. और इस टकराहट के परिणाम से उत्पन्न होती हुई निरन्तर वीभत्स रस से सनी हुई आवाज डरा रही थी… कौन जाने कब पैरों के नीचे की जमीन धड़ाम से नदी लील जाए.. सामने से जहां नदी और हाइवे अलग हो रहे थे वहां का नजारा अलग था.. जैसे हाइवे ने नदी को उसकी बाढ़ के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए बेरुखी कर ली हो..

अच्छा नही लग रहा था. वापस घर जाने का मन किया.

स्कूटी पर बैठकर जैसे ही मैन इग्नीशन दिया कि सामने दो लोग खड़े दिखाई दिए… ऐसा लग रहा था कि बिल्कुल अभी अभी आये हों जैसे. बिल्कुल सीधे किनारे पर खड़े हुए. नदी की गहराई में उफनते पानी और उनके बीच बस कदम भर का फासला था.. स्पष्ट था कि एक हल्की सी लड़खड़ाहट और पूरे वजूद का विनाश तय.

देखने से विदेशी लग रहे थे…

“अरे आप लोग वहां क्या कर रहे हैं… प्लीज गेट बैक ऑन द रोड”. मैने स्कूटी का इग्निशन ऑफ की और उनकी तरफ बढ़ी.

“अरे पागल हो क्या …मरना है क्या आप दोनों को…”?

“हां जी… अब न जीना हमको….”

उनकी हिंदी ने अचंभित किया. मैंने उन्हें खींचते हुए लगभग रोड पर ला दिया.

कौन हो आप लोग ?

“मैं पी सी रेन…. और ये एच मार्टिन.”

“ओहो रेन एंड मार्टिन.”

“या या.”

“तो यहां क्यों मरने आ गए… टेम्स नदी सूख गई क्या…. लंदन आई से ही कूद जाते …”

“हम यहां घूमने आए थे… मूड तो अभी अभी बना है न… जिंदगी से निराश हो गए हैं हम… आप चाहती हैं यहां से न कूदें तो ठीक परन्तु आप ही बता दो कहाँ से जान दें ?..”

अरे हद्द है एकदम …यहां मरने से क्या मिलेगा आपको भई ? न्यूजपेपर में एक लाइन तक नहीं मिलेगी. मुआवजा भी नहीं मिलेगा.. आधार कार्ड तो होगा नहीं अतः आपके आश्रितों को नौकरी भी नही मिलेगी.. बहुत मरते हैं यहां ..ध्वनि की तीव्रता सिर्फ 332 मीटर/ सेकंड ही तो है उस पर से दिल्ली बहुत दूर है बड़ा टाइम लगता है वहां तक आवाज को पहुँचने में बेचारी कमजोर होकर पहले ही दम तोड़ देती है.. बड़े आये असम में मरने खातिर.. हट्ट.

अरे मरना है तो दिल्ली के समुंदरों में मरो. वहां करोड़ो में मुआवजे मिलते हैं… उत्तर प्रदेश हरियाणा के ऊंचे ऊंचे कंक्रीट के पहाड़ों से कूद जाओ भई… भले विदेशी हो ही. मीडिया कुछ न कुछ दांवपेंच लगाकर अल्पसंख्यक घोषित करा लेगी और करोड़ों का मुआवजा, राजधानी में फ्लैट छोटे बेटे को नौकरी…. अरे क्या नहीं मिलेगा तुम लोगों को?
काहे यहां जान दे रहे हो फ्री में …?

थोड़ा ज्यादा बोल गई थी शायद. वो दोनों बड़ा सा मुंह खोलकर मेरा मुंह देख रहे थे..

“आपको हमारे दुःख का अंदाजा नहीं है …वरना आप ऐसे नहीं कहती.”……रेन जी ने कहा.

बड़ी मुश्किल थी… रेन और मार्टिन साहब की ग्रामर हमारे लिए अंग्रेजी का ऑक्सीजन बनी थी. समझ मे नहीं आ रहा था कि किसने इनका दिल दुखाया.

“ठीक है फिर …बता तो दीजिये..” मैंने आग्रह किया.

मार्टिन जी ने अपने शर्ट की ऊपर वाली जेब से एक सफेद रंग का A4 साइज का पेपर देते हुए बोले …”पढ़ लेना बिटिया… इसके बाद तुम भी नहीं रोकोगी हमें”.

वो कागज एक प्रिंट आउट था जिसमें किसी तेजप्रताप जी का ट्वीट छपा था.

मैंने ट्वीट पढ़ी… आंखे भर आई…. और मुंह से बस इतना ही निकला “सर आप कूद ही जाओ”…..

और अपनी स्कूटी की तरफ मुड़ गयी.

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