ध्यान रहे जागृति लक्ष्य है, पर जागृत होती रणचंडिका जीवन का बलिदान मांगेगी

मैं सावधान कर रहा हूँ मेरे सामने बैठे भारत पुत्रों को कि जनपदों की सीमा के आधार पर भारतियों को बांटने का प्रयास मत करना! संस्कृति के सूत्र को संभलकर रखना जो मानव को मानव से जोड़ता है. क्योंकि देख रहा हूँ कि जनपदों की राजनीति मानव को मानव से तोड़ रही है. अतः राजनीति के उस उत्तरदायित्व का निर्वाह अब संस्कृति को करना होगा.

संस्कृति को ही सेतु बनाना होगा. क्योंकि संस्कृति कोई भाषा नहीं है. संस्कृति कोई जाति नहीं है. संस्कृति कोई धर्म नहीं है. भय सिर्फ यवनों की दासता का ही नहीं है पर उस सांस्कृतिक दासता का भी है जो धीरे धीरे जन्म लेगी.

पराजित राज्य तब तक पराजित नहीं होता है जब तक वह अपनी संस्कृति व् मूल्यों की रक्षा कर पाता है. पर क्या धर्म, जनपदों के आधार पर खंड खंड बंटा यह राष्ट्र आक्रंताओं से अपने संस्कृति की रक्षा कर पायेगा. यदि आक्रंताओं को इस धरती पर स्थिर होना है तो उन्हें व्यक्ति से व्यक्ति को जोड़ने वाली संस्कृति पर आक्रमण करना होगा और वो करेंगे यदि हम सावधान नहीं हुए तो.

और यदि हमने अपनी सांस्कृतिक विरासत को छोड़ा तो हमारा पतन निश्चित है. अनुभव कहता है कि पराजित मन पराजित राज्य और पराजित राष्ट्र प्रायः विजेता के संस्कृति और विरासत को स्वीकार करते हैं. इसलिए यदि शीघ्र ही इस राज्य के इस राष्ट्र की सुप्त चेतना को जागृत नहीं किया गया, इस राष्ट्र को संगठित नहीं किया गया तो इस राष्ट्र को अपने राष्ट्र को विधर्मी दासता से मुक्त करना कठिन हो जाएगा.

विद्या ही मुक्ति का मार्ग दिखलाती है और यदि वही असमर्थ है आज तो वह विद्या व्यर्थ है. जन्म, मरण से मुक्ति पाने वाले भारतीय क्या यवनों का बंधन स्वीकार करेंगे. इस राष्ट्र को यवनों से मुक्त करना है और इस राष्ट्र की मुक्ति में तुम्हारी मुक्ति है. तो इस सोये हुए समाज को जागृत करो. इस राष्ट्र में शक्ति है पर वह सुप्त है. उसे जागृत करो. उस साहस को जागृत करो जो इस समाज में है. उस सामर्थ्य को जागृत करो जो इस राष्ट्र में है.

पर ध्यान रहे स्वंत्रता का यह यज्ञ यवन का बलिदान मांगेगा, स्वार्थ का बलिदान मांगेगा और तो और जागृत होती हुई रणचंडिका जीवन का बलिदान मांगेगी पर ध्यान रहे जागृति लक्ष्य है, आक्रंताओं से मुक्ति लक्ष्य है. और इस यज्ञ की अग्नि में आक्रंताओं को समर्पित करना है. निश्चय करो कि प्रत्येक ह्रदय में मुक्ति का दीपक जलेगा और आक्रंताओं के लिए ज्वाला बनेगा!

माँ भारती आपका मार्ग प्रशस्त करें!

उतिष्ठ भारत !

– चाणक्य

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