क्या ज़रुरत थी एक साथ मरने की! बाकी जगहों की तरह रोज़ एक-दो करके मरते

कुत्ते घेर के शेर का शिकार कर रहे हैं
अजीब दौर है, कर्मयोगी शिकस्त खा रहे हैं

जापानी बुखार ने पूरे जापान में उतनी जिंदगियां नहीं निगली होंगी जितनी कि अकेले गोरखपुर और उसके आस पास के इलाके में. आलम तो ये है कि मेडिकल की परीक्षा में “गोरखपुर” शब्द देखते ही छात्र JE का ऑप्शन खोजने लगते हैं. पिछले साल ही AIIMS के एग्जाम में गोरखपुर नाम से 5 सवाल पूछे गए थे जिनका जवाब japanese encephalitis या उनसे जुड़ा कोई तथ्य था. कमोबेश ये ऐसा ही है जैसा कि US MLE के एग्जाम में लोग इंडिया देखते ही TB और अफ्रीका देखते ही एड्स के बारे में सोचने लगते हैं.

जो लोग नहीं जानते कुछ ज्यादा इस मर्ज़ के बारे में उन्हें बता दें कि ये बीमारी मच्छर के काटने से होती है, जिससे JE का वायरस दिमाग में घुस जाता है और तबाही मचाता है. इतना खतरनाक कि एक तिहाई लोग सीधे मौत के मुंह में चले जाते हैं और एक तिहाई आजीवन विकलांग रह जाते हैं. इलाज़ के नाम पे अभी भी मेडिकल साइंस के पास कुछ नहीं है सिवाय बुखार कम करने के, मिर्गी का दौरा पड़ने पे उसे नियंत्रित करने के और समय पड़ने पर असीमित समय के लिए वेंटीलेटर पर डाल कर परिजनों को सांत्वना देने के. हाँ इस बीमारी की रोक थाम के पुख्ता उपाय जरुर हैं जिनमें सबसे कारगर है मच्छरों का नाश और वैक्सीन यानि टीकाकरण.

अब आते हैं गोरखपुर कांड पे. अचानक ऑक्सीजन बंद हो जाने से 60 के करीब बच्चे मारे गए, या यूँ कहें कि इनकी निर्मम हत्या हो गयी. बेचारे तो महसूस भी नहीं कर पाए होंगे मौत के कष्ट को. (दिमाग बुरी तरह प्रभावित होने पे बेहोशी की हालत रहती है).

मगर परिज़न, माँ बाप? जो चले गए वे तो चले गए, मगर जिनको छोड़ गए वो? क्या आजीवन वे अपनी गरीबी, महंगे अस्पताल का भार नहीं उठा पाने की मजबूरी, या सरकार या सरकारी अस्पताल पे किये गए जरुरत से ज्यादा भरोसे का फल – इन सब के मिले जुले जघन्य अपराधबोध से कभी मुक्त हो पाएंगे? क्या वे दुबारा कभी भी सरकारी अस्पताल का रुख कर पाएंगे? और इस खबर से और कितने लोग प्रभावित होंगे? और फिर मामूली सी बीमारी के लिए भी ये लोग किसी कॉर्पोरेट हॉस्पिटल के बिल चुकाने के लिए अपनी जमीन-जायदाद गिरवी रखते पाए जायेंगे? और फिर इस न्यूज़ को निजी अस्पताल वाले अपने विज्ञापन के लिए बेशर्मी से इस्तेमाल करते पाए जायेंगे? और फिर मीडिया?

तो गलती किसकी थी? इन मासूम बच्चों की तो बिलकुल नहीं.

और जैसे कि हर मौत के लिए किसी डॉक्टर को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है, तो यहाँ भी सारा दोष उन्ही डॉक्टरों के माथे लादा जाए, उन्हें पीटा जाए, कॉलर पकड़ा जाए और उन्हें सस्पेंड किया जाए? फिर उनसे कहा जाए कि ये खूब कमाते हैं पैसे, क्यों नहीं लाये ये ऑक्सीजन? हैवान हो गए हैं, शैतान हो गए हैं सारे के सारे डॉक्टर. मौत का तमाशा देखते रहे, कुछ नहीं कर पाए ये ज़ालिम डॉक्टर?

योगी आदित्यनाथ ने कहा था डॉक्टरों से- आप पैसे ना कमायें, दुआ कमाएं. तो डॉक्टर ने ऑक्सीजन की कंपनी को 2-3 हज़ार दुआओं का चेक भेजा. मगर उसे तो साहब ने दुआ नहीं सिर्फ नोट कमाने को कहा था. तब बेचारे डॉक्टर ने मरीजों को भी दुआ देना शुरू कर दिया दवा के साथ साथ. मगर यमराज पे भी दुआओं का कोई असर नहीं. अब क्या करते?

तो क्या गलती योगी आदित्यनाथ की है? उनके क्षेत्र की बात है. लगातार विज़िट करते थे वहां फिर कैसे?

आइये मूल समस्या की बात करते हैं. ये सिर्फ गोरखपुर नहीं पूरे देश के हर सरकारी मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल की स्थिति है.

1. स्वास्थ्य मंत्री – सबसे बड़े गुनाहगार. अधिकतर मंत्रियों को तो मर्ज़-इलाज़ की ABCD भी नहीं आती फिर भी जाने कैसे बन जाते हैं जनता के स्वास्थ्य-जीवन-मौत के मालिक. इन्हें सिर्फ नोट गिनना और वैसी बातें मीडिया के सामने बोलना आता है जो जनता को सुनने में अच्छी लगे, भले वो सही हो या ना हो. सस्ती लोकप्रियता और महंगा कमीशन, बस यही इनकी योग्यता और औकात है.

2. हेल्थ सेक्रेटरी/ स्वास्थ्य सचिव – गुनाहगार नंबर दो. इनका काम है हॉस्पिटल में किस कंपनी का जांच घर खुलवाना है, किसे डायरेक्टर बनाना है, किसका प्रोमोशन कराना है , किसका ट्रान्सफर करना है और किस जगह नयी बिल्डिंग बनवाना है, और इन सब में कितना कमाना है. चूंकि इन्हें वोट नहीं चाहिए तो इन्हें मीडिया से ज्यादा मतलब नहीं. किस कम्पनी के सामान के लिए कितना बकाया है, उसे कब चुकाना है, कितना मोलभाव करना है, नयी खरीददारी कब करनी है, पुराने के मेंटेनेंस को कितना नज़रंदाज़ करना है इन सब का लेखा जोखा यहाँ होता है.

3. मेडिकल सुपरिन्टेन्डेन्ट/ डायरेक्टर – गुनाहगार नंबर 3. या फिर सबसे जघन्य अपराधी. इसीलिए क्योंकि ये डॉक्टर होते हुए भी डॉक्टर जैसा कोई काम नहीं करते. इन्हें सब समझ आता है, कहाँ ऑक्सीजन नहीं है, कहां लिफ्ट ख़राब है, कहां दवाई कम है, किस सामान की खपत ज्यादा है और पूर्ति कम, किस जगह नर्सों की ज्यादा जरुरत है, कहां ट्राली मैन चाहिए और कहाँ ऑपरेशन थिएटर में बिजली-पानी-उपकरण की जरुरत है, इन सब तकनीकी चीजों का ज्ञान इन्हें ही होता है, और इसीलिए ये इस पद पर बैठाए भी जाते हैं. मगर नेता-अफसर के तलवे चाटते-चाटते ये इतने गिर जाते हैं कि ये भूल ही जाते हैं कि कभी ये भी डॉक्टर हुआ करते थे – जिसकी एक ही प्राथमिकता होती है – मरीज़ की भलाई! अब तो कमिशन और परमिशन के चक्कर में ये हर चीज़ बेच देते हैं – अपना ईमान, हॉस्पिटल का सामान और फिर मरीजों की जान.

4. मीडिया – लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ. जनता के अधिकारों का रक्षक. ये थे कभी ऐसे, पर अब शायद नहीं रहे. एक तरफ जहाँ सरकारी अस्पताल की छोटी से छोटी महत्वहीन गड़बड़ी को छाप कर डॉक्टर-नर्स की बेइज्ज़ती करने में जरा सा भी पीछे नहीं हटते, वही कॉर्पोरेट की बड़ी धांधली वाली खबर भी ये पैसे से निपटा लेते हैं. और मंत्रीजी के आगे पीछे भी तो घूमना है इनको. हाँ भाई विज्ञापन का भी तो सवाल है. और फिर निदेशक/ सिविल सर्जन से मिल कर इन्हें जाली सर्टिफिकेट भी तो बनवाना होता है. दरअसल हर कोई सॉफ्ट टारगेट ढूंढता है – यानि ऐसा निशाना जिसपे वार करे तो वाहवाही भी मिले और वो पलट कर वार भी न करे. बेशर्मी की पराकाष्ठा पर जा पहुंचे इन अर्ध-इंसानों से कौन हिसाब मांगे?

5. कंपनी के मालिक – ये कब से दया करने लगे? और इनसे दया की उम्मीद भी किसे है? भाई! कम्पनी – यानी व्यवसाय – यानी पूंजी – यानी पैसा – यानि कोई भावना-ममता-दया नहीं. हाँ भई! अस्पताल कोई व्यवसाय थोड़े है, उसमे पैसों का क्या काम -वो तो सिर्फ दया दुआ पे चल जाए, मगर इन कंपनी का क्या करेंगे? इन्हें दुआ नहीं सिर्फ पैसा चाहिए.

6. जनता-जनार्दन – सरकारी सम्पति पे आपका अधिकार है. तो इसकी सुरक्षा आपका ही दायित्व है. सरकार आप खुद बनाते हैं, कोई दूसरे मुल्क से नहीं आता. जब भी आप सरकारी अस्पताल में होते हैं तो हर जगह थूकने-मूतने की प्रक्रिया आप जितने अधिकार से करते हैं, अनावश्यक पंखे-बल्ब का बेदर्दी से शोषण जो करते हैं, स्विच बोर्ड पे उंगलिया जिस कदर पटकते हैं और यंत्रों-संयत्रों का दोहन-विसर्जन भी जिस तरह करवाते हैं और जूता पहन के ही ICU में प्रवेश का जो रोब दिखाते हैं न – ये सब कहीं न कहीं ऐसे वारदातों को जन्म देने की वजह बन जाता है.

जैसे बात-बात पे डॉक्टर की कॉलर खींच ले जाते हैं आप, और अगले ही पल मंत्री के PA को फोन लगा नर्स से बात करवाते हैं न आप, सबसे पहले आपका ही मरीज़ देखा जाए, और सिर्फ उसे ही VIP सेवा मिले इस सार्वजानिक अस्पताल में भी – ऐसी व्यवस्था चाहते हैं, और इसके लिए कभी गुंडे तो कभी लोकल नेताजी को पकड़-पकड़ के लाते हैं न आप – ये सब घृणित उपाय आगे चल कर ऐसी दुर्घटनाओं के कारण बन जाते हैं. जितनी सजगता से डॉक्टर की कमाई नापते हैं न आप, अगर उतनी ही जागृति और तत्परता से सरकारी संस्थानों की छोटी-मोटी खामियों को दूर करवाने के लिए लग जाते तो अधिकार और कर्तव्य के असमंजस से निकल कर ऐसी दुर्घटनाओं को रोक सकने वाले महानायक कहलाते आप.

खैर मैं क्यों लिखूं ये सब, मैं भी तो एक आम नागरिक हूँ जो ट्रेन-अस्पताल-डाकघर-स्टेडियम-स्कूल की गन्दी दीवारों पे थूकने-खुरचने या अपना नाम लिख कर कुछ क्षणों के लिए अमर हो जाने के ख्वाब में डूबा रहता हूँ.

काश कि वे बच्चे ना मरते! काश ऑक्सीजन की उन्हें जरुरत ही न पड़ती! काश कि उन्हें मच्छर ही ना काटते! काश कि उन्हें जापानी बुखार का टीका लग जाता पहले ही! काश कि वे गोरखपुर में नहीं पैदा होते! काश कि वे गरीब घर में नहीं पैदा होते! काश कि वे भारत में नहीं पैदा होते! काश कि 60 बच्चे एक साथ नहीं मरते – रोज़ एक-दो कर के मरते – जैसा कि बाकी जगहों पर रोज़ मरते हैं!

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