RIN Mutiny 1946 : कांग्रेस और लीग के सत्ता-लोभ से विफल हुआ नौसैनिकों का विद्रोह

18 फरवरी, 1946 को बंबई में रॉयल इंडियन नेवी के एचएमएस तलवार युद्धपोत पर कार्यरत कर्मियों जिन्हें रेटिंग कहा जाता था (नॉन कमीशंड अफसर एवं कर्मी) ने खराब खाने, अंग्रेज अधिकारियों द्वारा दुर्व्यवहार, कठिन कार्य परिस्थितियों के खिलाफ हड़ताल कर दी. ये हड़ताल शांतिपूर्ण थी.

द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो चुका था, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आईएनए के जवानों के खिलाफ दिल्ली में मुक़दमा चल रहा था जिसने पूरे देश और नौसैनिकों को भी अपनी गिरफ्त में लिया हुआ था. ये नौसैनिक ब्रिटिश सेना के साथ वर्ल्ड वॉर में कंधे से कंधा मिला कर लड़ चुके थे. पूरे देश में अंग्रेज़ो के खिलाफ माहौल था, फिर ये सैनिक भी कैसे इससे अछूते रह सकते थे. इस हड़ताल का नेतृत्व 2 नौजवान कर रहे थे, एम एस खान और मदन सिंह. दोनों की उम्र 25 साल से भी कम थी.

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आरंभ में ये एक हड़ताल ही थी. रेटिंग्स (नेवी के जवान) की हड़ताल करने वाली कमेटी ने कुछ जवानों को बंबई की जनता को इस हड़ताल के बारे में बताने और उनका समर्थन पाने के लिए भेजा. उन सैनिकों ने बैरकों से जवानों को लाने ले जाने वाली लारियों पर कब्जा किया और उन लारियों को लेकर पूरे बंबई में घूमना शुरू किया. जनता ने उनका अभूतपूर्व स्वागत किया और अनाज एवं अन्य सामान से उनकी मदद की. देखते ही देखते माहौल अंग्रेज़ो के खिलाफ हो गया. जगह-जगह ब्रिटेन का झण्डा जलाया जाने लगा.

अगले दिन ये विद्रोह कराची और कलकत्ता में भी फैल गया. बंबई में भारतीय पुलिस के जवानों ने, आर्मी ने और यहाँ तक की एयर फोर्स के भारतीय जवानों ने भी नेवी रेटिंग्स के समर्थन में हड़ताल की. मजदूरों ने भी काम करने से मना कर दिया. अंग्रेज़ी शासन हिल उठा और तत्कालीन ब्रिटिश पीएम, सेना के कमांडर इन चीफ गोडफ्रे ने इस हड़ताल को सख्ती से कुचलने का ऐलान किया और हड़ताली जवानों को चेतावनी जारी की.

तलवार युद्धपोत पर रेटिंग्स ने अंग्रेजी झंडे को उतार कर कांग्रेस, मुस्लिम लीग और लाल झण्डा लगा दिया. सभी अंग्रेज और उनके समर्थक भारतीय अफसरों को पोत से उतार दिया गया और पोत को अपने अधिकार में ले लिया. इसी तरह कराची में हिंदुस्तान युद्धपोत, चमक युद्धपोत को भारतीय नौसैनिकों ने अपने कब्जे में ले लिया. एक हड़ताल देखते-देखते विद्रोह में बदल गयी.

20 फरवरी को अंग्रेज़ो ने इस विद्रोह को कुचलने के लिए अपने सैनिक भेजे. भारतीय सैनिकों ने अपने ही देशवासियों पर गोली चलाने से इंकार कर दिया. भारतीय पायलटों ने प्लेन उड़ाने से मना कर दिया. चिंगारी आग में बदल रही थी. देश भर में अनेक बैरकों में विद्रोह फैल चुका था. 74 पोतों पर रेटिंग्स ने हड़ताल कर दी थी. सिर्फ 10 पोत इस हड़ताल से अछूते बचे थे.

अगले दिन 21 फरवरी को अंग्रेज़ो ने पूरी शक्ति से इस विद्रोह को कुचलने की शुरुआत की. कराची में इन पोतों को अपने कब्जे में लेने के लिए इन पर हमला किया गया. गोलीबारी में दोनों पक्षों की तरफ से अनेक सैनिक मारे गए, लेकिन अंत में अंग्रेज़ो ने बहादुर, चमक और अन्य पोतों पर कब्जा कर लिया. बंबई में भी जनता और सैनिकों के ऊपर क्रूरतापूर्वक हमले किए गए. सरकारी अनुमान 14 सैनिकों की मौत की पुष्टि करते हैं लेकिन अन्य अनुमान इस संख्या को 250 से ऊपर बताते हैं.

अगले दो दिनों में इस विद्रोह पर पूरी तरह से काबू पा लिया गया. ये एक ऐसा विद्रोह था जिसने पूरी अंग्रेजी हुकूमत को हिला दिया. विद्रोह अकस्मात था, युवाओं के द्वारा किया गया था जिनकी उम्र 18 से 25 साल तक थी. ब्रिटिश सरकार द्वारा इसे सख्ती के साथ कुचल दिया गया.

जैसा हमें ज्ञात है कि 1947 में हम आज़ाद हुए और उस समय कांग्रेस और मुस्लिम लीग ब्रिटिश सरकार के साथ सत्ता हस्तांतरण के ऊपर बातचीत कर रहे थे. ऐसे समय हुआ विद्रोह कांग्रेस और लीग के उद्देश्यों पर पानी फेर सकता था. और इसी डर के चलते इन सैनिकों को इनका कोई समर्थन नहीं मिला.

गांधी, पटेल, जिन्ना सभी ने खुलेआम इनकी आलोचना की और इनका साथ देने से इंकार कर दिया. बिना किसी योग्य नेतृत्व के ये विद्रोह आगे नहीं बढ़ सका और जल्द ही सारे विद्रोही मार दिये गए या गिरफ्तार कर लिए गए.

कराची में, मनोर आइलैंड पर विद्रोह ताकत से कुचल दिया गया. बंबई में रेटिंग्स ने समर्पण करने के लिए मांग की कि वो अंग्रेज़ सरकार के आगे नहीं नेशनलिस्ट के सामने समर्पण करेंगे.

पटेल, गांधी ने इन युवाओं को भरोसा दिलाया कि उनके साथ गलत व्यवहार नहीं होने दिया जाएगा और वो हथियार रख दें. ये अपील वो पहले दिन से कर रहे थे. समर्पण के बाद अंग्रेज़ सरकार ने इन्हें हिरासत में ले लिया और तमाम वादों के खिलाफ इन्हे जेल में ठूंस कर तमाम जुल्म ढाये गए. इन सभी को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया.

इसके खिलाफ किसी कांग्रेसी नेता, लीग के नेता, किसी ने कोई आवाज़ नहीं उठाई. लेकिन अचरज की बात ये है कि जब भारत आज़ाद हुआ तब भी इन्हें नौकरी में वापस नहीं लिया गया क्योंकि नेहरू साहब के मुताबिक इन्होने अनुशासन तोड़ा था. वहीं ऐसे लोग जिन्होंने कभी चोरी के आरोप में भी सजा काटी थी, वो स्वतन्त्रता सेनानी होकर पेंशन पाने लगे और ये युवा बेरोजगार ही रहे.

इस विद्रोह कि खास बात ये थी कि ये विद्रोह सिर्फ आज के भारत में ही नहीं हुआ, बल्कि कराची में भी था. इसे बंबई में हिन्दू, मुस्लिम, पारसी सभी समुदायों का सहयोग मिला. इस विद्रोह ने पूरे भारत को एक कर दिया था.

कहा जाता है ये आंदोलन भारत के विभाजन को रोक सकता था. सत्ता के हक़दारो के नाम बदल सकता था. शायद यही वजह भी है कि इसे कांग्रेस और लीग दोनों ने समर्थन देने से इंकार कर दिया था.

अब मैं यहाँ गांधी के उस बयान का उल्लेख करता हूँ जो उन्होने उस समय हुई हिन्दू मुस्लिम एकता पर दिया था, “ऐसी हिन्दू मुस्लिम एकता जो हिंसा फैलाये मैं उसका विरोध करता हूँ”.

हर तरफ से आलोचना के शिकार इन युवा सैनिकों का बहुत बुरा हश्र हुआ. पटेल ने, जिन्ना ने, नेहरू ने सभी ने इनकी निंदा की. इन्हें सिर्फ और सिर्फ जनता का सहयोग समर्थन हासिल हुआ. जो वक्त के साथ धूमिल पड़ता गया.

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