दोबारा तो नहीं दोहराना चाहते 1947 के बंटवारे का इतिहास?

स्वतंत्रता दिवस पर मदरसों में ‘राष्ट्रीय गान’ और ‘राष्ट्रीय गीत’ के गायन को लेकर बरेली की दरगाह आला हजरत ने कड़ा एतराज जताया. आला हजरत ने “जनगणमन” और “वन्देमातरम” गाने से इंकार कर दिया और कहा कि इसकी जगह सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा” तराना गाया जाएगा.

आला हजरत से उत्तर प्रदेश सरकार के मदरसों के ‘वीडियो’ और ‘फोटोग्राफी’ के आदेश का भी पूरी तरह से बहिष्कार करने का एलान किया गया. जमात रजा ए मुस्तफा के सदस्यों ‘नासिर कुरेशी’ व ‘असजद रखा खां कादरी’ ने सरकार के फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि- “हिंदुस्तान जम्हूरी मुल्क हैं, यहां हमे अपनी मजहबी पहचान के साथ जीने का हक हैं, राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत गाने का आदेश देना एक सियासी साजिश है, इसलिए हमने अपने सभी मदरसों को राष्ट्रगान से परहेज करने को कहा हैं”

दुनिया मे लगभग 54 छोटे बड़े मुस्लिम बहुल देश हैं जिनकी आबादी और आकार हमारे देश के किसी राज्य या जिले से भी कम हैं और जहां तक जानकारी है हर देश का अपना राष्ट्रगान है और वे ओलंपिक से लेकर विभिन्न राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों में गाये भी जाते हैं. कार्यक्रमों की वीडियो और फोटोग्राफी भी की जाती है पर इससे कहीं भी उनको अपना मजहब खतरे में नही लगता न कोई फतवा जारी होता हैं. पर सारी समस्या भारत में ही है और “राष्ट्रगान” व “राष्ट्रगीत” की जगह वो अपना मनपसन्द तराना गाना चाहते हैं.

उल्लेखनीय हैं कि 1947 से पूर्व अल्लामा इकबाल का तराना “सारे जहां से अच्छा” बहुत लोकप्रिय हुआ था. जब आम भारतीय इस गीत को सुनते या गाते हैं तो गर्व से भर जाते हैं और इसको लिखने वाले गीतकार मुहम्मद अल्लामा इकबाल की प्रंशसा और सम्मान करने में लग जाते हैं और उसे “महान देशभक्त” बताने लगते हैं. किन्तु ये तो कहानी का एक ही पक्ष है दूसरा पक्ष जो सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं उसे हमारे सेकुलर इतिहासकारों और सरकार ने आम जनता से छुपा रखा है, वह यह कि इसी अल्लामा इकबाल ने बाद में इस गीत को बदलकर “सारे जहां से अच्छा पाकिस्तान हमारा, मुस्लिम हैं हम वतन हैं सारा जहां हमारा” का नारा बुलंद किया था.

साथ ही उसने मुस्लिम लीग का समर्थन करते हुए भारत के विभाजन का भी पूरी तरह समर्थन किया. इतिहास के मिटाये गए पन्नो में तो ये तक कहा जाता हैं कि पाकिस्तान बनाने का विचार सबसे पहले जिन लोगों के दिमाग में जन्मा था “अल्लामा इकबाल” उनमें से एक थे. जिन्होंने पंजाब, बलूचिस्तान, सिंध और पश्चिमोत्तर क्षेत्रों को मिलाकर एक अलग मुल्क पाकिस्तान का समर्थन किया था.

आज उत्तरप्रदेश के कई मदरसों व उनको चलाने वाले अपने संस्थानों में ‘राष्ट्रगान’ व ‘राष्ट्रगीत’ की जगह “सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा” को गाने की मांग कर रहे हैं. उसके लिए अपने स्तर से आदेश जारी कर रहे हैं. क्या आपको नहीं लगता कि ये कट्टरपंथी और धर्मांन्ध एक बार फिर अल्लामा इकबाल की तरह पूरे देश को “झांसा” और “धोखा” देकर भारत में 70 साल बाद 1947 के बंटवारे का इतिहास दोबारा से नहीं दोहराना चाहते?

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