जिजीविषा : घर चलो मेरे प्यारे!

इस गहन रात्रि में, जब फट पड़े हैं बादल,
हो रही मूसलाधार! गरजती हैं बिजलियाँ,
लरजता होगा न एक पिता का हृदय!
वह चाहता है, एक आश्वासन, एक ढाढ़स,
एक भरोसा, देवताओं से!
लड़ाई जो है ठानी उसने तुम्हारे और अपने प्रारब्ध से,
नियति रूपी इंद्र के खिलाफ जब चाहता है वह कर्म के गोवर्धन को पूजना,
तो, मांगता है वह आश्वासन पितरों और पुरखों से,
खड़े होंगे वे साथ उसके इस अलौकिक युद्ध में.

अस्पताल की ठंडी लोहे की बेंच को चाहता हूँ भूलना,
तुम्हारी नन्ही हथेलियों की गर्माहट से,
मांगता हूं नियति से, तुम्हारी सांसों का स्पर्श,
अपने कंधे और वक्ष पर.
सुई से तिल-तिल बिंध चुके तुम्हारे नन्हे शरीर पर,
खोजता हूँ , वह एक बिंदु,
जहां फेर सकूं अपने आशीर्वाद का हाथ!
कैसे, सह रहे हो इतना?
एक उखड़ती सांस को थामे रखने का संघर्ष,
क्या तुम्हारी उम्र पर भारी नहीं है?

…..एक गुलाबी पर्दा है, जिसके पीछे है
शीशे की एक सर्द और ठस्स दीवार.
13 दिन, हां 13 दिन या 14 दिनों से शायद,
शीशे के उस पार तुम, इस पर मैं
जूझते हैं अपने ही एकांत से, अपने ही भवितव्य से!
..में तुम्हें देना चाहता हूँ वह,
जो मेरे पिता ने दिया था 8 साल पहले!
21 दिनों की बेहोशी से उबरकर,
कहा उनका हाथ पकड़कर,
बाबूजी!……..मुझे घर जाना है.
तुम कह नहीं सकते,
पर चलने को तैयार तो हो,
देर ही सही, घर चलो मेरे प्यारे!

…चाहता हूँ सुनाना तुम्हें वो सैकड़ों प्रार्थनाएं,
जो कर रहे लोग तुम्हारे लिए!
उनके श्रद्धावनत शीशों पर करो तुम नर्तन,
खेल में ही तोड़ दो उनकी गंभीरता का कवच,
उन्हें दो अपनी थोड़ी सी मासूमियत और जिजीविषा,
अपनी उंगलियों में थाम लो उनका हाथ,
और घर चलो, घर चलो!!

….इंतजार! ईश्वर न करे, कभी तुम्हें करना पड़े,
क्योंकि इसके दर्द का है मुझे अंदाजा,
क्या होता है, आंखों में रात काटना और
सर्द बेंच पर बैठे शून्य को निहारना,
यह पता है मुझे!
नहीं चाहता, तुम्हें कभी पता चले.
मैं तो बस चाहता हूँ
…कि तुम घर चलो!!

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