सिनेमा के बहाने : गुलज़ार, बस तेरा नाम ही मुक़म्मल है!

हिन्दी साहित्य और सिनेमा में जो हैसियत गुलज़ार साहब की है और रही, वैसी किसी की न थी. मतलब सीधा-सीधा कला में दखलंदाज़ी. यानि गीत, कविता, नज़्म, शायरी, कहानी, पटकथा, संवाद, निर्देशन आदि. और हर विधा में अपनी तरह का काम. हिन्दी सिनेमा के लिविंग लेजेंड में सबसे सक्रिय. हालांकि, उनके काम पर इतना कुछ लिखा और पढ़ा गया कि अब कुछ बचा नहीं. 18 अगस्त को उन्होंने 82 साल पूरे कर लिए. मुझे लगा इस बार काम के बजाए उनसे हुई मुलाक़ात की बात लिखी जाये. बदले में आप अपना कोई अनुभव साझा कर सकते हैं. यह भी कितना सुखकर है कि सिनेमा में सक्रिय किसी मुक़म्मल शख़्सियत से मिलने का अवसर नसीब हुआ.

मुझे लगता है कि गुलज़ार को पसंद करने वाले हर शख़्स का अपना एक गुलज़ार ज़रूर होगा. जो उससे बोलता और बातें करता होगा. क्या अब भी कुछ बाक़ी है उन पर कुछ लिखने, पढ़ने को? ऐसी कौन सी बात होगी जो सिनेमा के प्रेमियों को पता न होगी उनके बारे में? शोहरत, अवार्ड, बुलंदी, काम सब कुछ के बारे में तो पता है.

पर मुझे लगता है कि हमें यहाँ थोड़ा रुकना चाहिए और अपने समय की एक मक़बूल शख़्सियत को भागते समय में स्लो मोशन में एक ज़ूम लैंस से देखना चाहिए. गुलज़ार की शख़्सियत ने उनके काम से जो ‘औरा’ बनाया है वह अब एक किंवदंती बन चुका है.

18 अगस्त को अपने जीवन के 82वें वर्ष में प्रवेश कर चुके गुलज़ार इस समय दिलीप कुमार और लता मंगेशकर के बाद हिन्दी सिनेमा की सबसे बड़ी सम्मानित धरोहर हैं और उनके होने से सिनेमा प्रेमियों के लिए बुज़ुर्गीयत की छाया होने का अहसास बना हुआ है. बतौर गीतकार, लेखक, निर्देशक जहाँ गुलज़ार ने सिनेमा में आसमानी बुलंदियाँ अर्जित की वहीं साहित्य में उनके स्थान को लेकर बहस-मुबाहिसों के बीच भी एक गरिमामयी उपस्थिति और स्थान उन्होंने ख़ुद के लिए खोजा.

गुलज़ार को चाहने वाले हर एक की स्मृति में उनकी कोई न कोई कविता, कहानी, गीत, फ़िल्म होगी ही. अनेक क़िस्से तैर रहे होंगे ज़ेहन में. ऐसे में जब सोशल मीडिया से लेकर आम ज़िंदगी में हम सब अपने-अपने अंदाज़ में ख़ुश हो रहे हैं, मुझे लगता है कि आज मुझे अपना कुछ ज़रूर साझा करना चाहिए. हर बार यह नसीब नहीं. बतौर शख़्सियत यह शायद गुलज़ार को उनके चाहने वालों के और नजदीक ले जाएगा. यही गरज है कि इस बहाने और क़िस्से सुनने को मिलें, उस अवाम से जिसके लिए सिनेमा बनता है.

पुणे फ़िल्म इंस्टीट्यूट में रहने के दौरान 2014 के अप्रैल माह में ख़बर आई कि हिन्दी सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार इस बार गीतकार और निर्देशक गुलज़ार को दिया जाएगा. छात्र रहते हुए हम सबके लिए बड़ी बात यह थी इस मौक़े पर राष्ट्रपति भवन में दिखाई जाने वाली फ़िल्म का ज़िम्मा इंस्टीट्यूट को मिला था.

ज़ाहिर है इस अवसर के लिए हम सब रोमांचित ही थे. तय यह हुआ कि हर डिपार्टमेन्ट को अपना योगदान देना होगा. बात पहले स्क्रिप्ट से ही शुरू होनी थी. कविता, साहित्य और ख़ासकर हिन्दी से जुड़ाव के कारण मेरे क्लासमेट्स ने इस फ़िल्म की स्क्रिप्ट के लिए हमारे डायरेक्टर को मेरा नाम सुझाया. शुरुआती झिझक के बाद हमने एक रफ़ स्क्रिप्ट तैयार की जिसमें गुलज़ार के जीवन, सिनेमाई सफ़र, चित्र और कुछ वीडियो फुटेज आदि के अलावा फ़िल्म इंडस्ट्री के उन कुछ चुनिन्दा लोगों से बातचीत का प्रस्ताव भी था जिन्होंने साहब के साथ काम किया है.

प्रोडक्शन का काम फ़िल्म डिविजीन का था और मैं बस अपनी तैयारियों में था. एफटीआईआई की लाइब्रेरी और आर्काइव से पुराने फुटेज और तस्वीरें निकालने का काम शुरू हुआ. और एक-एक के बाद कई चित्र मिलते गए. उन्हें देख कर बस हैरत ही होती और कभी-कभी सुखद आश्चर्य भी कि जिस आदमी का नाम सुन-सुन कर बड़ा हुआ, जिसके गीत, फ़िल्में और नज़मों ने ज़िंदगी जीने का एक नज़रिया दिया, आज उसी पर मैं एक फ़िल्म बनाने जा रहा हूँ.

फ़िल्मी दुनिया का ये एक बड़ा आकर्षण होता है कि आप जिसे सोचते और जीते हैं, उससे मिलने की ख़्वाहिश पूरी हो. बहरहाल, एक के बाद एक चीज़ें बनती गई और विशाल भारद्वाज, विद्या बालन, जितेंद्र, अमोल पालेकर, शंकर-एहसान-लॉय, रज़ा मुराद, नरेंद्र सिंह, जैसे कई नाम जुडते गए जिनसे हमें बातचीत भी करनी थी. इन सबमें सबसे अलग विद्या बालन के साथ काम करते हुए महसूस हुआ. बात-बात पर बच्चों जैसी हँसी, आँखों में चमक, कविता-शायरी और सबसे बड़ी बात दस मिनट की मुलाक़ात का दो घंटे में तब्दील होते हुए गुलज़ार साहब पर बात करते जाना. फिर एडिट-रीएडिट का सिलसिला चलता रहा और तीन मई को अंततः उनके दादा साहब फाल्के पुरस्कार ग्रहण करने से पहले राष्ट्रपति भवन में हमारी बनाई हुई फ़िल्म चलाई गई.

यह भूमिका केवल इसलिए कि जिस तरह से केवल बीस-पच्चीस दिनों में एक फ़िल्म पूरी बन कर तैयार हो गई जिसमें इतनी सारी रिसर्च और लोग, विभाग जुड़े हुए थे वो आमतौर पर इतना आसान नहीं था. पर संभव हुआ तो उस शख़्स के नाम के कारण. हालांकि, गुलज़ार साहब को वो दर्जा और हक़ हासिल है जब क़रीब पचास साल हो गए उन्हें हिन्दी सिनेमा में काम करते हुए और ये सिलसिला अब भी जारी है.

यहाँ तक भी सब सपने जैसा था मेरे लिए. फिर एक दिन यह सपना अचानक से हक़ीक़त में बदल गया. यह 19 मार्च 2015 का दिन था और शहर था मुंबई. मुझे दोपहर 2:30 बजे का समय मिला था पर मैं लगभग 2 बजे से ही बांद्रा के पाली हिल इलाक़े में टहल रहा था. घड़ी में 2:20 का समय हुआ और मैंने ‘बोस्कियाना’ के गेट पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई. कुछ ही देर में, मैं अंदर था. एक हॉल था और वहाँ सीलिंग पर कोने में एक छोटी रंगीन टीवी में क्रिकेट मैच चल रहा था, जिसकी आवाज़ बंद थी. …मैं सोच रहा था किधर जाऊँ और ज्यों ही बाएँ हाथ की तरफ़ मुड़ा मेरे पाँव रुक गए, आँखें बड़ी हो गईं. बड़ी-सी मेज़, किताबों का ढेर, ऊपर एक लैंप लटकता हुआ और उस मेज़ के पीछे कुर्सी पर सफ़ेद कुर्ते में चश्मे की एक डंडी दाँत में दबाये वो शख़्स! ‘अरे ये सेट अप तो वही फ़ोटो है जिसे कई बार देखा है.

कहीं, ये फ़ोटो हैरी पॉटर फ़िल्म की तरह अख़बार से निकल कर विज़्युयल तो नहीं बन गई’! हाँ, वही थे, संपूरण सिंह कालरा. और फिर अपनी बूढ़ी आँखों से मुझे ऊपर से नीचे तक देखते हुए अपने घर काम कर रही स्त्री से जब उन्होंने क्रिकेट मैच का स्कोर पूछा तो मेरे भीतर पता नहीं क्या उतर आया! ओह ये तो वही आवाज़ है, कुछ-कुछ भारी और बहुत-कुछ रूह को छूने वाली. मैं बस बैठा रह गया. एक आँसू गाल पर बह आया चुपचाप.

फिर एक आवाज़ आई, ‘अशोक (बिंदल) ने बताया था तुम्हारे बारे में, क्यूँ मिलना चाहते थे’! मैं क्या जवाब देता कि क्यों मिलना चाहता था. चुप खड़ा रहा. फिर एक हँसी, वही जो नाभि से आवाज़ की घुड़की की हुनक लिए होठों पर आती है. चश्मे की एक डंडी अब भी दांतों में थी. एक लंबी सांस ली और बस देख रहे थे जैसे मुझे स्कैन कर रहे हों. मेरे पास शब्द नहीं थे, जैसे-तैसे बस इशारा ही किया मैंने कि कुछ सेकंड और दे दीजिये ताकि संभल सकूँ.

प्रत्युत्तर में आँखें ही झपकाईं. फिर एक ख़रज का स्वर गूँजा, उसी हँसी के साथ (और अंदाज़ भी वही जिसे कई बार वीडियो पर देखा-सुना), ‘भई, इस तरह तो क्या बात होगी’. मैंने महसूस किया वो ठहराव, जो आज से नहीं पिछले पचास सालों से उनका साथी रहा. मुझे लगा कि कुछ भी कहने का कोई मतलब नहीं. और बात की कोई गुंजाइश ही नहीं क्योंकि मुझे उनसे कोई काम ही नहीं था. वो भी बैठे रहे मगर, और कुछ काम नहीं कर रहे थे, सिवाय मुझे देखने के.

मुलाक़ात के तय समय के पूरे होने से दस मिनट पहले ही मैं चला आया. ख़ुद के लिए केवल एक काम किया कि अपनी डायरी में जहां बहुत पहले एक कैप्शन लिख छोड़ा था, ‘बस तेरा नाम ही मुक़म्मल है’ उसके नीचे उनके दस्तख़त लिए. शायद, जिस नज़्म ने मुझसे वादा किया था बहुत पहले, वो अब जाकर मुक़म्मल हुई! आप शतायु हों गुलज़ार साहब, जय हो!

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