सुभाष को सीमित करने, गांधी ने डाली थी बंगाल कांग्रेस में फूट

जवाहर लाल नेहरू ने हमेशा गांधी को बापू कह कर संबोधित किया और सुभाष चन्द्र बोस ने महात्मा कहकर. दोनों ने ही गांधी को आज़ादी की लड़ाई का सबसे बड़ा लीडर माना और उनके नेतृत्व में कांग्रेस में रहकर अपना योगदान दिया. नेहरू और बोस दोनों ही गांधी की नीतियों के धुर विरोधी रहे. नेहरू जी ने अपना असंतोष हमेशा गांधी को पत्र लिख कर प्रकट किया और बोस बाबू ने खुलेआम उनकी आलोचना की.

गांधी के आशीर्वाद और इच्छा से नेहरू कांग्रेस और भारत के सर्वोच्च पद तक पहुंचे. गांधी ने 1941 में नेहरू को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया. लेकिन सुभाष बाबू के साथ गांधी ने क्या किया?

1925 में चितरंजन दास जोकि सुभाष बाबू के मेंटर, राजनैतिक गुरु थे, की मृत्यु के बाद गांधी ने बंगाल कांग्रेस का अध्यक्ष और कलकत्ता का मेयर जेएम सेनगुप्ता को बनाया. सेनगुप्ता साहब चटगाँव के थे, कलकत्ता के लिए आउट साइडर थे. तब तक बंगाल का भारतीय राजनीति में बहुत बड़ा प्रभाव था.

सीआर दास, मोतीलाल नेहरू के साथ मिलकर स्वराज पार्टी के द्वारा चुनाव में लड़कर जीत हासिल कर चुके थे. सीआर दास ने कभी गांधी के वर्चस्व को स्वीकार नहीं किया. बंगाल के दखल को न्यूनतम करने के लिए गांधी ने वही किया जो आज की एक राजनैतिक पार्टी करती है. उन्होने बंगाल कांग्रेस में फूट डाल दी.

सेनगुप्ता को किसी ने स्वीकार नहीं किया. न सुभाष बाबू ने, न डॉ बी सी रॉय ने जो बंगाल के पहले सीएम बने. सुभाष बाबू तब बंगाल के सबसे बड़े लीडर थे. गांधी के इस कदम ने उन्हें बंगाल तक ही सीमित कर दिया.

इसका नतीजा ये हुआ कि जब गांधी ने असहयोग आंदोलन चलाया तो बंगाल में दो असहयोग आंदोलन कमेटी थी. कांग्रेस के बैनर तले दो प्रदर्शन होते थे. इस फूट के चलते बोस बाबू 1928 में कलकत्ता के मेयर का चुनाव भी हारे.

1930 में सुभाष बाबू ने गांधी-इरविन पैकट और दिल्ली मैनिफेस्टो की तीखी आलोचना की जिसमें स्वराज की जगह डोमिनियन स्टेटस को मान्यता दी गयी थी. इसके नतीजे में जब लाहौर अधिवेशन हुआ तब सुभाष बाबू कांग्रेस वर्किंग कमेटी की सदस्यता से निकाल दिये गए थे.

1939 में जब सुभाष बाबू कांग्रेस के दोबारा प्रेसिडेंट बने (गांधी की असहमति के बावजूद) तब कम्युनिस्ट लीडर एमएन रॉय ने सुभाष बाबू से कहा था कि गांधी जी तुम्हारे साथ वही करेंगे जो उन्होने अंग्रेज़ो के साथ किया “असहयोग”.

सुभाष बाबू अपनी कैबिनेट नहीं बना पाये. वो वर्किंग कमेटी नहीं बना पाये. गांधी ने उनके साथ सविनय असहयोग किया. अंत में सुभाष बाबू ने इस्तीफा दिया. राजनीति पहले भी थी. गांधी संत होंगे, महात्मा होंगे, लेकिन वो एक कुशल राजनीतिज्ञ भी थे.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY