गुलज़ार जन्मोत्सव : मेरे हसीन क़ातिल, मैं तेरा नाम लूंगा

गुलज़ार पर क्या लिखे. वो जो हर्फ़ों को गेंद बनाकर अहसासों से खेलता हो, उस पर मेरे सा मामूली क़लमनवीस भला क्या लिख पाएगा. वो जो सिगरेट की डिब्बी और बालों की सफ़ेदी पर जैसा दिलकश कह जाता है, दिल में क्यों उतर जाता है. वो धन्नो की आंखों में चाँद का सुरमा ढूंढ लाता है तो कभी अल्फाजों की नाव लेकर दरिया में बह जाता है. उसके लिए तारे जमीं पर चलते हैं और आकाश जमीं हो जाता है.

‘मुझे प्यार तुमसे नहीं है, नहीं है
मगर मैंने ये राज़ अब तक न जाना
के क्यों प्यारी लगती हैं बातें तुम्हारी
मैं क्यों तुमसे मिलने का ढूँढू बहाना’

वो बचपन में मिला था, ‘बचपन के अहसास’ लिखते हुए. धानी सी दीदी सुनकर सोचा था कि ऐनक के पार झांकती उन आंखों में कितनी चमक उभरी होगी ऐसे ‘बचकाने गाने’ लिखते वक्त. ‘बचकाने गुलज़ार’ को मैं अपने सबसे ज्यादा क़रीब पाता हूं. याद है मुझे जब ‘चड्डी पहनकर फूल खिला था’ तो कैसे ये ‘सांग ऑफ़ नेशन’ बन गया था. तब भी यही सोचा था ये शख्स कितनी खूबसूरती से बचपन लिख देता है.

‘एक परिंदा हाय शर्मिंदा था वो नंगा
इससे तो अंडे के अंदर, था वो चंगा’

एक बार जब पंचम ने कहा ‘ये क्या गाना बनाया है, किसी अख़बार की खबर लगता है’. ये कहकर पंचम हमेशा की तरह बाथरूम में जाकर बैठ गया. कमरे में तनाव पसर गया था. तभी आशा भोंसले ने कागज़ उठाया और गुनगुनाना शुरू कर दिया. ये सुनकर पंचम लगभग चिल्लाता हुआ बाहर आया ‘कंटीन्यू आशा, आ रहा है’. फिर बिना कुछ फेरबदल उस ‘खबर’ को गाना बनाया गया. आज भी दिल में हूम-हूम करता है जब भी सुनता हूँ ‘मेरा कुछ सामान, तुम्हारे पास पड़ा है’.

‘एक अकेली छतरी में जब आधे-आधे भीग रहे थे
आधे सूखे, आधे गीले, सूखा तो मैं ले आई थी
भीगा मन शायद बिस्तर के पास पड़ा हो’

उम्र बढ़ने के साथ-साथ गुलज़ार से इश्क़ भी धीमी आंच पर पकता रहा. बीते सालों में गुलज़ार के गीतों से मुलाक़ात हुई लेकिन पंचम के विदा होने के बाद जैसे उसके शब्द नए ‘बाज़ीगर’ की तलाश कर रहे थे. इस बीच हृदयनाथ मंगेशकर का स्वर्णिम स्पर्श गुलज़ार को मिला. फ़िल्म लेकिन और माया मेमसाब के गीतों ने सही मायने में 90 के दशक को और गुलज़ार किया. इससे पहले गुलज़ार के गीतों की इतनी सुंदर अदायगी पंचम ही कर पाते थे.

‘तेरी नीली आंखों के, भंवर बड़े हसीन हैं
डूब जाने दो मुझे, ये ख्वाबों की ज़मीन है’

गुलज़ार की कविता बीते कुछ साल में उदास हो गई थी. उसे ऐसी मौसिकी की तलाश थी जो उसकी रंगत लौटा लाए. फिर एक दिन कानों ने सुना ‘आंखे भी कमाल करती हैं, पर्सनल से सवाल करती है’. किस खूबसूरती से एक अंग्रेजी शब्द को वो शायरी का मिज़ाज़ बना देता है. शंकर महादेवन का साथ पाकर गुलज़ार की कविता फिर महकने लगी थी.

ओ ज़रा रस्ता तो दो
थोड़ा सा बादल चखना है
बड़ा-बड़ा कोयले से
नाम फ़लक पर लिखना है

और आखिर में

गुलज़ार दिल होते हैं, जब तुम्हे सुनते हैं
सुना है तुम्हारे हाथ, इश्क़ लिखते हैं.

जन्मदिवस की शुभकामनाएं गुलज़ार

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