केवल संख्याबल के आधार पर सत्य नहीं बन सकती कोई मान्यता

बचपन में हमारे पड़ोस में एक शरारती बालक था. हमेशा अपनी बात मनवाने के लिए बाल्कनी की दीवार पर ऐसे चढ़ता कि उसका लगभग दो तिहाई शरीर बाल्कनी से बाहर झुकता. बाल्कनी के दीवार में हवा के लिए छेद बनाए थे उस पर पैर रखता. तब उसकी माँ मनुहार करती, फिर कुछ मांगे मनवा कर ही नीचे उतरता वो उत्पाती बालक.

एक दिन उसके मामाजी आये थे और ये बच्चे ने फिर ये हरकत की. मामाजी लपके, उसको कुछ ऐसा पकड़ लिया कि पैरों से आधार छूट गया और तीन चौथाई शरीर बाहर. अधर में लटक रहा था बस मामाजी के पकड़ के बल.

अब मामाजी ने ठंडे सपाट सुर में उसे शांति से पूछा – ‘बोल, छोड़ दूँ’? बच्चे की हालत ख़राब, पैंट भी खराब… फिर नीचे उतारकर माँ और मामा, दोनों ने सही धो डाला… बाद में कभी ये हथकंडा आजमाने की हिम्मत नहीं हुई उसकी!

गांधी के किस्से सुनता हूँ जहां उन्होने अनशन की धमकी देकर अपने मन की करवा ली; तब मुझे यही किस्सा याद आता है. सोचता हूँ, अगर एक बार भी किसी ने उनके सामने एक अर्थी बाँध कर रखी होती… बाकी भी पूरा सामान, चन्दन हार सहित…

और कह दिया होता – ‘अब आप को इसी पर सोना है, अंत तक’! और सब पलंग, गद्दी हटाकर कमरे से सब लोगों को भगा कर बाहर से कमरा बंद करने के लिए भारी भरकम सा ताला हाथ में लिया होता… तो क्या होता… ज्यादा से ज्यादा?

कभी गांधी के चाहने वालों को देखता हूँ तो उनमें वही ज्ञानात्मक असंगति (cognitive dissonance) पाता हूँ जो मुसलमानों में अन्तर्निहित (built in) होता है. मानव ही थे गांधी, गुणों के साथ दोष भी थे.

अगर हम ने नीर क्षीर विवेक किया होता तो तकलीफ कम होती. इस cognitive dissonance के कारण ही देखता हूँ कि अक्सर बात भटकाई जाती है और केवल तू-तू, मैं-मैं रह जाती है.

मनुष्य मरता है तो उसकी देह तत्काल अवांछनीय हो जाती है. क्योंकि उसमें प्राण बचे नहीं. विचारों के साथ भी यही होता है, हर विचार अविनाशी केवल इसलिए नहीं होता क्योंकि उसे किसी व्यक्ति ने दिया है, विचार में अगर कालजयी प्रासंगिकता न हो तो निष्प्राण देह से उसकी अवस्था अलग नहीं है.

यही वास्तविकता है और इसका अपवाद कोई नहीं होता. सत्य को मानने की आवश्यकता नहीं होती और मान्यता केवल संख्याबल के आधार पर सत्य नहीं बन सकती.

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