क्योंकि हम अच्छे से जानती हैं हमारी पीठ हमने खुद थपथपाई है

हम, जिसमें मेरी जैसी बहुत सी लड़कियां शामिल हैं समान्य घरों से आती हैं, बहुत हद तक आम ही होती हैं. क्योंकि हमारे व्यक्तित्व में जो ख़ास है वो हम दिखा ही नहीं पाती. या यूँ कहिये वो दिखाने के हमें भरपूर मौके नहीं मिलते.

हम ऐसे घरों से हैं जहाँ हम बहुत कुछ करना चाहती हैं पर जैसे ही सबके सामने बोलने का मौका आता है तब या तो हमारे चेहरे की भाव भंगिमाओं के साथ आवाज में थरथराहट आ जाती है या हमें दूसरों के हँसने का डर सताने लगता है. वो डर कहाँ से आया, क्यों आया? इसलिए आया क्योंकि हमें पता है हमारी पीठ थपथपाने वाला पीछे कोई नहीं है. कोई नहीं कहता, ‘अरे तू कर गलती. गलती करने वाले ही सीखते हैं.’

हम ऐसे घरों से आती हैं जहाँ आज भी मेहमान आ जाए तो रोटी के साथ शक़्कर घी में भिगो कर देना आम है. अगर वो बच गयी तो भाई को दी जा सकती है. हम ऐसे घरों से आती हैं जहाँ दूध का बड़ा गिलास भाई को देना जरुरी है. हमारे लिए इस तरह के प्रोटोकॉल नहीं होते.

हम ऐसे घरों से आती हैं जहाँ कॉलेज जाते वक़्त मम्मी के कपड़ों के खानों में गिनती के चार सूट हमारे भी होते हैं. वो सूट साल बाद भी चार ही रहते हैं. हम ऐसे घरों से आती हैं जहाँ बारवीं होते ही हमारे रिश्ते वाले घर आ जाते हैं या माँ-बाप नजर दौड़ाने लगते हैं. हम ऐसे घरों से आती हैं जहाँ रोटी खाते वक़्त हमें चार बार उठाया जा सकता है. जहाँ हम ज्यादा से ज्यादा घर-घर खेल सकती हैं.

जहाँ आज भी बेटी को जेबीटी, बी. एड करवाना उच्चतम शिक्षा के प्रतीक माने जाते हैं. जहाँ आठवीं से ही गर्मी की छुट्टियों में हम आर्ट एंड क्राफ्ट, सिलाई -बुनाई -कढ़ाई, किरोशिये में माहिर होने की कोशिश करने लग जाती हैं. जो हमें भावी ससुराल के लिए ट्रंक में सहेजना होता है. जहाँ हमारी माँओं पर कभी भी किसी भी समय हमारे पिता अपने ही किसी गुस्से को थप्पड़ से उतार कर ही शांत रह पाते हैं. जहाँ हमें सिखाया जाता है कि मम्मी के माथे पर पड़े नील की वजह मात्र फिसलना था. क्योंकि आखिर में पास पड़ोस की आंटियां भाइयों की बजाय हम से बात-बातों में ये पूछ सकती हैं.

जहाँ चार बजे सरकारी बसों में धक्के खा कर जब हम घर पहुंचती हैं चाय के झूठे कासँन(बर्तन) हमारा इंतजार करते मिलते हैं. घर में पोछा-बुहारी-धुलाई सब कामों में हम पारंगत होती हैं सिवाय खुद को शब्दों में बता सकने के.

पर जब हम घर से बाहर निकलना शुरू करती हैं तो हम उस से पहले बहुत बार घबराती हैं, कापंती हैं, गलतियाँ करती हैं, हमारे अंदर के भावों को अच्छे से किसी को बता नहीं पाती, पब्लिक डीलिंग में थोड़ा सा शर्माती हैं. पर जब एक बार हम कोई मुकाम बना लेती हैं ना तो सबसे ज्यादा गर्व और ख़ुशी हमें ही होती है. क्योंकि हम अच्छे से जानती हैं हमारी पीठ हमने खुद थपथपाई है. हम जहाँ से निकल कर आयी हैं वहां से निकल कर खुद को सशक्त बनाना ही असली मायनों में सशक्तिकरण है.

– मोनिका भारद्वाज

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY