यह है बदले हुए स्वाभिमानी भारत की तस्वीर

चीन भारत को डराता आया है, हाल के दिनों में भी बहुत डराया… इतना डराया कि यदि वर्तमान में मजबूत इच्छाशक्ति वाली निडर सरकार ना होती और धमकी के डर से इस हालिया सीमा विवाद से अपना कदम पीछे खींच लेती, तो दुनिया में एक अलग ही संदेश जाता… चीन साउथ एशिया का दादा बन जाता… और यही वह चाहता भी था.

परंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ… मोदी सरकार को यह बात पता थी कि चीन की धमकी से डरने का प्रतिकूल असर सिर्फ भारत पर ही नहीं, बल्कि दर्जनों ऐसे देशों पर भी पड़ने वाला है जो भारत की ओर इस आशा से देखते हैं कि भारत एक सशक्त राष्ट्र है… और मौका पड़ने पर भारत से सहयोग की अपेक्षा की जा सकती है… खासकर साउथ चाइना-सी विवाद में उलझे ताइवान, फिलीपींस या वियतनाम जैसे छोटे देश जिनकी संप्रभुता एवं अधिकारों का भारत वर्षों से समर्थन करता आया है.

भारत को यह भी पता था कि चीन बिना युद्ध किए ही अपनी परंपरागत गुंडई करके और आँखें दिखा कर विश्व को यह बताना चाहता था कि अब वो सेंट्रल और साउथ एशिया का बादशाह है. परंतु आज के भारत को भला चीन की बादशाहत कैसे मंजूर हो सकती थी?

चीन भारत को तौलना चाहता था, परखना चाहता था… मौजूदा सरकार की निर्णय लेने की क्षमता को आँकना चाहता था. चीन ने अब तक नेहरू के भारत को देखा था… उनके वारिसों के भारत को देखा था… वारिसों के साथी और उन सेक्यूलर जमातों के भारत को भी देखा था जिसमें गद्दार वामपंथी और देशहित को ताक पर रखने वाली पार्टियाँ थीं… परंतु अभी तक राष्ट्रवादियों के भारत को नहीं परख पाया था… सो उसने परखने का प्रयास किया परंतु अब उसे पटखनी मिलनी तय हो चुकी है.

अब चीन को पता चल गया है कि भारत बदल चुका है… आज का भारत सामरिक क्षमता में भले ही चीन से कमतर हो पर कूटनीति, विदेश नीति और आर्थिक नीति संबंधी विषयों में विश्व पटल पर चीन के साथ मुकाबला करने लायक बन चुका है.

संसद में सुषमा ने जो बातें कही थी वो सिर्फ विपक्षी दलों के लिए नहीं बल्कि चीन के लिए भी थीं कि… आज भारत का संबंध जितना अमेरिका से अच्छा है उतना ही रूस से है… जितना इज़राइल से है उतना ही फिलीस्तीन से है.

भारत की कूटनीति की सफलता को बताने के लिए यहाँ इतना लिखना ही पर्याप्त है कि आज भारत पहले वाला ‘मूक दर्शक भारत’ नहीं बल्कि अब वैश्विक दशा-दिशा तय करने वाला भारत है.

कांग्रेस की विदेश नीति पर गौर किए बिना मेरी बात अधूरी रह जाएगी.

चीन की हठधर्मिता देखें, जम्मू कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश के नागरिकों को नत्थी वीज़ा (stapled visa) देता है जिसका भारत हमेशा से विरोध करता रहा है. अरुणाचल प्रदेश को तो वह चीन का ही हिस्सा मानता रहा है.

यूपीए सरकार में मनमोहन सिंह का अरुणाचल प्रदेश का दौरा तय हुआ था… चीन ने जब विरोध जताया तो मनमोहन सिंह ने अपनी यात्रा रद्द कर दी थी.

दूसरी तरफ यदि मोदी की नीति की बात करें तो उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद सबसे पहला विदेश दौरा भूटान का ही किया था. उस भूटान का, जिस पर चीन वर्षों से दबाव बनाता रहा है कि भूटान-चीन के बीच विवादित ज़मीन (जिस पर चीन अपना दावा करता है) पर सड़क मार्ग बनाने दे.

चूँकि यह विवादित स्थल भारतीय सीमा से बहुत नजदीक है तो भारत इस पर आपत्ति करता है, इस लिहाज से भूटान भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण देश है जिसे मोदी सरकार ने पहले ही भाँप लिया था.

वैसे भी भूटान का भारत के साथ जो संधि है उसके अनुसार भूटान की विदेश या सुरक्षा नीति के मानदंडों को भारत को ही तय करना होता है, ये बातें दुनिया जानती है.

मोदी ने भूटान का दौरा तीन साल पहले उस वक्त किया था जब सब कुछ ठीक था, यानी कि मोदी भूटान के महत्व को जानते थे, वे चीन को संदेश भी देना चाहते थे कि भूटान की अस्मिता और उसकी सीमाओं की रक्षा करना भारत की पहली प्राथमिकता है.

यह बदला हुआ भारत चीन को भला कैसे रास आता?

चीन की वर्तमान परेशानी की वजह एक नहीं बल्कि और भी हैं… वो है भारत और अमेरिका के बीच की ट्यूनिंग, जो डॉनल्ड ट्रंप के आने के बाद और शार्प हुई है. राष्ट्रपति ट्रंप ने चीन के साथ अपनी परंपरागत अमेरिकी नीति में परिवर्तन किया है जिसकी खीझ वो भारत पर निकाल रहा है… क्योंकि आज अमेरिका भारत के साथ खड़ा है.

अमेरिका ने अब चीन की ‘वन चाइना पॉलिसी’ को महत्व देना कम कर दिया है, नजरअंदाज करने लगा है. जबकि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा भी इस पॉलिसी का सम्मान करते थे.

इस पॉलिसी के तहत, चीन के अलावा वैसे देश या स्वायत्तशासी इलाके जिन पर चीन का अधिकार है या फिर चीन उन पर अपना अधिकार जताता आया है, उन देशों की डिप्लोमेसी को खुद चीन ही तय करेगा, जैसे ताइवान, हांगकांग, मकाऊ या कुछ छोटे मोटे द्वीप. कोई भी अन्य देश इनसे सीधी बात नहीं करेगा… इनकी ओर से चीन ही बात करेगा.

परंतु… ट्रंप की नीति पहले से साफ थी, वे गद्दी पर बैठे तो सबसे पहले ताइवान की महिला राष्ट्रपति को फोन किए, कुशल क्षेम हुआ… इतने में चीन भड़क गया.

चीन की दादागीरी यहाँ देखिए कि जो ताईवान चीन की सीमा से 2100 किमी. दूर समुद्र में है, एक अलग देश है, खुद की सरकार है, ओलिम्पिक खेलों में अपने खिलाड़ी भेजता है, अपना संविधान और अपनी सेना है लेकिन चीन ने उसे अलग देश की मान्यता ना तो खुद दी और ना ही विश्व के अन्य देशों को देने देता है.

ताइवान की राष्ट्रवादी सरकार के साथ अमेरिका के रक्षा एवं व्यापार सौदे पर भी चीन आपत्ति करता है. साउथ एशिया में चीन की दादागीरी को देखते हुए ट्रंप और मोदी की जोड़ी ने यह ठान लिया है कि अब चीन की मनमर्जी को नहीं चलने दिया जाएगा.

डोकलाम विवाद पर आज विश्व के तमाम देश भारत के पक्ष में हैं, क्योंकि यहाँ चीन एक अवांछित पार्टी है… और भारत अपनी सुरक्षा के साथ-साथ भूटान के साथ हुए अनुबंधों के कारण उसकी सीमा की पहरेदारी के लिए भी जिम्मेदार है.

आप ज़रा अंदाज़ लगाएँ कि एक तरफ कांग्रेसी सरकार का प्रधानमंत्री चीन के डर से अपने ही देश के एक राज्य का दौरा नहीं कर पाता है… वहीं दूसरी तरफ चीन की धमकियों को धता बताते हुए मोदी सरकार अपने पूर्वोत्तर राज्यों की सीमा जो चीन से लगती है, वहाँ साठ हजार सैनिकों और तोपों को तैनात कर देती है… चीन से भिड़ने की तैयारी कर लेती है.

यह बदले हुए स्वाभिमानी भारत की तस्वीर है. एक ऐसी तस्वीर जिसे सिर्फ भारत की 130 करोड़ जनता ही नहीं बल्कि शांति एवं सद्भाव से जीने वाले विश्व के अनेक देश देखना चाहते हैं.

अब मामला धमकियों से हटकर बातचीत पर पहुँच चुका है, चीन अपनी नाक बचाने के लिए जुगत लगा रहा है, खबरें आई थी कि चीन अपनी सेना को 500 मीटर पीछे हटाने को तैयार हो गया है. आगे यदि कोई और अड़चन नहीं आई तो यह मामला जल्द ही शांत हो जाएगा. स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर इस समाचार का आना भारतीयों लिए निश्चित ही एक सुखद एहसास है.

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