आप उनके सामने बिछ भी जाइयेगा तब भी वो आपको कुछ नहीं देने वाले

आज से कई सौ साल पहले मध्य-पूर्व के एक शहर में एक नया मज़हब आया तो कुछ लोग इस नए मज़हब की तरफ आकर्षित हुए. धीरे-धीरे हुआ यूं कि किसी घर में बाप मूर्तिपूजक था तो बेटा नये मज़हब में चला गया और कहीं बेटा मूर्तिपूजक था तो बाप नये मज़हब वाला बन गया. इसी तरह किसी घर में पति नये मज़हब में तो पत्नी मूर्तिपूजक, तो कहीं पति मूर्तिपूजक तो पत्नी नये मज़हब में. यानि वो पूरा शहर नए और पुराने दीन के बीच विभाजित हो रहा था, परिवार टूट रहे थे और लोगों के बीच का संघर्ष बढ़ता ही जा रहा था.

जिन लोगों ने इस शहर को आबाद किया था उन्हें अपने शहर का यूं टूटना और वहां के लोगों का आपस में संघर्षरत होना अच्छा नहीं लग रहा था और वो चाहते थे कि उनके शहर में अमन बना रहे इसलिए ऐसे लोगों का एक समूह, एक नेता के नेतृत्व में नये मज़हब के प्रवर्तक के चाचा से मिलने पहुँचा और जाकर उनसे कहा कि देखें, आप हमारे शहर के सबसे प्रतिष्ठित बुजुर्ग हैं और इस शहर को खड़ा करने में आपका बड़ा योगदान है पर आपके भतीजे के कारण आज हमारा प्यारा शहर संघर्ष का अड्डा बन गया है, घर और परिवार टूट रहे हैं.

चाचा ने पूछा, पर इसमें मेरे भतीजे का क्या कसूर? जवाब में प्रतिनिधिमंडल के नेताओं ने कहा कि आपके भतीजे ने एक नया दीन निकाला है. वो हमारे आराध्यों को भला-बुरा कहता है, हमारे पूर्वजों का मज़ाक बनाता है और कहता है कि ये सारी मूर्तियाँ जिन्हें तुम पूजते हो बेकार और निर्बल है. उसके बहकाने के कारण आज भाई-भाई से नफरत कर रहा है, माँ-बेटे जुदा हो रहे हैं, बाप और बेटा आपस में संघर्षरत हैं. इसलिए आप अपने भतीजे को समझाएं कि वो अपनी नये मज़हब वाली ज़िद छोड़ दे और अपने बाप-दादों के दीन पर लौट आयें.

चाचा ने कहा, ठीक है मैं अपने भतीजे से इस बारे में बात करता हूँ. वो अपने भतीजे के पास गए और कहा कि देखो भतीजे! आज हमारी कौम के सरदार हमारे पास आये थे और वो चाहते हैं कि तुम इस नए दीन की तबलीग छोड़ दो. नये मज़हब के प्रवर्तक ने अपने चाचा से स्पष्ट कह दिए कि ये संभव नहीं है.

चाचा वापस प्रतिनिधिमंडल के पास गए और उसे बता दिया कि मेरा भतीजा अपने नए दीन की तबलीग करना नहीं छोड़ेगा. अपने शहर की बेहतरी की चिंता करने वाले प्रतिनिधिमंडल के वो नेता अपने शहर के कुछ और सरदारों को लेकर नये मज़हब के प्रवर्तक के पास पहुँचे और उनसे कहा, देखिये अगर आप चाहते हो कि आपको इस शहर की सरदारी मिल जाए तो हम देने के लिए तैयार है. इस ऑफर को ठुकरा दिया गया.

फिर जब प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों को लगा कि वो नये की दावत छोड़ने वाले नहीं तो वो एक नए प्रस्ताव के साथ फिर से उनके पास गए और कहा कि आप एक रब की ओर लोगों को बुलाना नहीं छोड़ सकते तो हम एक समझौता करते हैं जिससे अपने शहर में अमन बना रहे. हम ऐसा करते हैं कि एक दिन हम लोग आपके रब की इबादत करेंगे और एक दिन आप हमारे पूर्वजों के तरीके पर इबादत करिए. इस समझौता प्रस्ताव को ठुकरा दिया. गया.

फिर वहां के सरदारों ने एक नया प्रस्ताव देते हुए कहा कि आप इस बराबरी वाले समझौते पर राजी नहीं हैं तो हम ही थोड़ा झुकते हैं और ऐसा करतें हैं कि महीने के 29 दिन हम आपके रब की इबादत करेंगे और एक दिन आप हमारे बुतों की इबादत करिए. इस समझौता प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया गया.

प्रतिनिधिमण्डल के सदस्यों ने जब देखा कि वो इस पर भी सहमत नहीं है तो वो एक और प्रस्ताव के साथ सामने आये और कहा कि देखिये अगर आप पिछले समझौता प्रस्ताव से भी सहमत नहीं है तो यूं करते हैं कि साल में सिर्फ एक दिन आप हमारे बुतों की इबादत कीजिये और बाकी दिन हम आपके रब की इबादत करेंगे. इस आखिरी प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया गया.

उस शहर के सरदार जिस शांति प्रस्ताव के साथ नये मज़हब के प्रवर्तक के पास गए थे वैसा शांति प्रस्ताव तो मानव इतिहास में शायद ही कभी किसी ने किसी के सामने रखा होगा. अमूमन कोई भी समझौता बराबरी का होता है पर वहां के प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों की तरफ से रखा गया ये शांति प्रस्ताव तो ऐसा था जिसमें शहर के सरदार खुद को कमतर मानते हुए इतना तक झुक गए थे कि वो साल के सिर्फ एक दिन को छोड़कर बाकी सारे दिन अपने दुश्मन के तरीके के अनुपालन को तैयार थे और अपने तरीके के अनुपालन करने का आग्रह सिर्फ साल में एक दिन रखा था. परंतु उनके इस शांति-प्रस्ताव को भी बेदर्दी से खारिज कर दिया गया.

उपरोक्त पूरा प्रसंग दर्ज़ इतिहास है, नाम का उल्लेख नहीं किया है, जो समझदार हैं वो समझ लेंगे.

आप कश्मीरियों को गले लगाने की बात करते हैं, उनको पैकेज देकर खुश करने की कोशिश करते हैं, बाढ़-राहत के नाम पर खजाने का मुंह खोल देते हैं, यूपीएससी की परीक्षाओं में उन्हें आगे लेकर आते हैं.

अच्छी बात है, करते रहिये, पर वो जिस मानसिकता के हैं – ‘आप उनके सामने बिछ भी जाइयेगा तब भी वो आपको कुछ नहीं देने वाले, न ही आपके लिये थोड़ा भी झुकने वाले हैं और न आपकी किसी एक शर्त को भी मानने वाले हैं’.

अफ़सोस है आपने अब तक उस मानसिकता को समझा ही नहीं जो अतीत से आज तक सिर्फ एकतरफ़ा अपना हित ही देखती आई है. हाँ, खुद को भ्रम में रखने की कोशिश है तो हम भी ताली बजा देते हैं और आपके नाम का जयकारा लगा देते हैं… हर हर…

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