फिर घोषित हो चुका ‘डिलिवेरेन्स डे’, क्या इस बार ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के लिए तैयार हैं हम

आप लोगों ने यह तो अक्सर पढ़ा होगा कि इतिहास अपने आपको दोहराता है और यह सही भी है, लेकिन परिणाम वही होंगे, ये ज़रूरी नहीं है. यह परिणाम बदल जाते है क्यूंकि जब इतिहास को दुहराने की कोशिश की जाती है, तो आदमी यह भूल जाता है कि काल गतिमान है और उसके साथ सत्य व मानसिकता दोनों ही बदल जाते है.

आज से 78 वर्ष पहले 2 दिसंबर 1939 को मुस्लिम लीग के मोहम्मद अली जिन्नाह ने, 22 दिसंबर 1939 को ‘डिलेवेरेन्स डे’ (मुक्ति दिवस) के रूप में मनाने की घोषणा की थी. यह घोषणा, ब्रिटिश सरकार द्वारा द्वितीय विश्वयुद्ध में भारत की भागीदारी एक तरफा तय किये जाने से नाराज़, कांग्रेस की ब्रिटिश सरकार से हुयी वार्ता के असफल हो जाने पर, और इसके विरोधस्वरूप, कांग्रेस जिन राज्यों में सत्ता में है, वहां सरकार से इस्तीफा देकर आंदोलन करने के फैसले के कारण की थी.

मुस्लिम लीग ने कांग्रेस के सरकारों से इस्तीफे देने की खुशी में व ब्रिटिश सरकार के समर्थन में 22 दिसंबर 1939 को ‘डिलेवेरेन्स डे’, एक जश्न के रूप में मनाया था.

गांधी-नेहरू ने बड़ी कोशिश की थी कि, जिन्नाह ऐसा कुछ न करे, जिससे भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई कमज़ोर पड़ जाये लेकिन जिन्नाह को तो उन ख्वाबों से कोई मतलब नहीं था जो गांधी और कांग्रेस, अपनी आँखे और विवेक दोनों बंद कर के देख रहे थे. भारत में उस दिन, भारत में रहने वाले मुसलमानों और भारत के भारतीयों के बीच अभेद्य लकीर खिंच गयी थी.

यहां सब में महत्वपूर्ण बात यह है कि हालाँकि डिलेवेरेन्स डे का आह्वान मुस्लिम लीग का था, लेकिन उसके समर्थन में, आज ही की तरह, कुछ हिन्दू भी जिन्नाह के साथ खड़े थे. ये हिन्दू, उस वक्त की राजनैतिक रोटी सेंकने के लिए जिन्नाह का समर्थन कर रहे थे.

इसी के ही परिणाम स्वरूप, 71 वर्ष पहले, 16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग ने, पाकिस्तान बनाने की अपनी मांग को मनवाने के लिये, ब्रिटिश सरकार व हिंदुओं पर दबाव बनाने के लिए, “डायरेक्ट एक्शन डे” मनाने कि घोषणा की थी.

उस दिन मुस्लिमों द्वारा, राजनैतिक प्रश्रय में हिंदुओं पर सार्वजनिक हिंसा के प्रहार की शुरुआत हुयी थी. कलकत्ता से शुरू हुआ वह भयावह दंगा पूरे देश में फैला था. यह हिन्दू जनसमुदाय पर एक सोचा समझा आक्रमण था, जिसे मुस्लिम लीग ने एक राजनैतिक निर्णय के रूप में सामने रक्खा था.

मुस्लिम लीग द्वारा 2 दिसम्बर 1939 को घोषित ‘डिलेवेरेन्स डे’ से लेकर 16 अगस्त 1946 को घोषित ‘डायरेक्ट एक्शन’ तक पहुंचने में सिर्फ साढ़े छ: वर्ष लगे थे. इस पूरे वक्फे में गांधी-नेहरू की कांग्रेस बिल्कुल भी यह स्वीकार नहीं कर पायी थी कि ऐसा हो सकता है और इसके साथ न ही भारत की शेष जनता को इसके लिये तैयार होने दिया था.

मेरा मानना है आज के भारत में, एक बार फिर, एक वर्ग ने 30 जुलाई 2015 को ही, एक आतंकवादी याकूब मेनन को सार्वजनिक समर्थन देकर ‘डिलिवेरेन्स डे’ की घोषणा पहले ही कर दी है.

उस दिन से आज तक यह वर्ग, लोकतंत्र, मानवतावाद, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कश्मीर के आतंकवादियों, अलगावादियों, देश के विभिन्न इलाकों के माओवादियों, कट्टर इस्लामिक राजनेताओं व मौलानाओं, भारत के उद्देश्यों के विरुद्ध, पाकिस्तान व चीन के हितों का समर्थन दे कर, भारत को भविष्य के ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ की तरफ लिये जा रहा है.

1939 का जो ‘डिलिवेरेन्स डे’ था, वह मुस्लिम लीग का था और पूरी तरह इस्लाम पर आधारित था लेकिन उसको कुछ हिंदुओं का भी समर्थन था. वहीं आज का यह ‘डिलिवेरेन्स डे’ सेक्युलर हिंदुओं का है जिसे कट्टर इस्लाम का समर्थन है. यहां यह ध्यान रखना होगा कि 1939 में इस्लाम के साथ जो हिन्दू खड़े थे वे इतने अदूरदर्शी थे कि उन्हें इसका आभास ही नहीं था कि जिनका वह आज समर्थन कर रहे है वही 6 वर्ष बाद शेष हिंदुओं के साथ, उनकी ही गर्दन काटेंगे.

अब आते है कि क्या वाकई ऐसा होगा? क्या फिर कटेंगे? क्या फिर बंटवारा होगा? क्या वाकई ऐसा होगा?

मैं समझता हूं कि इतिहास अपने को अवश्य दोहराता है इसलिये भारत में एक बार फिर ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ की संभावना पूरी है. पहले भारत के पास जिन्नाह थे, सुहरावर्दी थे, लियाकत खान थे और आज हमारे पास अब्दुल्ला है, हुर्रियत है, सोनिया गांधी की कांग्रेस है, ममता है, ओवैसी है, वामपंथी हैं, शहरी नक्सली बुद्धिजीवी हैं जो किसी भी हद तक जायेंगे.

पहले जिन्नाह को मनाने की गांधी और नेहरू ने भरपूर कोशिश की थी लेकिन इस बार मौन है. आज मौन किसी को मनाने का प्रयास नहीं कर रहा है. पहले उससे निपटने की न मानसिकता थी और न उस वक्त के नेतृत्व को यह मानसिकता स्वीकार थी लेकिन आज मानसिकता है.

क्या फिर कटेंगे?

मुझे यह स्पष्ट रूप से होता दिख रहा है लेकिन कटना एक तरफा नहीं होगा. हां यह जरूर है कि इस बार भी हिन्दू ही ज्यादा कटेगा क्योंकि इस बार का ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ साम्प्रदायिक नहीं होगा. यह धर्म आधारित न हो कर विचारधारा आधारित होगा.

यह सेक्युलर भेड़ों के झुंड व उसमें भेड़ की खाल पहने कट्टर इस्लामियों और राष्ट्रवादियों के बीच होगा. इसके होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि भारत के हिंदुओं का एक वर्ग अहिंसा की नपुंसकता और अपराधबोध से स्वतंत्र हो चुका है. मुझे नहीं लगता है कि गांधी और कांग्रेस की गलतियां अब होंगी. 1946 में भारत की ब्रिटिश सरकार का मुस्लिम लीग को समर्थन था और उसके पक्ष में खड़ी थी और लेकिन इस बार पक्षपात का रास्ता बंद है.

क्या फिर बंटवारा होगा?

यह भी होना तय है, लेकिन यह बंटवारा, इस्लाम के नाम पर भारत से अलग हुये हिस्से का होगा. मैं इस लेख को आज फिर इसलिये लिख रहा हूँ, ताकि आप मानसिक रूप से भविष्य के लिये तैयार रहे और सिर्फ धर्म के आधार पर अपने शत्रु को पहचानने में भूल नहीं करें.

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