कोई कैसे निर्धारण करे चेतना के रूप का?

Soul Connection
Soul Connection

ये एक असम्भव सी बात होती है कि कोई किसी को कह सकता है कि वो चेतन है और न ही कोई किसी अन्य को ठीक ठीक बतला भी सकता है कि वो चेतन है. असल में ये प्रश्न मायाजगत का एक भ्रम ही है जो किसी काम का नहीं है. अगर गंभीरता से देखा जाए तो ये प्रश्न मात्र उत्सुकता का होता है जिसका कोई अर्थ असल में निकलता ही नहीं है.

चेतन होने के कुछ लक्षण अवश्य होते हैं जो वास्तविक तौर पर एक साधक की संपत्ति ही होते हैं. जैसे जो मायाजगत में पैसे कमाता और बचाता है वैसे ही कुछ कुछ ऐसा कहा जा सकता है. एक ही पोस्ट पर दो के रहने पर भी दोनों एक जैसा कमाकर भी, एक जैसा बचा नहीं सकते हैं. क्योंकि व्यवहार जगत का अलग स्वभाव होता है. वहीं एक ही स्कूल में पढ़े भी अलग अलग भागभोग और रुचि अनुसार ही संपत्ति अर्जन को लक्ष्य करते हैं.

इतना होने पर भी चेतन प्राणी के अलग ही लक्षण होते हैं. उस पर विचार अनुचित न होगा.
साधना के द्वारा, जो कि कुछ भी तरीका हो सकता है, एक घनीभूत अवस्था की प्राप्ति तय होती है. ये आरंभिक अवस्था में इतनी दृढ़ नहीं होती है और अलग अलग साधकों में अलग अलग रूप से प्रकट होने का स्वभाव रखती है. चूंकि हरेक की मानसिक शारीरिक अवस्था अलग अलग प्रकार की होती है.

इस घनीभूत अवस्था का एक लक्षण अवश्य ही समान होता है जो कि सृष्टि आधार से जुड़ा है. आकर्षण तत्व. ये अपने आप में अतंर और बाह्य गति का विस्तार करने में सक्षम होता है. जैसे जैसे ये घनीभूत अवस्था निर्मलता को प्राप्त होकर शुद्धावस्था की ओर गमन करने लगती है वैसे वैसे ही कालगति का अंत होने लगता है. या आरम्भ अवस्था में time element का stretch या expand होना शुरू हो जाता है.

इसी के साथ अलग अलग प्रकार की विभूतियां भी प्रकट होने लगती हैं, पर वो इस लेख का उद्देश्य नहीं होने से प्रसंग का हिस्सा नहीं बन पा रहा है. हालांकि कार्य क्रिया कारण जगत में उसका बहुत बड़ा महत्त्व है. बल्कि ऐसे कहा जा सकता है, कि आंतरिक अवस्था का प्रमाण इसी रूप में बाह्यजगत में उद्भासित होता है. ये बात पुस्तक मात्र के शब्द नहीं रह जाती वरन् इस अवस्था से पुस्तक लायक शब्द स्वयमेव प्रस्तुत होने लगते हैं. जो इस परिधि के बाहर रहते हैं उनकी दृष्टि इस अद्भुत जगत को समझने के लिए पर्याप्त नहीं रहती है. उसके लिए तो स्वयं वैसा बनना पड़ता है.

जो ऊपर लिखा है वो अलग ही अवस्था का विवरण है जिसकी यात्रा आगे बहुत बाकी है. गहनता में जाना उचित नहीं होगा क्योंकि एक लक्षण के समझने के लिए जो आकर्षण तत्व रूप में है, वो इतना ही संतुष्टि देने वाला है. ये लेख भी साधक मात्र के लिए है. लक्षण का अभिप्राय इतना ही है कि पुस्तकीय ज्ञान अलग विषय वस्तु है और परमात्मा अंतरात्मा में ज्ञानप्राकट्य सर्वथा अलग वस्तु प्रसङ्ग है.

इसमें ये भी जोड़ना उचित रहेगा कि भारतवर्ष में जो जो धर्मगुण ज्ञात वा अज्ञात रूप में दिखलाई पड़ते हैं वो उन्हीं महाचेतना के अंश का जनसाधारण पर कृपा मात्र है. उस अवस्था से निकल कर ही मानव जगत कल्याण हेतु नीति संदेश सहज ही स्वयं के जीवनचर्या के गंभीरतम अभ्यास से निकलता है. अभ्यासेन तु कौन्तेय, कहा भी गया है.

जय भारत, जय सनातन

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY