वायु और भूमिगत प्रदूषण रोकने के लिए क्या सम्भव है ‘दाह संस्कार’ के तरीके बदलना?

अब यह पूरी तरह वैज्ञानिक आधार पर सिद्ध हो चुका है कि मनुष्य की मृत्यु के बाद ‘शव’ को ठिकाने लगाने का जो तरीका है, वह बेहद खतरनाक और विषैला होता है. व्यक्ति चाहे हिन्दू हो या मुसलमान, ईसाई हो या यहूदी या फिर पारसी, सब धर्मों में दाह संस्कार की क्रिया जो अपनाई जाती है वह सदियों पुरानी है.

हिन्दू धर्म में यह माना जाता है कि शरीर पंच तत्वों का बना होता है और मृत्युपरान्त शव को पंच तत्व में मिलाने के लिये, जलाकर राख और हड़्ड़ियों को गंगा जल में विसर्जित कर दिया जाता है. यद्यपि मेरी जानकारी में किसी वेद पुराण या धार्मिक ग्रन्थ में यह नहीं लिखा है कि मृत्यु के बाद शरीर का कैसे क्या और क्यों करना चाहिये. दाह संस्कार की प्रथा सदियों से यथावत चली आ रही है. इसमें पिण्ड़ दान, गौदान, और कपाल क्रिया आदि, जिस प्रकार “कटिया बम्मन” जैसा जैसा बताता है, या गंगा घाट पर ‘पंड़े’ जो करने को कहते हैं, हम सब आंख बन्द करके करते जा रहे हैं. महाभारत में अवश्य उल्लेख है कि पांडव अपना जीवन पूर्ण करके हिमालय पर चले गए वहां जाकर उनका क्या हश्र हुआ कोई नहीं जानता. शायद उनके शवों को चील कौए या जंगली जानवर खा गए होंगे.

मानव शव का मृत्युपरान्त उपयोग किसी के आहार के रूप में हो सके, इस हेतु पारसी लोग शव को चारों तरफ से बन्द एक कुँए में रख देते हैं. इस मौत के कुँए पर रखी लोहे की जाली पर मुर्दा रख दिया जाता है. शरीर सड़ गल जाता है. मांस लोथड़ा चील कौए गिद्ध खाने आ जाते हैं, हड्डियां नीचे कुए में गिर जाती हैं.

ईसाई और मुस्लिम समुदाय में शव को बाकायदा कब्र में गाड़ा जाता है. उसे कफन में लपेटा जाता है. अन्तर सिर्फ इतना है कि ईसाई लोग शव को लकड़ी के ताबूत में सजाकर, नए कपड़े पहनाकर इत्र लगाकर कब्र में उतारते हैं, और मैं जिन मुस्लिम भाईयों के जनाजे में शामिल हुआ, वहां कब्रिस्तान में ७ फुट लम्बा, तीन फुट चौड़ा और पांच फुट गहरा कब्र खोदा जाता है. नीचे २५-३०किलो खड़ा नमक बिछा दिया जाता है. फिर मुर्दे को कफन सहित कब्र में उतार कर तीन इन्च के लगभग मोटी तीन चार फुट लम्बी लकडियों को तिरछा इस प्रकार रख देते हैं कि लकडी का एक सिरा कब्र की दीवार पर टिका रहे और दूसरा सिरा मुर्दे की बगल में चिपका रहे. कलमा पढ़ने के बाद मौजूद सब लोग कब्र के ऊपर मिट्टी डालकर बन्द कर देते हैं

ईसाइयों के कब्रिस्तानों में एक आदमी की कब्र के ऊपर दूसरी कब्र नहीं बनती. कब्र की जमीन को खरीदना पड़ता है, फिर चाहे तो उसे पक्का करके त्योहारों पर जाकर सम्मान दिया जा सकता है. हजारों सालों से चली आ रही इस परम्परा के कारण लन्दन जैसे शहर में भी रिहायशी इलाकों को दसवां भाग कब्रिस्तानों से पटा हुआ नजर आता है. अगर आप अमेरिका के व्हाईट हाऊस को देखने जाएंगे तो उसके उत्तर पूर्व का पूरा हिस्सा युद्धों में मारे गए सैनिकों की कब्रों से अटा पड़ा है. एक बार तो आपको लगने लगेगा कि आप वाशिंगटन में नहीं किसी कब्रिस्तानों के शहर में आ गए हैं.

एक मर्तबा अपनी “पाकिस्तान” यात्रा के दौरान एक इस्लामी धर्म के एक प्रख्यात स्कालर से मैंने पूछ लिया कि ‘हम मुर्दे को कब्र में क्यों गाड़ते हैं? ‘इसी प्रकार अपनी रोम यात्रा के दौरान मैंने एक ‘बिशप’ से पूछ लिया कि “हम मुर्दों को जमीन में क्यों गाड़ते हैं?” पहले तो दोनों चौंके फिर सोचते विचारते मौलवी जी ने जवाब दिया ‘क्योंकि जब कयामत आएगी तो कब्रें फाड़कर यह मुर्दा जी उठेंगे.’ ‘बिशप’ महोदय थोड़ा चतुर थे, सोच विचार कर दूसरे दिन मुझे बुलाकर कहा “भाई क्रुसिफिकेशन के बाद ‘गुड फ्रायड़े’ के दिन “जीसस” फिर से जिन्दा हो गए थे, इसी लिये कई लोग तो चालीस दिनों तक किसी जमाने में शव को दफनाते नहीं थे.

ईजिप्ट में तो ममी बनाकर भी इसी वजह से रखते होंगे. फिर रेगिस्तानी इलाकों और बर्फीले देशों में सबसे आसान तरीका मुर्दे को जमीन में गाड़ देना ज्यादा आसान है. आपके यहाँ तो शव को नदियों में बहा देते हैं फिर आप लोग उसी सड़े पानी से नहाते हो पीते भी हो. लकड़ियों से मुर्दे को जला देते हो. हवा में कितनी गन्दगी भर देते हो. कभी चमड़ी जलती देखी, हम लोग जब गोश्त का कबाब बनाते हैं तो मांस जलने की कितनी गन्दी बदबू आती है. बिशप ने मुझे निरूत्तर तो कर दिया पर मुझे इसका कोई प्रामाणिक उत्तर आजतक नहीं मिला था कि मुर्दे को गाड़ने से क्या फायदा होता है? और जलाने के क्या क्या नुकसान हैं? बिशप ने आगे यह भी दलील दी कि अमेरिका में कुछ जगहों पर शव को डीप फ्रीजर में बाकायदा रखते हैं. उन्हें उम्मीद है १००, २०० साल बाद साइन्स इतना बढ़ जावेगा कि वह मुर्दों में जान फूंक देगा.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की ताजा रिपोर्ट और विभिन्न विश्व विद्यालयों के शोध कार्यों को जब मैंने गहराई से परखा तो अनेक चौंकाने वाले मुद्दे उजागर होने लगे. हमने और हमारे पूर्वजों ने धार्मिक अन्धता का काला चश्मा लगाकर श्मशान घाटों और कब्रिस्तानों में जो हजारों साल से प्रदूषण हो रहा है, उसे हमने यथावत चालू रखा है, कोई रद्दो बदल करने की हिम्मत नहीं की है. अगर शव के दफनाने या जलाने की प्रणाली में हम हिम्मत करके कुछ बदलाव करते तो धर्मांन्ध पंडित पुजारी, मुल्ला मौलवी, बिशप फादर हमारे कपड़े फाड़कर जिंदा चीर कर खा जाते.

वैज्ञानिकों ने शोध करके इस तथ्य के सुबूत जुटा लिए हैं कि पूरी दुनिया में मुरदों को गाड़ने या खुला कीट पंतगों या पक्षियों का आहार बनाने में एक साल में वायुमण्डल में हम लोग ६८ लाख मीट्रिक टन कार्बन डाय आक्साईड़ गैस का जहर हम हवा मे घोलते जा रहे हैं. यह वायुमण्ड़ल में घुलने वाली ‘सीओटू’ के कुल भाग का ०.०२ प्रतिशत है.

हिन्दू प्रणाली से एक शव दाह क्रिया में लगभग ३०० किलो यानि तीन क्विन्टल लकड़ी जलती है. इस तरह अकेले हिन्दुस्तान में हम लाशों को जलाने में लगभग “छ: करोड़ पेड़ों” की बलि एक साल में दे रहे हैं. लकड़ी को जलाकर शव दाह करने पर हम सिर्फ पेड़ों को ही नष्ट नहीं कर रहे, बल्कि वातावरण में धुंए से कार्बन डाय आक्साइड़ की मात्रा भी बढ़ाते जा रहे हैं. इससे पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है. एक वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक हम शवों को जलाकर ८० लाख मीट्रिक टन “कार्बनडाय आक्साइड़ गैस ” एक साल में हवा में मिला कर जहर घोल रहे हैं, जिसकी कीमत हमारी आने वाली पीढ़ियों को चुकाना पड़ेगी.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने शवों को दफनाने पर एक विस्तृत अध्ययन कराया है. ईसाइयों द्वारा कब्र में ताबूत सहित मुर्दा गाड़ने पर कब्र के आस पास की मिट्टी का जब परीक्षण किया गया तो पाया गया कि कब्रिस्तान की मिट्टी और आस पास के भूमिगत जल स्त्रोतों में दो तरह का प्रदूषण पाया गया. एक “बायो आर्गेनिक प्रदूषण” और दूसरा “मेटेलिक प्रदूषण”. बायो-आर्गेनिक प्रदूषण के कारण कब्रिस्तान की मिट्टी से मीथेन और कई दूसरी जहरीली गैसें कार्बन मोनो आक्साईड सहित अधिक मात्रा में पाई गई हैं.

फारमेलडिहाइड के अवयवों से मिश्रित अनेक रसायन भी कब्रों में से लीक होकर मिट्टी और हवा में पाये गये हैं, जो कि जन स्वास्थ के लिये खतरनाक हैं. बरसात के पानी के कब्रों में रिसने के कारण बहुत से जीव जन्तु कीटाणु इल्लियां जो शव में पड़ जाती हैं, जब भूमिगत जल को दूषित करती हैं तो पेचिस, कालरा आदि उदर संबन्धी अनेक बीमारियां कब्रिस्तान के आसपास रहने वाले लोगों में बहुतायत में पाई गई हैं. विशेषकर अफ्रीकन देशों में इसका प्रकोप अधिक है.

ग्रेट ब्रिटेन में व्यापक तौर पर कब्रिस्तानों के २६० जगहों का वैज्ञानिक परीक्षण किया गया. बीस साल के मानीटरिंग के बाद पता लगा कि कब्रों के नीचे की मिट्टी में लोहा, ताम्बा, मोलिविडियम, पीतल, जस्ता के सहित मर्क्यूरी अर्थात पारे की मात्रा सर्वाधिक पाई गई. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह धातुएं तो ताबूत के सड़ने गलने से आ सकती हैं पर पारा निश्चित ही मुर्दे के दांतों की फिलिंग से आई होगी.

इन वैज्ञानिक अध्ययन को देखते हुए अब पश्चिम के देशों में धीरे धीरे मुर्दे को ताबूत में रखकर जमीन में गाड़ने को गलत माना जाने लगा है. अमेरिका के २० राज्यों ने इसे पूरी तरह बन्द कर दिया है. अब प्रत्येक शव को बिजली से चलने वाली भट्टी में रखकर जलाना अनिवार्य कर दिया है. इसे क्रेमेरेटर कहते हैं. निजी कम्पनियों के क्रेमेरेटरों में १५०० से २००० डालर की फीस जमा करके मुर्दे को बिजली की भट्टी में जलाना कम्पलसरी कर दिया है. मुर्दे की बची हुई “हड्डियों ” को उनकी सन्तानों को दे दिया जाता है. जिसे वह कब्र के नीचे रखकर पक्की कब्र बना लेते हैं. यूरोप के देशों में भी यह प्रथा कई देशों में लागू हो गई है. नीदरलैण्ड़ इस मामले में सबसे आगे है.

अमेरिका के दूसरे अन्य प्रान्तों में आज भी ४८.५ % लोग शव को जलाकर राख और हड्डियों को कब्र में गाड़ कर रखना पसन्द करते हैं ४५.६ % लोग अपनी लाश को पारम्परिक ढ़ंग से कब्र में रखना पसन्द करते हैं. पर अब सरकार ने भूमिगत जल और मिट्टी को प्रदूषण से बचाने के लिये कड़े नियम बना दिये हैं. कब्र की गहराई उसे चारों तरफ से वाटर प्रूफिग और रिहायशी इलाके से दूर बनाया जाता है. शेष बचे लोग अपनी लाश को मेडीकल कालेजों में दान कर रहे हैं. मुर्दा को पारंपरिक तरीके से दफनाने का खर्चा लगभग चालीस लाख रूपये आ जाता है.

यही कारण है कि अब लोग शव को बिजली या प्रोपेन गैस की भट्टियों में जलाकर अस्थियों से कब्र बनाना पसन्द करते हैं. विदेशों में बसे हिन्दू लोग राख और अस्थियों को लेकर या तो खुद इलाहाबाद में आकर संगम में विसर्जित कर रहे हैं या फिर “फेड-इक्स” सर्विस के द्वारा सीधे गंगा में विसर्जन के लिए भेज देते हैं.

अब वैज्ञानिकों ने बिजली शव दाह भट्टियों से निकली वायु का परीक्षण किया तो उन्होंने वायुप्रदूषण पर गहरी चिन्ता व्यक्त की. एक शव को जलाने में जितनी बिजली या गैस की खपत होती है, उससे वह परिवार पूरे एक महिने तक अपने घर की ऊर्जा खर्च कर सकता है. फिर वायु मण्डल में बढ़ती हुई कार्बन डाइ आक्साईड तथा अन्य जहरीली गैसों का प्रदूषण बेहद खतरनाक पाया गया है. विशेषकर आरसेनिक यानि ‘संखिया’ और ‘मर्क्युरी की गैस ‘ क्रेमेटरों से बाहर निकलने की, वैज्ञानिकों को खास चिन्ता है. यही कारण है कि आदमी की मौत हो जाने के बाद मुर्दा लाश को ठिकाने लगाने के नए नए तरीके ढ़ूंढे जा रहे हैं. कुछ लोगों का अनुमान है जब अन्तरिक्ष यात्रा आसान हो जावेगी तो चन्द्रमा पर कब्रिस्तान बनाकर वहीं पर लाशों को ठिकाने लगाना उत्तम रहेगा. पर यह आज की तारीख में सम्भव नहीं है.

इस दिशा में स्काटलैण्ड़ की एक निजी कम्पनी “रेसोमेशन लिमिटेड ” ने एक नया उपकरण विकसित कर लिया है, उसका पेटेन्ट भी करा लिया है. इस मशीन में एक केपसूल में लाश को रखा जाता है, इस स्टेनलेस स्टील के खोल में लगभग ८० गैलन पानी भरा जाता है, इस पानी को १८० डिग्री सेल्सियस तक गरम करते हैं. एक लाश के लिए इसमें ८ पौण्ड़ “पोटेशियम हाइड्रोआक्साईड ” का केमीकल मिला देते हैं. फिर लाश को दो तीन घण्टे तक इस मशीन में अच्छी तरह घुमाते है. शरीर की मांस पेशियाँ चर्बी चमड़ी पूरी तरह इस ‘अलकलाइल घोल ‘ में गल जाती हैं. सिर्फ नर कंकाल, यानि साबुत हड्डियां शेष बचती हैं. इन हड्डियों को बारीक पीस कर पाऊडर बनाकर मुर्दे के रिश्तेदारों को कब्र में रखने को दे दिया जाता है.

पोटेशियम हाईड्रोआक्साईड के गर्म पानी के घोल में हड्डियों के अलावा कुछ नहीं बचता. जो द्रव शेष बचता है वह भूरे हरे रंग का चिपचिपा सा घोल होता है. इसे नगरपालिका के जल निकास में बहाकर “री साईक्लिंग” करके पीने योग्य पानी बनाकर पुन: पीने के पानी के नलों में भेज दिया जाता है. शव की “अल्कलाईन हाइड्रोलेसिस” कहलाने वाली इस शव दाह की आधुनिक तरकीब में शरीर का हर भाग अमीनो एसिड, पेपटाईड, शुगर, साल्ट के अवयवों मे टूट जाता है, जिसे फिल्टर करके अच्छे किस्म के खाद में उपयोग किया जाता है.

RESOMATION कही जाने वाली शव दाह की इस क्रिया में न कोई वायुप्रदूषण होता है न ही किसी प्रकार का भूमिगत जल प्रदूषण. फ्लोरिडा अमेरिका में इस तरह का रेसोमेटर काम करने लगा है. अमेरिका के मिनीसोटा, मेरीलेण्ड़, ओरेगॉन, कोलेरेडो और माईन राज्यों में ‘रेसोमेटर ‘ सुविधा उपलब्ध हो गई है.

नीदरलैण्ड शवों के ठिकाने लगाने की नई तरकीब खोजने के मामले में और आगे निकल गया है. यहाँ एक निजी कम्पनी ने शून्य से नीचे ऋण ३८४ डिग्री तापमान पर शव को कुछ घंटों के लिये रख देते हैं. शव का पूरा तन हड्डियों सहित एक सफेद भुरभुरे पदार्थ में बदल जाता है. इस पदार्थ को पीस कर पूरे शव का पाऊडर बन जाता है जिसमें फास्फेट कारेबोनेट रहते है, जो उत्तम खाद के रूप में काम आ जाता है. नीदर लैण्ड में ४१ फ्युनरल केन्द्र हैं २२ जगहों पर इसकी स्थापना होने जा रही है. पर यह बहुत खर्चीला है.

दुनिया चाहे कितनी भी आगे बढ़ जाए पर हम भारत में न तो परम्परागत तरीकों के शव दाह संस्कारों को छोड़ सकते हैं, और न हम ईसाई या मुसलमान सम्प्रदायों की कब्रों के साथ कोई छेड़छाड़ कर सकते हैं. हमें तो अपने पुरखों का पिण्ड़ दान ही करना है. सिर मुड़वाना है. गंगाकिनारे बैठे खानदानी पंड़ों को दान दक्षिणा देना है. घर में गमी होने पर मृत आत्मा की शान्ति के लिये “गरूण पुराण” बैठाना है. जिसमें कह गया है, मृत आत्मा को यमदूत वेतरणी नदी में खींच कर ले जा रहे हैं. यमदूत खुद तो नाव में बैठा है पर मृत आत्मा को पीप खून मांस लोथडों से भरी नदी में कौड़े मारकर घसीट कर ले जा रहा है.

अपने प्रियजन की आत्मा को वैतरणी नदी के कीडे मकौड़े जीव जन्तु मगरमच्छ नोच नोच कर खा रहे हैं, ऊपर से यमदूत के हण्टर पड़ रहे हैं. मृत आत्मा चीखती चिल्लाती दर्द से कराहती जा रही है. पर अगर आप गरूण पुराण सुनाने वाले पंड़ित को गौ दान कर दें, या स्वर्ण दान कर दें, तो यमदूत मृत आत्मा को पीप भरी नदी से बाहर निकाल कर नाव में बैठाकर यमराज के पास ले जावेगा.

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