लव जिहाद : बांग चर्च का भी मुर्गा क्यों न दे, हम सूर्योदय होने से मतलब रखें

लव जिहाद को आज स्वीकृति क्यों मिली? योगी जी संसद में बोले तब सभी उनको नोचने उठे थे. हिन्दू जब उस पर लिखते रहे तो तथाकथित सेक्युलरों से ट्रोल होते रहे. मुसलमान इस बात को नकारते रहे कि ऐसी कोई बात है भी. आज अचानक ये परिवर्तन कैसे हो गया ?

इसे जानने के लिए ‘लव जिहाद’ शब्द कहाँ से आया यह समझेंगे तो बेहतर होगा. यह केरल से आया है. वहाँ इसाइयों की बेटियों को बड़ी मात्रा में निशाना बनाया जाने लगा तो उन्होने इस मुद्दे को उठाया. यह एक सुसंगठित षडयंत्र होने का आरोप वहीं लगा तथा वहीं के पुलिस प्रमुख तथा जज ने इसका नामकरण किया ‘लव जिहाद’!

वहाँ आप को किसी के नाम से उस व्यक्ति के ईसाई होने का पता नहीं चल सकता, अक्सर हिन्दू नाम रखते हैं. खैर, उक्त जज और डीजीपी के धर्म से मतलब नहीं रखें, उनके आभारी ही रहें कि कम से कम इस षडयंत्र को उन्होने चिह्नित और परिभाषित तो किया. उनकी वजह से आज तथाकथित सेक्युलरों के ताबे में रही मीडिया को यह शब्द स्वीकारना पड़ा.

प्रधानमंत्री होने के पहले एक बार मोदी जी भी केरल हो आए थे, वहाँ के सीरियन कैथॉलिक चर्च के पुरोधाओं ने उन्हें बुलाया था. मोदी जी के प्रधानमंत्री होने के बाद वे दिल्ली आते रहे हैं. हाल ही में केरल के पूर्व मुख्यमंत्री उम्मेन चांडी ने लव जिहाद की शिकार बनी 2500 से अधिक युवतियों का उल्लेख किया. वहाँ भी वर्गीकरण देते तो मामला अधिक साफ होता.

याने यह स्पष्ट है कि इसाइयों को लव जिहाद से तकलीफ होने लगी तभी लव जिहाद का न्यायपालिका, सरकार, तथा मीडियाद्वारा संज्ञान लिया जाने लगा. अब ये शब्द ‘लव जिहाद’ इनके लिए अस्पृश्य नहीं रहा. जब तक मामला हिंदुओं का था, लव जिहाद को figment of fervid fanaticism कहकर कूडे में फेंक दिया जाता था.

टीवी पर इसपर डिबेट होती तो मुसलमान वक्ता बेशर्मी से अनर्गल आरोप लगाते, एंकर तथा अन्य पैनेलिस्ट हिंदुवादी वक्ता का मज़ाक उड़ाते. एक मराठी डिबेट में मैंने नौशाद नामक वक्ता को यह कहते भी सुना है कि हिन्दू लड़कियां अपने धर्म में बहुत दबी हुई हैं इसलिए समानता देने वाले इस्लाम में आना चाहती हैं. तब तीन तलाक का मामला उठा नहीं था.

दु:ख के साथ यह कहना होगा कि यह मुद्दा हिंदुओं की चुने हुए सरकार ने उठाया तो है लेकिन इसाइयों के आवाज उठाने पर. दु:ख के साथ यह भी कहना ही होगा कि यह मुद्दा तीन सालों में इसके पहले भी उठ सकता था. यह बात हिंदुओं को नोट करनी होगी और इस सरकार पर दबाव बनाना होगा ताकि वो हिंदुओं पर अन्याय न करे.

कोई बात नहीं, हिंदुओं को अपने काम से मतलब रखना चाहिए. अब मामला उठा ही है तो उठाना चाहिए. वा/मियों को बिना मुरव्वत के जवाब देने चाहिए. उठा है तो अब दौड़ लगा कर लक्ष्य को पाना है. भले ही दौड़ने के लिए जूते चर्च से लाने पड़े.

इसीलिए कहा कि बांग किसी का भी मुर्गा दे, सूर्योदय होने से मतलब रखिए. चर्च का मुर्गा ही क्यों न हो. मुद्दा अब ढंकने न दें. वैसे मराठी भाषी पाठक समझ जाएँगे कि यह एक मराठी मुहावरे का अनुवाद है.

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