डाकिया डाक लाया : क्योंकि दुनिया का सत्य सधे कदमों से आ रहा है मेरी ही ओर

सुनो,
मन रंगना..

ये ह्रदय न जाने कितने सुनहरी धवल और स्याह स्मृतियों का तलघर है. कहते हैं आदत नहीं बनाना चाहिए किसी को. सच इन्तहा हो ता है ये इंतज़ार भी न, खिली मुस्कानों के साथ अक्सर मेरे दिल के द्वार पर एक दस्तक ही तो है.

अरुणोदय से शाम के सुहनरी डूबती गंगा का रात को मुग्ध लहरों में, आंखों से प्रीत का इशारा भी न जाने कितनी ही बात बदलता है. तुम और मैं नदी किनारे विचरते क्या है? अपनी क्षणिक उपस्तिथि अपने अर्थ ढूंढती है, कितने तरुवर की परछाई हमारी न्यौछावर लेती रही हूं, कहते गए किनारे किनारे रज कण पर अपनी हर पहचान बनाते. कितने ही बार एक स्नेहिल स्पर्श स्मित पुष्प खिलाती रही मन में.

अंधेरे में छिपती उजालों में बढ़ती हमारी प्रेम कथा चाह कर भी सिर्फ परछाइयों में सिमटती रही. दूर से ही दिखती है सुबह नदी की भाप, तुम्हारी खूशबू में छू गयी न जाने कितनी ही बार. कोहरे में छिपा चाँद पूनम का हो न हो, तुम अवश्य होते हो इस गहरे फाग के कुहासे की सांसो में.

टीस मेरी पीठ पर है, तुम देख तो लो, कहीं कोई मुझे पीछे से तो नहीं देखता. तुम कितना सतर्क हो जाते हो न चाय की चुस्कियों में सर्दी का चश्मे को पूरा का पूरा एक तह में छिपा लेना तुम्हारी आँखों को. जमती हथेलियोंमें एक गुनगुनी मुस्कान को शरारत से छुपाने में सफल हो जाते हो.

कितनी सुंदर है न हमारी कहानी, नदी के किनारे ही तो प्रारम्भ हुई थी, अमावस्या की रात्रि, और एक दूरी में इतनी समीपता, सुनो, तुम अपनी इस तरलता को बनाये रखना, मुस्कान बन खिलते रहना, स्मृतियों को पार करने की चेष्टा में स्वयं को भूलते मन मस्तिष्क में इस नाशक को प्रवेशित न करना, क्योंकि कृत्रिमता की परतों की तह में तुम्हारे वास्तविक स्पर्श की सुमधुर ध्वनियों को मेरे भीतर आत्मसात करने के लिए इस जग के सत्य को स्वीकार करने का साहस मुझमें अभी भी नहीं है.

बस ह्रदय तुम मुझे मेरा स्थान दे देना पूरे कपाट खोल कर क्योंकि दुनिया का सत्य सधे कदमों से आ रहा है मेरी ही ओर…
सुनो, मनरंगना..

– अनामिका

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