बंदूकें लोगों को नहीं मारती, लोग मारते हैं

अमेरिका की नेशनल राइफल असोशिएशन (NRA) का एक नारा है – गन्स डोंट किल पीपल, पीपल किल पीपल. याने बंदूकें लोगों को नहीं मारती, लोग लोगों को मारते हैं. आप को पता होगा कि वहाँ आत्मरक्षण के लिए हथियार रखना गुनाह नहीं है और अच्छे अच्छे हथियार वहाँ सब को उपलब्ध हैं. इसका कभी कभी दुरुपयोग हो जाता है जैसा कि खबरों में पढ़ने मिलता है.

जब भी कोई कांड होता है जहां गैरजिम्मेदार तरीके से गोलियां चलाकर लोगों को मारा जाता है तब वहाँ कोलाहल शुरू हो जाता है कि बंदूकें बैन करनी चाहिए, बंदूकें लोगों को मार डालती हैं. उसके जवाब में NRA उपरनिर्दिष्ट नारा बनाया और प्रचारित किया। लेकिन अक्सर एक बात की तरफ कम ध्यान दिया जाता है कि जो लोग बंदूक को बैन करने के लिए मुखर हैं, वही लोग उन हत्यारों की विचारधारा का भी साथ देते हैं – the people who aggressively advocate a ban on guns are also the most vocal supporters of the ideologies of those who misuse guns.

वैसे यह देखने की बात है कि वहाँ आम आदमी जेबों में हथियार रखकर नहीं घूमता, घर पर ही रखता है. गाड़ी में रख सकता है क्योंकि वहाँ रातों में या सुनसान जगहों पर लूट भी होती है. और ये गुनहगार भी वे लोग ही निकलते हैं जिनके लिए बंदूक बैन वाले मानवाधिकार की लड़ाई लड़ते पाये जाते हैं.

और ज़रा ये तो बताया जाए, क्या हथियार में जान होती है जो अपने आप से उठकर किसी की जान ले लेगा? जी नहीं, यह तो मनुष्य की सोच है जो उससे हथियार उठवाती है. सामुदायिक विचारधारा है जो व्यक्ति की सोच को ढालती है. ऐसी विचारधारा जो व्यक्ति को जिंदा विस्फोटक हथियार – मानवी बम – बनाती है.

युद्ध में लोग मरते हैं, लेकिन युद्ध किसी को नहीं मारता. युद्ध का अपना कोई वजूद नहीं होता, फिजिक्स की भाषा में कहें तो पोटेंशियल ऊर्जा का कायनेटिक ऊर्जा में बदलाव है. यह अपने आप नहीं होता. युद्ध कोई एक पक्ष शुरू करता है जो कुछ हासिल करना चाहता है. जो भी मारे जाएँ उसके लिए युद्ध शुरू करने वाला पक्ष जिम्मेदार होता है.

अब अगर जो युद्ध शुरू करता है वो अगर जीत जाये और कहे कि ‘आप को शरणागत होना था तो युद्ध नहीं होता’, तो यह कोई स्वीकार्य तर्क नहीं होता. अब कथित ईश्वरीय आज्ञा का हवाला देकर जो ये तर्क देते रहते हैं उनसे तर्क करना समय का अपव्यय है.

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